बुधवार, 22 जनवरी 2014

 नमस्कार,
  उत्तरायणी का  त्यौहार निकल गया , और मैं लिखने के प्रति उदासीन बना रहा। जबकि मुझे इस बात का बेहद अफ़सोस है कि मैं कुछ नहीं लिख पाया।  खैर !मौसम बेहद रंगीन हो रहा है. प्रकृति का और चुनाव का।
नए -नए मुखोटे पहन कर लोग  मैदान में उतर रहे हैं लुभावने ,फूलों की तरह कोमल और सुंदर रंगों वाले ,
लोग वही  हैं लेकिन मुखोटे बदल गए हैं।वादे बदल गए  हैं .
अफ़सोस ! सभी के वादों से भूख के लोग गायब हैं
सभी का एक ही नारा है कि बस ! हमें एक बार कुर्सी तक पहुंचा दो।

 पिछले दिनों के आंदलनों से एक बात सामने आयी कि सत्ता सामाजिक न्याय की बात नहीं सुनना चाहती है
सत्ता में बैठे लोग अपनी सत्ता और अपनी दौलत के दम्भ में आम जन की आवाज को दबाने के लिए कितने नीचे उतर जायंगे ,सत्ता का कितना घृणित उपयोग करेंगे ,इसकी कोई सीमा नहीं है. अहिंसा इनके लिए कोई मायने नहीं रखती।

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013


 एक शून्य- सा उभर आया था ,
जिसके भीतर सिर्फ मैं ही नहीं  था।
मेरे साथ थे विचार ,  जिन्होंने मुझे न सोने दिया
न जागने  दिया।


जो निरंतर स्वप्न बनते रहे।

और हर स्वप्न एक नया शून्य बुन देता।
जिस तरह सूर्य घटनाओं से भरा एक दिन बना देता है।
और चंद्रमां
 रात स्वप्नों के लिए।




  
नमस्कार मित्रो ,
आज फिर कई  दिनों बाद अपने पन्ने पर बैठा हूँ।
अनिश्चित कार्यक्रम और अनिमियत दिनचर्या कई कार्यों को भी अनिमियत कर देती है।  इस अनिमियतता के कारण  कई महत्वपूर्ण चीजें छूट जाती हैं मसलन दोस्तों से मिलना ,जरुरी काम निबटाना और जरुरी चीजों को देखना ,
अनुपस्थिति का दौर भी कई घटनाओं का साक्षी होता है ,इसका अर्थ यह नहीं कि  मैं नहीं था तो कुछ नहीं हुआ  होगा  ,अनियमित लेखन के कारण कुछ अच्छा देखा तो वह भी कहने  से रह गया और कुछ गलत होते देखा तो वह भी बताने से रह गया। यह एक किस्म से अन्याय है-लेखन के साथऔर स्वयं के साथ भी ।  या तो लिखना ही नहीं  चाहिए और यदि लिखते हो तो पूरी ईमानदारी के साथ लिखो।

प्रकृति की आवाज सुनो।
वहां धीरे- धीरे सब कुछ ख़त्म किया जा रहा है। आत्मिक  शांति,प्राकृतिक, वनस्पतियाँ ,स्वाभाविक  स्वछता, संवेदनशीलता ,सहनशीलता । और प्रेम। 
और यह सब ख़त्म  होने दिया जा रहा है,
मैं, आप और वे। सब इसके जिम्मेदार हैं।
क्योंकि हमारे दायित्वों के दायरे ख़त्म हो गए हैं।

रविवार, 23 जून 2013

अत्यंत  दुखद ! ह्रदय विदारक !
उत्तराखंड प्राकृतिक आपदा में मृतकों की आत्मशांति हेतु इश्वर
से प्रार्थना करता हूँ व इश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि उनके परिजनों को
इस दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करे .
मित्रो,
आप जानते ही हैं कि विगत दिनों उत्तराखंड पर दैवीय आपदा का पहाड़ आ गिरा है, बादल फटने से भीषण तबाही हुई है,मरने वालों की संख्या अभी स्पष्ट नहीं है, वैसे यह अनुमान है कि  मरने वालों की संख्या हजारों में  हो सकती है. अभी भी 2 2 हजार के करीब लोग विभिन्न जगहों में फंसे हुए हैं जिन्हें सेना की मदद से निकाला  जा रहा है इस आपदा में सेना ने राहत  और बचाव का कार्य बहुत ही तत्परता के साथ   किया जिससे हजारों लोगों की जान बचाई जा सकी .यह बहुत ही सराहनीय है.
मित्रो ,
सभी लोगों से निवेदन है की इस आपदा से निबटने में अपना सहयोग करें ,मुख्यमंत्री राहत  कोष उत्तराखंड में अपने आर्थिक योगदान दें .तथा जिस तरह भी बन पड़े अपना योगदान दें .ताकि राहत एवं पुनर्वास का कार्य तेजी से किया जा सके .यह संभवतः भारत में अब तक की सबसे बड़ी आपदा है.

रविवार, 19 मई 2013

 गर्मी आरम्भ हो चुकी है.दोपहर में सूर्य की किरणें सर पर लोहे की छड की  तरह पड़  रही हैं  जब पहाड़ों का यह हाल है तो मैदानों का क्या होगा ? 

चारों तरफ जंगल जल रहे हैं  जिस कारण तापमान बढ़ जाता है. और गरमी बढ़ने लगती है . यही स्थिति पहाड़ों की है. यदि जंगल न जलें ,जंगलों को आग से बचाया जा सके तो तापमान में काफी हद तक कमी आ सकती है. जंगलों का हर वर्ष जलना एक बहुत ही चिंता का विषय है. सैकड़ों पौंधों की प्रजातियों का अस्तित्व खतरे मैं है. जंगली पशुओं का अस्तित्व खतरे में है. पक्षियों का भोजन ख़त्म हो जाने के कारण वे भूख प्यास से दम तोड़ रहे हैं जंगलों के आग से उनके घोंसले जल कर खाक हो रहे हैं उनके बच्चे झुलस कर  दम तोड़ रहे हैं  बाघों का भोजन ख़त्म हो रहा है. बंदरों का  भोजन ख़त्म हो रहा है . घास चर कर पेट भरने वाले पशुओं का भोजन जल कर राख हो रहा है . वे भी चारे की तलाश में भूखों मर रहें हैं आग लगाने से जमीन की नमी ख़त्म हो रही है. 

 इन सब को बचाने वाला कोई नहीं है. 

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013


 कभी -कभी हम तय नहीं कर पाते  हैं  कि  करना क्या है ?
एक चौराहे  पर चार  रास्ते  मिलते हैं या चौराहे से चार रास्ते  निकलते हैं . अजीब उलझन सी आ खड़ी होती है.

कुछ इसी तरह दिन निकला ,प्रकृति का सबकुछ नियमित था .लेकिन मैं नहीं .
और  मैं अनिमियत होने का लुत्फ़ भी नहीं उठा पा रहा था .
छांछ पी और धूप सेंकी .खाना खाया और सो गया .
उठा तो चाय पी . आज कुछ भी करने का मन नहीं हुआ . दिन को निकलने दिया , धूप को  आने दिया . हवा को बहने  दिया ,सारे काम चुप चाप होने दिए . किसी काम में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया .
आज सपनों को भी आने की मनाही थी .
आज अपने भीतर एक शून्य चाहता था .
चुप- चाप शाम ने दस्तक दी . मैंने दरवाजा खोला . दिए की रोशनी की  एक किरण सीधे मेरे भीतर प्रवेश कर गयी .जैसे रोशनी को मेरे दिल के भीतर से गुजरते हुए एक लंबा रास्ता तय करना हो .
ज्यों ज्यों अँधेरा गहराता गया मेरे भीतर उजाला बढ़ता गया .
मुझे लगा कि इसी रोशनी की तलाश थी मुझे . यहीं से होकर कोई राह निकलती है .

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

 गौरैये की चहचाहट  से नीद खुली , बाहर  देखा ,सुबह बहुत ही मन भावन  थी , 
पिछली वारिश से ठण्ड लौट आयी है . और मौसम का सुहानापन भी . लग ही नहीं रहा है क़ि अप्रैल आ गया है .
यदि इसी प्रकार मौसम बना रहा तो जंगलों में आग लगने की घटनाओं  में थोडा कमी होगी .
और गधेरों में  पानी बना रहेगा .मनुष्यों और जंगली जानवरों के लिए पानी की परेशानी नहीं होगी .
जंगलों में नए पौंधों को पनपने का अवसर मिलेगा .वर्ना हर साल लगने वाली  आग से नए पौंधों को पनपने का अवसर नहीं मिल पा  रहा था . और  जंगलों का विकास रुक गया था . महत्वपूर्ण जड़ी बूटियों का अस्तित्व खतरे में पड़  गया था .
इस साल की बारिश की निरंतरता ने लोगों में उम्मीद जगा दी है .

गुरुवार, 28 मार्च 2013

होली  की हार्दिक शुभकामनायें .
ये रंग आपके जीवन में उमंग लायें .आपका पूरा  साल सुखद रंगों से रंगमय हो .
हम अगली होली पर इसी तरह ख़ुशी ख़ुशी मिलें .
ख़ुशी के ये रंग आपके जीवन में  हमेशा बने रहें .

बुधवार, 27 मार्च 2013

ahinsa aaj ki jarurat hai .

आज कई दिनों  के बाद अपने पन्ने पर बैठा हूँ
इस बीच मानवता को दहला देने वाली कई घटनाएँ घटी हैं .
लेकिन जो उत्तराखंड में  हुआ वह काफी चिंता जनक है .जनवरी -फरवरी में उत्तराखंड में लगभग तीस तेंदुओं को अपनी जान गवानी पड़ी . उनमें से कितने मार दिए गए ,कितने स्वतः मरे .यह तो बाद का सवाल है .
  फिल हाल तो यह चिंता का विषय है कि आज  मानव और वन्य जीव आमने सामने है. यह संघर्ष क्यों ?
जंगलों से संघर्ष की आवाज आ रही है . शेर मारे जा रहे हैं ,हाथी मारे जा रहें ,बाघ मारे जा रहें ,तेंदुएं मारे जा रहें , भालू मरे जा रहें हैं सूअर मारे जा रहे हैं  घुरड़ ,काकड़ ,हिरन,खरगोश ,वनमुर्गी ,अजगर ,कोबरा ,वाइपर और  सैकड़ो साल पुराने पेड़ मारे जा रहें हैं . जंगलों की सघनता कम हो रही है . पक्षियों का अस्तित्व खतरे मैं है.
संघर्षों का एक मुख्य कारण यह है कि जंगलों में पशुओं का स्वाभाविक भोजन ख़त्म हो रहा है. यह मनुष्यों के द्वारा अंधाधुंध शिकार का परिणाम है .
आज आवश्यकता जंगलों के साथ  मित्रता पूर्ण  व्यहार की है. हम उनके हकों का अनैतिक दोहन न करें . कानून की जरुरत तब महसूस होती है जब हम अपनी हदें लांघते हैं . जब हमारी क्रूरता अनियंत्रित हो दूसरों के लिए खतरा बन जाती है . तब लगता है कि एक सख्त कानून होना चाहिए . जिस पर अमल हो .

अहिंसा आज की जरुरत है .

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

intajaar

ऊफ ! पांच महीने  का विराम .
इन पांच महीनों में समय काफी आगे निकल गया . और मैं वहीं का वहीँ  बैठा रहा जैसे कुछ लिखने के लिए  किसी का इंतज़ार कर रहा हूँ . और वह अभी भी नहीं आया  तो मुझे लगा क़ि अब आगे बढना चाहिए . अक्सर जब हम चल रहे होते हैं तो चलते चले जाने की धुमें  मीलों का सफ़र तय कर लेते हैं . अनावश्यक इंतज़ार हमें रोक लेता है थक कर विराम करें वह अलग बात है
वहां हम उर्जा लेते हैं . जबकि अनावश्यक इंतजार  हमें मानसिक तौर पर थका देता है। फिर हम सोचते हैं कि  फिजूल में रुके  ,चलते गए होते तो अभी तक काफी आगे निकल गए होते .

एक पल के लिए तो मुझे लगा कि  मैं लिखना ही भूल गया हूँ . लेकिन फिर लिखना शुरू किया तो लिखता चला गया .
समझ नहीं आया कि मैं इंतजार किसका कर रहा था . मैंने कई छोटी -छोटी चीजें  छोड़ दी , और वे काफी आगे निकल गई  . अब उन्हें लिखने का कोई औचत्य नहीं बनता . जो पीछे छूट गई उन्हें भी पकड़ने की कोशिश बेकार है। बस ! यहीं से आगे को लिखते चलो .

सोमवार, 7 मई 2012

हम हिंसक इतिहास से कब उबरेंगे ? 
हम यानी मानव समाज . वह चाहे किसी भी धर्म से हो . 
लगभग सभी धर्मों के मनुष्य हिंसक अतीत से पीड़ित रहे हैं . और वर्तमान भी भयानक रूप से हिंसक दौर का है . इस धरती में व्यापाक रूप से व्याप्त  हिंसा को रोकने में  सभी धर्मों के सारे ईश्वर लगभग असफल हो चुके हैं . अहिंसा के पुजारी गाँधी जी खुद हिंसा का शिकार हो गए ,ईसा मसीह को सूली पर टांग  दिया गया . और भी जिसने भी अहिंसा की बात कही वह खुद हिंसा का शिकार हुआ या हिंसक शासकों के निशाने पर रहा . 


हिंसा तो अंतिम व्यवहार है। चरम की परिणति  .
हिंसक बनाने वाले हिंसा करने वाले से  कहीं ज्यादा खतरनाक है .
हम आज धरती बचाने की बात कर रहे हैं . उससे पहले प्राणियों के प्राणों का संकट परमाणु हथियारों के रूप में सामने खड़ा है। हम सब हथियारों के दायरे में हैं . 
इसलिए दुनियां के नागरिको पहले इस धरती पर रहने वाले प्राणियों को बचाने के लिए सोचो .

शुक्रवार, 4 मई 2012

धर्म   और मीडिया एक भयानक गठजोड़ बनकर समाज को खेमों में बाँट रहे हैं . जिस चैनल पर भी देखो हर वक़्त कोई न कोई उपदेश देता दिखाई देता है। रूपया कमाने का इससे बेहतरीन धंधा और कोई नहीं हो सकता है . या तो फिर घोटाले हैं या फिर यही  धर्मं का धंधा .

प्रश्न है कि तमाम धर्मों के उपदेशों व्यापाक प्रसारण के बाद क्या समाज की स्थिति में  कोई सुधार  आया ? इन तथाकथित संतो उपदेशकों ने  समाज में फ़ैल रही हिंसा के लिए कोई बात कही या ये अपनी गद्दी माइक और लखपति करोड़ पति भक्तों की भीड़ छोड़ कर कभी समाज के सबसे नीचे वर्ग के दबे कुचले लोगों की झोपड़ियों तक भी गए ? उनके जीवन की दुरुहताओं /उनकी पीडाओं /उनके शोषण /उनकी भूख / उनकी शिक्षा /उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए  भी कभी काम किया ?
या सिर्फ शोषक वर्ग से धन ऐंठने के लिए /उन्हीं की तरह नीचे के वर्ग को बनाये रखने के लिए षड्यंत्र में  भागीदारी करते  हैं /  धनवान भक्तों का एक नया वर्ग खड़ा करते हैं .
यह धर्म के धंधे  का सबसे निकृष्ट  स्वरुप है कि
उपदेश दो धन कमाओ /चैनल वाले भी कमायें / बाकी  दुनियां को कौन पूछे ? समाज की विषमताओं को कौन पूछे / गरीब तो इनके कार्यक्रमों में घुस भी नहीं सकता है .

मंगलवार, 1 मई 2012

एक अच्छा मौसम !
वर्ना इस मई  एसा तो गर्मी से बुरा हाल हो जाता . और अभी तक रजाई नहीं छूटी  है . संतोष की बात यह है कि नदी में  अभी पानी सुखने की कगार पर नहीं पहुंचा . पीने के  पानी का संकट शायद  इस बार थोडा कम हो . मछलियाँ भी इस बार पानी की कमी की समस्या से नहीं जुझेंगी . गधेरों में  भी इस बार पर्याप्त पानी है। 
वैसे यह बारिश नवम्बर माह व फरवरी माह में होती तो तो फसल बहुत अच्छी होती लेकिन यह बारिश फसल बर्बाद करने के बाद हुई . यह सिलसिला पिछले कई बरसों से चला रहा है . सारी  मेहनत  के बाद अंत में किसान के पास बीज भी नहीं बचता  है . लेकिन स्थानीय किसान अपना फसल चक्र का समय बदलने को तैयार ही नहीं .सूखे के 
हालात हमने स्वयं  पैदा किये हुए हैं . हर बर्ष हमारे जंगल जल  रहे हैं . लेकिन ताज्जुब है की कोई ग्रामीण उस आग को बुझाने को नहीं जाता है। महत्वपूर्ण बनस्पतियां हर बर्ष जल कर राख हो रही हैं . पानी को रोकने वाली बनस्पति हर बर्ष जलाई जा रही है। नए पेड़ हर साल आग लगने के कारण नहीं पनप पा रहे हैं . जंगलों की सघनता कम हो रही है। हम  हर बर्ष अपने आस पास को तबाह करने के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं .हमारी पैदावार घटी है। क्यों?  यह मान लिया गया है की जंगलों की आग बुझाना हमारा दायित्व नहीं है। हमें खुद को बचाने  के लिए भी मजदूरी /या धन चाहिए .

रविवार, 22 अप्रैल 2012

Abhinav Gatha: बड़ी देर से बैठा सोच रहा था कि आज शुरू कहाँ से कर...

Abhinav Gatha: बड़ी देर से बैठा सोच रहा था कि आज शुरू कहाँ से कर...: बड़ी देर से बैठा सोच रहा था कि आज शुरू कहाँ से करूँ  ?सूर्योदय से या फिर उससे पहले . उससे पहले का स्वप्न याद नहीं . हाँ इतना याद है कि ...
बड़ी देर से बैठा सोच रहा था कि आज शुरू कहाँ से करूँ  ?सूर्योदय से या फिर उससे पहले .
उससे पहले का स्वप्न याद नहीं . हाँ इतना याद है कि उमा ने पहली चाय के साथ सपने से जगाया और बोली स्वप्न से जागो और हकीकत की जमीन देखो . 
एक पल के लिए मुझे लगा की यह सच कह रही है . क्योंकि शारीरिक उडान तो सिर्फ स्वप्न मैं भरी जा सकती है . जमीन पर तो सिर्फ चला जा सकता है. लेकिन यह भी सच है कि स्वप्न हकीकत की जमीन देखने के लिए भी संकेत देते हैं
मैं चाय पीकर फिर रोजमर के कामों मैं उलझ गया .
मैंने बहुधा  देखा है कि  देखे गए सपनों का कुछ न कुछ संकेत होता है .   यानि एक प्रकार से पूर्वाभास .अवचेतन  आने वाली चीजों को पहले देख लेता है 
लेकिन इस सब के लिए आत्मबल भी मजबूत चाहिए . हम देखे हुए संकेतों को समझ सकें ,उनका विश्लेषण कर आने वाली घटनाओं को देख समझ सकें . 
आत्मबल की दुर्बलता के चलते ही अक्सर हम स्वप्न को भूल जाते हैं . या उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं . या संकेत नहीं समझ पाते हैं. 

स्वप्न बहुत महत्वपूर्ण हैं . उन्हें देखो, समझो और जानो .

रविवार, 8 अप्रैल 2012

दिल्ली में हूँ- भीड़- भीड़- भीड़ जहाँ देखो वहां भीड़ !
गावं में तो भीड़ देखने को बाज जगह तो पांच -पांच किलोमीटर चल कर लोग दिखाई देते हैं . और यहाँ खाली जगह देखने को नहीं मिल रही है .
पूरा पहाड़ यहाँ आ चुका है वहां पर बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है .लेकिन जीवन स्तर अच्छा है .वहां एक बड़ी प्रवृति है कि क्षेत्रीय स्तर पर  रोजगार कि संभावनाएं पैदा करने कि कोशिश नहीं की जाती है . युवा इंटर पास करके सीधे दिल्ली दौड़ पड़ते हैं . यहाँ की तड़क भड़क आकर्षित करती है .
यह भी सच है कि लोगों ने यहाँ आकर बहुत अंधाधुंध पैसे कमाए हैं .
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि पहाड़ में रोजगार कि संभावनाएं ख़त्म हो गयी हों . अपार संभावनाएं हैं. कृषि में बागवानी में ,लघु उद्योगों में , व्यापार में .आवश्यकता है तो सकारात्मक  नजरिये और मेहनत की.


दिल्ली बहुत अच्छा शहर है .किन्तु धनवानों के लिए . नेताओं के लिए .
आम आदमी के लिए नहीं .  आम आदमी तो नेताओं/पूंजीपतियों  के हिस्से का नरक भोग रहा है.

बुधवार, 14 मार्च 2012

फूल दे पैलाग!  फूल देई छम्मा  देई .
एक बहुत ही ख़ुशी का त्यौहार . छोटे -छोटे बच्चे आते हैं घर की देहरी मैं फूल रखते हैं और बदले मैं उन्हें चावल दिए जाते हैं . बच्चों का समूह गावं के हर घर में जाता है . नवजात बच्चों के लिए एक अलग नई टोकरी ले कर जाते हैं . बच्चे पहले दिन से ही जंगलों से तरह -तरह के फूल तोड़ कर लाते हैं .बच्चे बहुत खुश दिखाई देते हैं 

 और घर की देहरी में बिखरे फूल घर को भी ख़ुशी दे जाते हैं .

आज त्यौहार मनाया .

सोमवार, 5 मार्च 2012

Abhinav Gatha: सुबह का उगता सूरज  दिन की कथा के शीर्षक की तरह है...

Abhinav Gatha: सुबह का उगता सूरज दिन की कथा के शीर्षक की तरह है...: सुबह का उगता सूरज दिन की कथा के शीर्षक की तरह है . इसलिए जरुरी है कि सुबह अच्छी हो . आशावादी हो दिन की कथा का शीर्षक . एक सुखद संगीत प...
सुबह का उगता सूरज  दिन की कथा के शीर्षक की तरह है .
इसलिए जरुरी है कि सुबह अच्छी हो . आशावादी हो दिन की कथा का शीर्षक .

एक सुखद संगीत पूरे दिन मन में गूंजता  रहे .

सपने हों आँखों में .
अंतर्मन में हो प्यास प्रेम की .

लेकिन यह सब होने के लिए क्या हम अपने चारों ओर के मानवीय और पर्यावरणीय वातावरण के प्रति संवेदनशील हैं?
हमने सहनशीलता खो दी है . धैर्य खो दिया है और दूसरों के लिए जीवन दूभर बनाते जा रहे हैं .दूसरों में वे सब जो प्रकृति के जीव हैं .जो प्राण हैं . उनमें स्वयं हम भी हैं . प्रकृति के साथ हमारा व्यवहार बहुत ही अमर्यादित होता जा रहा है.

हर क्षण धरती पर फटने वाले बमों / परमाणु युद्धों के इस दौर में  प्राकृतिक हितों की बात करना बेमानी है. महाशक्तियां तो  सब कुछ ख़त्म कर देना चाहती हैं .खुद को भी .

फिर भी एक चींटी की तरह  प्रयास तो किया जा सकता है . कि धरती में जीवन सभी के लिए  सुगम बने .
 


 

गुरुवार, 1 मार्च 2012

jangal bavhao

 इधर कई दिनों से देख रहा हूँ कि जंगल बेतहाशा जल रहे हैं  . उससे भी भयंकर तथ्य है कि जलने दिए जा रहे हैं .  सब ख़ामोशी से देखते जा रहे हैं . गावं वाले निर्लिप्त भाव से जंगलों को जलता हुआ देख रहे हैं . हम अगर ग्लोबल वार्मिंग की बात को छोड़ दें तो भी इस आग से स्थानीय स्तर पर तात्कालिक हानियाँ तो गंभीर रूप से घातक हैं ही . सबसे बड़ा नुक्सान तो वन्य जीवों का है. जो कि बेमौत मारे जा रहे हैं पक्षियों के घोंसले अण्डों सहित  जल रहे हैं बाघ ,तेंदुए और अन्य जंगली जानवर  जंगल छोड़ कर बस्तियों की तरफ भाग रहे हैं . जंगलों से महत्वपूर्ण औषधियां जल कर राख हो रही हैं . जो कि विलुप्ति की कगार पर हैं . चींटियों की नस्लें खतरे मैं हैं . जंगलों से जंगली जानवरों का भोजन ख़त्म हो रहा है . और सबसे महत्वपूर्ण नुक्सान यह कि सतह से पानी ख़त्म हो रहा है . 

लेकिन फिर भी हर वर्ष जंगल जलाये जा रहे हैं .  आग को रोकने का क्या किसी के पास कोई इन्तेजाम नहीं है क्या ? 
या आग बुझाना नहीं चाहते ? या यह लीसा और लकड़ी माफियाओं ,जंगली जानवरों के तस्करों और ग्रामीणों की मिलीभगत से हो रहा है. अकेला साधन हीन  वन विभाग कुछ नहीं कर सकता . 
जैसे भी हो रहा है .गावों के भविष्य के लिए तो अच्छा संकेत नहीं है . गावों में सूखा बढेगा , फसल का उत्पादन प्रभावित होगा , रोजगार के अवसर प्रभावित होंगे और पलायन बढेगा , अंततः गावों का अस्तित्व ही खतरे में होगा . 
हर साल चातुर्मास में करोड़ों का पौंधा  रोपण होता है और मार्च आते-आते सब जलकर स्वाहा हो जाता है धरती हरी-भरी होगी कैसे ? 
 

बुधवार, 25 जनवरी 2012

कभी  कभी दिन की शुरुआत ही खराब होती है . वह पूरा दिन ही अपनी पटरी से उतर जाता है . 
अपने कार्यक्रम मैं अनावश्यक तबदीली नहीं करनी चाहिए . यह सब इसलिए लिख रहा हूँ कि आज पूरा दिन अव्यस्था की भेंट चढ़ गया . दिन भर परेशान रहा सो अलग . खैर छोडो यह सब . 
चुनाव प्रचार ने दिमाग खराब कर रखा है . लोग घेर लेते हैं कि क्या करें ? 
मैं क्या कहूँ ? कि किसे वोट करें और किसे न करें . यह लोगों का अपना अधिकार क्षेत्र है . मैं तो इतना ही कहूँगा कि जो योग्य हो उसे वोट करें . खुद बिकें नहीं . अपने विवेक का प्रयोग करें . यही समय है जब हम पांच सालों के लिए लोक तंत्र  की  व्यस्था किसी को सौंपते है .
 सुबह एक बार लग रहा था कि आज बारिश होगी . लेकिन दिन में बादल छंट गए . और इस ठण्ड में बारिश का आनंद लेने से वंचित रह गया . शाम ठण्ड बढ़ गयी . अंगीठी जलाई .आग ताप कर ठण्ड दूर की.
बारिश जम कर होनी चाहिए थी . लेकिन नहीं हुई यह चिंता का विषय है . इस समय बारिश का न होना गर्मियों में पानी का संकट पैदा कर देगा . देख रहा हूँ कि गधेरों से पानी गायब हो गया है .

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

चुनाव चर्चा

चुनाव प्रचार/प्रपंच जोरों पर है ।
लेकिन दिखाई दे रहा है कि अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए जनता का विवेक नहीं जागा है । लोग तय नहीं कर पा रहे हैं कि किसे चुनें ?और क्यों चुनें ? अच्छे और बुरे तक को तय करने का विवेक नहीं है । धन की चकाचोंध में लोग यह मालूम करना भी भूल गए हैं कि इतना बेतहाशा धन आया कहाँ से ?प्रत्याशी की आय का श्रोत क्या है ? और यह प्रत्याशी इतनी विशाल धनराशि खर्च क्यों कर रहा है ? एक आम आदमी ने अपने जीवन में उतने सादे पन्ने नहीं देखे होंगे जितने नोट इन चुनावों में खर्च होते हैं । इन हालातों में तो लोकतंत्र /सत्ता न तो आम आदमी के हाथ में रहेगी और न ही आम आदमी के लिए । लोकतंत्र बाहुबलियों /धनबलियों /छलबलियों की गिरफ्त में आ जायगा । आम आदमी अन्याय और भ्रष्ट्राचार की मार सहेगा । वह लोकतंत्र में शक्तिविहीन होगा ।
धनबल ,बाहुबल,छलबल की चर्चा तो सुनी जा रही है लेकिन आत्मबल की आवाज कहीं नहीं सुनाई दे रही है । मतदाताओं को विवेक से निर्णय लेने की बात कहने के लिए कोई मध्यस्त प्रचारक नहीं है ।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

उपवास या उपहास

नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर साम्प्रदायिकता का भयानक खेल खेला । जिससे मुस्लिम समाज आहत है । यह गोधरा कांड से भी कहीं ज्यादा गहरी चोट दे गया । आखिर यह उपवास क्यों ? मुझे इस उपवास का कोई विशेष मकसद नहीं दिखता । सद्भावना के उपवास में मोदी ने मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार कर मुसलमानों के प्रति अपनी भावना जाहिर कर दी । साथ ही हिन्दू धर्म की वसुधैव कुटुम्बकम और दूसरे धर्मों के प्रति समान रूप से सम्मान की भावना भी आहत हुई है ।

गाँधी तो सदियों में एक होंगे । वह भी घोर तपस्या और संघर्ष के बाद ।

दूसरी बात समझ नहीं आ रही है कि इस सरकार के सलाहकारों को क्या हो गया ? क्या वे विपक्ष के साथ है ?
ग़रीबी रेखा पर कांग्रेस सरकार का आंकड़ा बेहद शर्मनाक है !क्या सरकार के इन मंत्रियों को मालूम है कि आम आदमी के एक समय का सादा खाना कम से कम ३० रुपये में बनता है दो समय का साठ रुपये में ।
यह आकंडा तो सरकार के किसी सलाहकार और मत्री ने मिल कर किसी पञ्च तारा होटल में बैठकर ही बनाया होगा । गरीब को और महंगाई को देख कर नहीं । ग़रीबी और बदहाली को देखना है तो गावों में देखो , महानगरों की अँधेरी तंग गलियों में जाकर देखो । तब आकंडा पेश करो ।

एक तथ्य तो स्पष्ट है कि सरकार के मंत्री गण ही विपक्ष को हल्ला करने का मौका देरहे हैं। क्यों ?क्या उन्हें माननीय मनमोहन सिंह जी बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं ?या सरकार की दूसरी पारी हजम नहीं हो रही ?

यदि कोंग्रेस विवेक से निर्णय ले तो सरकार अवश्य तीसरी बार भी कांग्रेस की ही बनेगी ।

रविवार, 18 सितंबर 2011

पहाड़ और पलायन

आज दिन घर पर ही गुजरा ।
आँगन में कुछ काम किया । कुछ देर खेत में काम किया । असोज का महीना है । एक तरफ खेतों में अनाज तैयार खड़ा हैं दूसरी तरफ जंगलों में घास भी तैयार है ।
किसान इतने व्यस्त हैं कि उनके पास सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है । लेकिन दूसरी तरफ महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि गावों में किसान दिन प्रति दिन कम होते जा रहे हैं । लोगों का रुझान खेती की ओर से हट रहा है । वे लोग बस किसी भी प्रकार खेती से छुटकारा पा कर कोई भी नौकरी कर लेना चाहते है। लोगों ने यह धारणा बना ली है कि पहाड़ों में खेती में अब भविष्य नहीं रहा । जिस गावं में भी जाता हूँ देखता हूँ कि गावों में खेत के खेत बंजर पड़े हैं । जो घर में हैं भी वे भी खेती के इच्छुक नहीं दिखाई देते । वे भी खेतों को बंजर छोड़ते जा रहे हैं । पशुधन कम होते जारहे हैं । लोग अपने मवेशियों को छोड़ कर उनसे पीछा छुड़ा रहे हैं । किसी समय में पहाड़ के किसानों की रीढ़ होने वाले जानवर आज पहाडो में यत्र तत्र आवारा घूम रहे हैं । कहीं वे बाघ का निवाला बन रहे हैं तो कहीं लोग उन्हें बुरी तरह पीट कर भगा रहे हैं । गाय किसी युग में माता के सामान हुआ करती होगी । आज तो एक बोझ है। मनुष्य की एक क्रूरता स्पष्ट रूप से सामने आ रही है ।
यहाँ से पलायन कर गया अधिकांश युवक कोई बेहतर स्थिति में नहीं दिखाई देते । यदि वे घर पर रह कर अपने लिए खेतों में रोजगार के नए अवसर पैदा करने कि कोशिश करते तो कहीं बेहतर स्थिति में होते ।

आज भी पहाड़ में खेती के स्वर्णिम अवसर हैं । आवश्यकता है तो मेहनत की। बुद्धि की । युक्ति की । कृषि में नए प्रयोग करने की । उद्यान में नए प्रयोग करने की । पानी और हवा में नए प्रयोग कर अवसर पैदा करने की ।
आज पलायन पहाड़ के वयोवृद्ध पुरुषों व महिलाओं के लिए एक त्रासदी बनकर सामने आ रही । वे घरों में एकाकी पड़ गए हैं । उनका अंतिम समय अपने बच्चों के साथ के बगैर गुजर रहा है। वे मौन होते जा रहे हैं । वे असहाय होते जा रहे हैं । वे अपने अंतिम समय को लेकर खुश नहीं हैं।

बुधवार, 14 सितंबर 2011

गुलाम मानसिकता से भी आजादी चाहिए .

हिंदी दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं ।
उन सभी नेताओं को जो हिंदी या अन्य भारतीय जनों की प्रांतीय भाषाओँ के मतदाताओं के मतों से जीत कर संसद पहुंचते हैं । किन्तु वहां जाकर अंग्रेजी में अपना भाषण देते हैं ।
जब वोट मांगते हैं तब उन्हें हिंदी या अन्य भारतीय/प्रांतीय भाषा बोलनी आती है । किन्तु संसद में पहुंचते ही वे सबसे पहले अपनी भाषा बदलते हैं । यह जनता का सरासर अपमान है । राष्ट्र का अपमान है ,हिंदी का अपमान है । हिंदी भाषियों का अपमान है । जनता को अधिकार है कि वे संसद में अपनी भाषा का तिरष्कार करने वाले सांसदों को भी बदलें .हिंदी के हर साहित्यकार का दायित्व है कि वह प्रधानमंत्री को राष्ट्र भाषा के प्रयोग के लियें लिखें । कम से कम भारत माता के मंदिर में तो राष्ट्र भाषा को प्राथिमकता मिले । वे सांसद जो हिंदी नहीं जानते हैं .क्या अपनी क्षेत्रीय भाषा भी नहीं जानते हैं ।
इस गुलाम मानसिकता से भी आजाद होना ही होगा ।

शनिवार, 10 सितंबर 2011

कविता और सत्ता

सुबह जल्दी उठ कर रोज के काम निबटा कर छत में घूमने गया । यह भी एक काम है ।आत्मसंवाद और
प्रकृति से संवाद रोजमर्रा का एक हिस्सा होता है।

और यहीं जन्म लेती हैं कवितायेँ । हवा की मानिंद किताबों से होते हुए आप तक पहुंचती हैं .
आप लोग पढ़ें , न पढ़ें या क्यों पढ़ें । यह तो आप की बात है । मैं तो फूलों से रंग और सुगंध ,जंगलों से हरियाली और हवा ,पहाड़ों से ठंडी बयार ,नदी की छल-छल ,कल-कल की मधुर ध्वनियाँ और सायं -सायं की गर्जना ,तथा अपने मन की बात । सब कुछ मिलाकर आपकी ओर बढ़ा देता हूँ ।

पढ़ना आज एक समस्या हो गयी है । लोगों की दिनचर्या से पढ़ने के लिए समय ख़त्म हो गया है । और प्रेम करने के लिए भी । प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए भी । ह्रदय एक पम्पिंग मशीन बनकर रह गया है । व्यक्ति राजनीति का एक मोहरा मात्र रह गया है । उसकी अपनी चेतना की डोर जैसे राजनेताओं के हाथों में चली गयी हो ।
यहाँ साहित्य समाप्त हो जाता है , कविता समाप्त हो जाती है । संवेदना ख़त्म हो जाती है ।
एक सुगन्धित और खुबसूरत फूल का होना न होना कोई अर्थ नहीं रखता है ।
क्योंकि सत्ता तो लाशों के ढेर के ऊपर से हो कर गुजरती है । तो जाहिर सी बात है की राज नेता भी सत्ता के पीछे पीछे उसी तरह चलता जायगा ।
राजनेता के लिए सत्ता पाना और सत्ता में बने रहना ही अंतिम सत्य है । और यह रास्ता तानाशाही की ओर जाता है । तानाशाह आजकल क्या कर रहें हैं यह तो आप देख ही रहे हैं ।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

रंगों का मेला

मौसम के अनुसार सुबह अपनी रंगत बदलने लगी है । हल्की सी ठंडक , हल्का -हल्का कोहरा , कुछ ओस की बूंदें और धीरे -धीरे धूप का आना । बदलते महीने के साथ मौसम का बदल रहा है ।
कुदरत का यह मिजाज बहुत मन भावन लगता है ।

यह यादों के लौट आने का मौसम है !
जब हमें उम्मीद रहती है किसी के आने की तो लौट कर आती हैं सिर्फ यादें ।
ठण्ड के साथ । ठण्ड की तरह ।

लौट कर आने लगे हैं फूलों के रंग । जंगलों में हरी घास के साथ कई तरह के फूल अपने -अपने रंगों में खिल आए हैं । यूँ लगा कि कुदरत के मेले में सब पौंधे अपने -अपने रंगों की दुकान ले आए हैं । इन खुबसूरत जंगलों से जाने की इच्छा ही नहीं होती है। कौन सा रंग ले जाऊ ? किस रंग से खुश होगी प्रियतमा ?
बहुत सुन्दर है यह रंगों का मेला । तरह -तरह के रंग हैं , सुख के रंग ,दुःख के रंग।
सबसे सुन्दर रंग है प्रीत का रंग ।

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

अत्यंत दुखद/निंदनीय

हे भगवान! यह किया किया इन दरिंदों ने ?
दिल्ली बम ब्लास्ट की निंदा करता हूँ ।
ईश्वर बम ब्लास्ट में मारे गए लोगों की आत्मा को शांति प्रदान करे । तथा उनके शोक शंतप्त परिजनों को इस दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे ।
यह बहुत ही दुखद है । ओह ! मानवता अभी भी कितने खूंखार दानवों को झेल रही है ।हम अहिंसा के पक्षधर हैं । यह घटना विश्व शांति पर आघात है ।
क्या हम सब सुरक्षित हैं ?
सरकार क्या कर रही है ? सिर्फ घोटाले और भ्रष्टाचार विरोधियों को जेल भेजने में व्यस्त है ?
क्यों?

सोमवार, 5 सितंबर 2011

लोग याद रखते हैं .

कई बार पंक्तियाँ लिखी और उतनी ही बार मिटा दी । लिख कर मिटाना लेखक के हाथ में तभी तक है जब तक लिखा हुआ उसके अपने पास तक ही सीमित है । जहां से लिखा हुआ लोगों तक पहुँच जाता है वहां फिर कोई भी लेखक अपना लिखा हुआ मिटा नहीं सकता है । कुछ इस तरह कि पत्र लिखकर डाकखाने में डालने के बाद उसमें कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता । हाँ !दूसरा पत्र लिखकर पहले के लिखे में संसोधन या नया जोड़ने की बात की जा सकती है ।
आज जमाना डाकखाने का तो लगभग नहीं के बराबर है । पत्र आने अब बंद हो गए हैं । फ़ोन पर हुई बात में वह बात नहीं । एक बार मिले पत्रे को हम कई बार पढ़ते हैं । फिर संभाल कर रखते हैं । कुछ दिनों के बाद फिर उसी को पढ़ना चाहते हैं । बरसों बाद भी उसी पत्र को पढ़ कर वही आनंद आता है । और दशकों बाद वह एक बहुमूल्य दस्तावेज बन जाता है । और हम चाहते हैं कि हमारी मृत्यु के बाद भी पत्र सुरक्षित रहे । लोग पढ़ें । हमारे बच्चे ,बच्चों के भी बच्चे और पूरी दुनियां जाने हमारे राज ।
एक बार लिखकर बाहर आने के बाद वह अमिट हो जाता है । लोग याद रखते हैं । पत्रों को ।
पत्रों के बहाने हमको ।

शनिवार, 3 सितंबर 2011

आत्म सुधार की कोशिश हो .

अन्ना महोदय के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के बाद अब सरकार अपना अन्ना विरोधी अभियान चला रहीहै ।
सरकार यह भूल रही है कि अन्ना भारत के दूसरे गाँधी हैं । और स्वतंत्र भारत के पहले गाँधी । जनता इसे माफ़ नहीं करेगी । सरकार को सुधार की मुहिम सरकार से आरंभ करनी चाहिए । यदि कांग्रेस चाहती है कि तीसरी बार सत्ता मिले तो उसे अन्ना और अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी जन लोक पाल बिल का सहर्ष स्वागत करना चाहिए । यदि सरकार बदले की भावना से काम करेगी तो मौजूदा सांसदों का दुबारा जीत कर आना मुश्किल होगा ।
सरकार जनता की प्रतिनिधि की तरह काम करे । राज शाही की तरह नहीं । अन्ना के खिलाफ लगातार अनुचित टिप्पणियां करने वाले सरकार के मंत्री और सांसद जनता के बीच सरकार की छवि धूमिल करने का काम कर रहे हैं ।


मंगलवार, 30 अगस्त 2011

कहीं कोई सपना नहीं था

कल रात देर तक नींद नहीं आयी ।
तो सोचा कि कुछ रुका हुआ काम निबटा लिया जाय । लेपटोप पर कवितायेँ टाईप की
काम करते- करते तीन बज गए थे । इस बीच रात में कई बार बाहर आया । रात के अँधेरे का सन्नाटा बहुत डरावना लग रहा था ।

पेड़ कैसे रहते होंगे इस भयानक सन्नाटे के बीच ।
किसी पत्ते के गिरने की आवाज भी डरा देती है । मैंने खूबसूरत चांदनी रातों को भी देखा है ।और उन रातों में खड़े पेड़ों की मस्ती और ख़ुशी भी ।
रात भर काम करता रहा, बरसों पुरानी कविताओं के बीच से होकर गुजरा । लगा कि मैं कहीं कुछ छोड़ आया था । जो अब भी वहीँ पर है । एक नदी आज भी वहीँ पर बह रही है । उसकी सायं -सायं कि आवाज अब भी अपनी ओर खींच रही है । आज भी कोई मुझसे मिलने की आतुरता में घर से निकलने का बहाना ढूंढ़ रही है ।

जैसे- तैसे मैंने कवितायेँ समेटी । घडी देखी तो साढ़े तीन बज चुके थे ।
सिर्फ डेढ़ घंटा सोया ।
लेकिन कहीं कोई सपना नहीं था ।

सोमवार, 29 अगस्त 2011

सत्यमेव जयते

तमाम तरह के विवादों/विरोधों के बाद अंततः संसद की गरिमा कायम रही और जन भावना का सम्मान हुआ । इसे किसी की जीत की तरह नहीं देखना चाहिए । यह एक समाधान था ।
स्वतंत्र भारत में सत्य और अहिंसा का पहला राष्ट्रव्यापी प्रयोग जो पूरे विश्व को एक सन्देश भी दे गया ।

यह तो सर्वमान्य तथ्य है कि दुराचार एक न एक दिन ख़त्म होता ही है । चाहे वह कितना ही सशक्त क्यों न हो ।
लेकिन एक महत्त्वपूर्ण बात सामने आई । सत्य में शक्ति है । कि सिर्फ एक ईमानदार व्यक्ति के पीछे पूरा भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया खड़ी हो गई ।और दिग्गज नेताओं का समूह भी उसके आगे बौना हो गया । यह ईमान के प्रति लोगों की श्रद्धा है । और भ्रष्टाचार के विरुद्ध नफ़रत भी ।



शनिवार, 27 अगस्त 2011

Abhinav Gatha: अन्ना हजारे , देश के आम भारतीय की आवाज .

Abhinav Gatha: अन्ना हजारे , देश के आम भारतीय की आवाज .: आम भारतीय ईमानदारी तथा शराफत से अपना जीवन यापन करने में बिश्वास करता है . अहिंसा ,शांति और धैर्य उसकी पहचान है ,ताकत है । और चाहता है कि दूस...

अन्ना हजारे , देश के आम भारतीय की आवाज .

आम भारतीय ईमानदारी तथा शराफत से अपना जीवन यापन करने में बिश्वास करता है . अहिंसा ,शांति और धैर्य उसकी पहचान है ,ताकत है । और चाहता है कि दूसरा व्यक्ति भी अपना ईमान कायम रखे ।आम भारतीय सिर्फ अपना नहीं ,बल्कि पूरी दुनिया में सत्य अहिंसा और शांति की कामना करता है ।
लेकिन क्या आम भारतीय का नेतृत्व भी उतना ही पाक -साफ़ है ।
यक़ीनन नहीं ।
इसीलिए भ्रष्ट्राचार के खिलाफ अन्ना हजारे को अनशन करते हुए बारह दिन हो गए हैं ।यह भारतीय संसद और सरकार के लिए शर्म का विषय है . अन्ना हजारे के पीछे खड़ी होने वाली भीड़ ने साबित किया कि अन्ना हजारे पूरे देश के आम भारतीय की आवाज है । देश का नेतृत्व भ्रष्ट्राचार के दलदल में डूबता जा रहा है । सांसदों ,मंत्रियों ,मुख्यमंत्रियों के मुह पर सत्ता और दौलत का खून इस तरह लग गया है कि वे घोटालों ,रिश्वतखोरी ,भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध बोलने वालों को ही मार खाने को दौड़ रहे हैं ।
वे जन शक्ति को भूल गए हैं । वे यह भी भूल गए हैं कि हमें संसद भेजने वाली यह आम जनता ही है । जिसे ज्यादा समय तक बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है ।
और सरकारी पक्ष के सभी सांसदों ने अन्ना हजारे के अनशन को एक मजाक बना कर रख दिया है ।
सरकार बदहवास हो गयी है केबिनेट के मंत्री अपनी वाणी पर अपना संतुलन खो चुके हैं।
सरकार और सांसदों ने सिद्ध किया कि भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के हित सर्वोपरि है ।


सोमवार, 25 जुलाई 2011

खाली पन्ने

कभी -कभी मैं सोचता कि कुछ भी न लिखना ही बेहतर होता है । पन्ने को यूँ ही छोड़ देना अच्छा लगता है । कोई शब्द न हो । कोई आकृति न हो ।
आश्चर्य !कि लोग उसमें से भी अपने विचारों के अनुसार सामग्री पढ़ने की कोशिश करते हैं । यानि कि पन्ना कोरा नहीं रहता । आकाश बिल्कुल खाली रहने के बाद भी लोग आकाश में अपना कोई कोना तलाशते हैं ।
अपने विचारों के लिए कोई सितारा तलाशते हैं । खाली आकाश से बातें करते हैं । या मौन होकर आकाश को एकटक निहारते हैं । तारों के बीच देखने की कोशिश करते हैं अपने बिछुड़े हुए प्रिय जनों को ।


लोग खाली पन्नों की किताब को सहेज कर रखते हैं । क्योंकि उसमें दर्ज किया जा सकता है जीवन --मृत्यु पर्यंत ।
लेकिन बहुधा खाली पन्नों की किताब खाली ही रह जाती है।

शनिवार, 2 जुलाई 2011

हरियाली है तो जीवन है .

आज पूरा दिन हरियाली की किताब पढ़ता रहा । पिछले तीन -चार दिनों की बारिश के बाद आज चटख धूप थी । धरती के सारे रंग एक नयी आभा से चमक से गए थे ।
आँखों के सामने पहाड़ों में फैली हरियाली थी । जिनमें से पढ़नी थी कथाएं अतीत की । और कथाएं अपने चारों ओर बिखरी लोगों की दिनचर्या की ।
खेतों और हरियाली / अनाज की पौंध से कितना प्यार करती हैं महिलाएं । सब कुछ भूलकर खेतों में रोपाई करने में व्यस्त हैं । कभी बारिश झम्म से आकर उन्हें भिगो जाती है तो कभी धूप गरमी से त्वचा जलने को तैयार रहती है । लेकिन ममता तो ममता है । धान हैं तो सपने हैं । हरियाली है तो जीवन है / प्यार है ।

हरियाली है तो आशा है ।
उमंग है ।

और हैं सपने ।

गुरुवार, 30 जून 2011

रात भी एक कविता है .

रात भी एक कविता है ।
कभी ख़ामोशी से पढो ।
दिन से तय कर लो कि आज रात के साथ वक़्त गुजारना है ।
रात के रंग देखने हैं ।
रात आने वाले सपनों का भी स्वागत करना है ।
रात को आपके पास सिर्फ रात रहे ।
कोई शब्द नहीं ।

कभी -कभी शब्द जब ख़ामोशी तोड़ते हैं ।
तो रात चली जाती है ।
तब हम सिर्फ एक अँधेरे से घिरे हुए होते हैं ।

मंगलवार, 28 जून 2011

प्रेम की बरसात में .

पानी से भरे बादल मन के आकाश को घेरे हुए हैं ।
मेरे भीतर की जमीन देख रही है बादलों को कि बरसे तो भीगेगा रोम -रोम ।
प्रेम की फसल के लिए जरूरी है भीतर के बादलों का बरसना ।
बरसेंगे बदल तो जरूर खिलेंगे हरी जमीन पर हल्के गुलाबी रंग के प्रेम के फूल।
हर चेहरे खिला होगा प्रेम का खूबसूरत रंग ।
लोग मिलेंगे आपस में प्रेम की बरसात में भीगते हुए ।

सोमवार, 20 जून 2011

साँसों में सुगंध

सुबह काफी देर फूलों और पत्तियों के रंगों में खोया रहता हूँ कोशिश करता हूँ कि यह रंग और सुगंध मेरी कविताओं में आ जाय ।या मेरी प्रेमिका की सांसों में . फिर खेतों की तरफ देखता हूँ ।
आजकल खेतों में मेला- सा लगा हुआ है । कोई गुड़ाई में व्यस्त है तो कोई रोपाई में । जमीन में हरे रंग के छींट की चादर बिछने लगी है । किसान सपने बो रहे हैं , सपनों की रोपाई कर रहे हैं ।
बारिश इस रंग में आनंद का एक और रंग घोल रही है ।
खेतों में भीगने का आनंद ।
तन के साथ साथ मन के भीगने का आनंद । बादलों के साथ -साथ घूमने का आनंद . बादलों के बीच सांस लेने का आनंद ।
लगता है कि इस मौसम में पेड़ -पशु- पक्षी -कीट -पतंगे सब एक अनूठे आनंद का अनुभव लेते हैं । एक नई उर्जा अपने भीतर जमा करते हैं .

मंगलवार, 24 मई 2011

आम आदमी का संघर्ष

हम सब देख रहे हैं कि मौजूदा समय में देश को भयंकर आर्थिक असंतुलन ने अपनी गिरफ्त में ले रखा है । सत्ताधारियों की मनमर्जी ही उनकी मर्यादा है । सत्ता अधिक से अधिक धन कमाने का एक जरिया बन गया है । आमआदमी की कहीं कोई चिंता नहीं दिखाई दे रही है। और न ही आम आदमी के जीवन का कोई मूल्य रह गया है। भ्रष्ट नेता को जनता के बारे में सोचने की फ़िक्र कहाँ ? -यह लोक तंत्र का भयंकर असंतुलन हैं । और दुरुपयोग भी । इससे लोगों में लोक तंत्र के प्रति एक शंका उभरती है ।
ईमानदार आदमी को अपना उद्देश्य निरर्थक लगता है .
ईमानदार आदमी असुरक्षित है .क्योंकि सरकार ताकतवर भ्रष्टों का एक समूह बन बन गया है ।
समाज की वर्तमान जीवन शैली में कोई नहीं सोच रहा है देश में सिर्फ अपने आर्थिक हितों के बारे सोचने की एक लाइन बन गयी है सामाजिक हित दरकिनार हो गए हैं । मानवीय हित एक किनारे कर दिए गए हैं ।
एक नीति बन गई है कि कुछ भी करो किसी को भी मारो लेकिन रुपया बनाओ । समय रुपयों का है ।
आज आम आदमी प्रदूषित जिंदगी जीने को विवश है ।वह अपनेऔर अपनी आने वाली पीढ़ी के वजूद के लिए संघर्ष कर रहा है ।आम आदमी व्यवस्था बदलने की सोचता है । लेकिन हर बार दुर्भाग्य से सिर्फ सत्ता बदलती है । कभी चील सत्ता पर होती है तो कभी कौए ।

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

उफ!

रात जम कर बारिश हुई ।
बिजली भी चमकी ।
मैं दिल खोल कर बैठा था कि बिजली मेरे दिल में उतरेगी।
लेकिन मालूम नहीं किसके दिल में उतरी ?
जहां उतरी होगी वहां फूल खिल गए होंगे ।

मैं तो बस, भीगता रहा सारी रात । बिलकुल तनहा ।
सुबह देखा तो धरती चमक रही थी ।
रात बिजली हरियाली भी बिखेर गई होगी ।
उफ!

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

सुबह से इंतज़ार कर रहा हूँ कि कब बारिश हो । लेकिन बादलों को तो जैसे बूंदें गिराने में डर लग रहा है ।
इस मौसम में बारिश चाहिए ।
गधेरे/श्रोत /नदियाँ सूखने के कगार पर हैं । फसल को बारिश का इंतज़ार है । फूलों को भी अपने रंग बिखेरने के लिए बारिश चाहिए ।
बारिश में ही तन और मन भी भीगेगा ।
भीतर कहीं एक आग भी लगेगी ।

रविवार, 10 अप्रैल 2011

शाम होते होते इतना थक जाता हूँ कि ब्लॉग पर बैठे-बैठे नींद आने लगती है।
कभी -कभी लगता है कि लिखने के लिए कुछ नहीं बचा । लेकिन फिर दिखाई देता है कि इतना बचा है कि अभी तो शुरू भी नहीं माना जा सकता ।
इस देश में भ्रष्ट्राचार के खिलाफ सरकार को हिलाने के लिए एक ही व्यक्ति काफी है बशर्ते कि वह खुद भ्रष्ट न हो । स्वार्थी न हो ।
भ्रष्ट्राचार की हद तो काफी पीछे छूट गई है । इस कीचड़ में देश बहुत आगे निकल आया है ।
जनता के पास नेताओं का विकल्प भी होना चाहिए ।क्यों कि कुरसी मिलते ही नेता की सोच ख़त्म हो जाती है । विवेक ख़त्म हो जाता है । या भ्रष्टाचार के बल पर विवेकहीन सत्ता पर काबिज हो जाते हैं ।

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

शब्दों की माला

खेतों से गायब होने लगे हैं सरसों के बसंती फूल।
लेकिन जंगलों में मेहल, कनेर ,बुरांश ,पीहुली और भी कई तरह के फूल खिले हुए हैं । जंगलों में इस तैयारीको देख कर लगता है कोई परी इस धरती पर उतरने वाली है ।
या मेरी प्रेमिका ने यह सब सजा कर रखा है ।
बहर हाल यह कुछ भी हो , मैं तो मंत्र मुग्ध हो गया हूँ ।


शब्दों की माला गूँथ रहा हूँ । उसी के लिए
जिसने मेरे लिए जंगल सजाया ।
मुझे स्वप्न दिए । मुझे रंग दिए और प्रेम दिया।
जिसका कोई ओर न छोर
फूलों में रंग और सुगंध की तरह ही है जो मेरे भीतर ।

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

महफ़िल

बहुत दिनों से शब्दों की महफ़िल में किसी का इंतज़ार था
या कि शब्दों का ही इंतज़ार था ।
किसी भी बहाने से नहीं आ रहे हैं शब्द। न फूलों के बहाने से , न प्रेमिकाओं के बहाने से , न भूख के बहाने से , न अत्याचार के बहाने से ।
महफ़िल सजी हुए है । एक तनहाई छाई हुई है । शब्द कहीं नहीं हैं ।
यह ख़ामोशी मेरे भीतर एक ताना बना बुन रही है ।
एक कथा या कविता ।

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

गावं

आज घर पर ही था । कार्यालय में बैठकर कुछ काम निबटाये । पिछले कई दिनों से लगातार गावों के भ्रमण पर था ।
गावों को बहुत करीब से देखने का मौका मिला ।
गावं और पहाड़ -घाटियाँ मुझे बचपन से ही बहुत लुभाते हैं ।
संस्था के गठन के साथ ही पहाड़ के दूर दराज की जिंदगी को बहुत करीब से देखा । लोग बहुत कठिन जीवन जीते हैं ।
कठिन श्रम ! लेकिन कठिन श्रम के बाद भी आर्थिक रूप से काफी पीछे हैं । शिक्षा और जागरूकता का स्तर अभी बहुत पीछे है। आश्चर्य कि स्कूलों में लगभग सभी अध्यापक स्थानीय होते हैं। यानि सभी शिक्षक स्थानीय होने के नाते जिम्मेदार भी होने चाहिए । लेकिन ऐसा नहीं है। शिक्षा तो जैसे इन स्कूलों पर आकर थम जाती है । छात्रों का विकास यहीं से अवरुद्ध होना शुरू हो जाता है । एक गावं का परिचय वहां के बच्चे दे देते हैं । आप उनसे कुछ बोलो मत, कुछ पूछो मत. बस उनकी गतिविधियाँ देखते रहो ।
फिर भी पहाड़ के लोग बुद्धिमान , एकांत ,और शांत प्रिय लोग होते हैं ।

रविवार, 16 जनवरी 2011

सपनों का सच


कल दिनभर सपनों को सींचती रही बारिश,
कल दिन भर की बारिश के बाद एक खुशनुमा दिन ।
दिन धूप की किरणों के साथ चुपचाप खिसकता गया । मैं धूप में बैठा सपनों के ताने -बाने बुनता रहा । कुछ देखे हुए सपने ,और कुछ अनदेखे सपने ,देखे हुए सपनों के धागों से अनदेखे सपनों के चित्र बना रहा था ।
सतरंगी किरणें चुपचाप मेरे सपनों में रंग भर रही थी । मैं सपनों को आकार लेते हुए देख रहा था ।


मेरे सपनों को इंतज़ार था प्राणों का ,मुझे सपनों में प्राण डालने हैं । सपनों में प्राण तो हमें ही पिरोने होते हैं ।

सपने सच भी होते हैं ।
होते भी आये हैं । बिलकुल सच । जैसे देखे थे । तुमने, मैंने ,उसने ,हम सब ने ।

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

प्रकृति

सुबह धूप देर से आयी । लेकिन बड़ी मजेदार ।
लेकिन मेरे पास वक़्त नहीं था कि मैं धूप के साथ कुछ देर खड़ा रह सकूँ ।कुछ देर बहती छलछलाती नदी के पास जाऊ ,कुछ देर मछलियों से बातें करूँ ।
और सुबह की ठण्ड भी बहुत तीखी थी लेकिन उसको भी महसूस करने का वक़्त मेरे पास नहीं था । मेरे पास सफ़ेद कुहरे के पास जाने का भी वक़्त नहीं था ।
लगता है कि मेरे केंद्र से प्रकृति हट गई है ,प्रकृति साहित्य के केंद्र से भी हट गई है । कविता के केंद्र से भी हट गई है ।


प्रकृति युद्ध के केंद्र में है ।
और युद्ध का नियंत्रण महाशक्तियों के हाथ में है ।
हर ओर तबाही
भयंकर विनाश । .........दूसरों के विनाश में ही महाशक्तियों का जीवन है ।अन्यथा वे कुछ नहीं
यह सब हमारे हाथ में नहीं । हमारे हाथ में तो सिर्फ लिखना है । बस कुछ अच्छा लिखा जाय ।

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

पलायन का दंश


एक गावं सुराना रिखारी से अभी-अभी लौटा हूँ । प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर गावं । यहाँ से चारों ओर का नजारा देख सकते हैं .हिमालय श्रंखला की हिमाच्छाद्दित पहाड़ियां मन को मोह लेती हैं । तो नीचे की ओर रामगंगा घाटी आकर्षित करती है ।इतनी ऊंचाई पर बसा यह गावं प्राकृतिक रूप से धनी होने के साथ -साथ फसल उत्पादन में भी आत्म निर्भर है । यहाँ पानी भी प्रचुर मात्र में उपलब्ध है । इसे प्रयास करके आर्थिक रूप से भी आत्म निर्भर बनाया जा सकता है । लेकिन यह गावं भी रोजगार की कमी के कारण पलायान का दंश झेल रहा है । पहाड़ों में गावों में उत्साही नवयुवकों के पलायन से वृद्ध लोगों के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई है । वे लोग भी अकलेपन का दंश झेल रहे हैं ।
मैंने अभी तक देखा है कि गावों में रोजगार सृजन के लिए प्रयास किये जायं तो काफी हद तक पलायन रुक सकता है ।
नेट पर बैठ कर मेल देखी । कुछ काम निबटाये ।
सुबह दिल्ली से मामाजी जी आये थे । कुछ देर उनके साथ बैठ कर बातें की।

रविवार, 5 दिसंबर 2010

कुछ लिखना चाहिए

अचानक ठण्ड बढ़ गई है । लगता है कि शीत लहर शुरू हो गई है ।
दिन यूँ ही बीता । गावं की तरफ गया । धूप थी लेकिन ठण्ड के कारण महसूस नहीं हो रही थी ।
इस बार वारिश हुई तो सीधे बरफ गिरेगी ।
बर्फ के साथ गिरेंगी यादें ।
सुबह उमा के हाथों की पहली चाय और फिर अखबार के साथ दिन की शुरुआत की । कविताओं में खोने की सोच रहा था ,खोया ,लेकिन कविताओं में नहीं , बरफीली पहाड़ियों में । ठंडी हवाओं में । हरे भरे जंगलों में ।
लौटा तो लगा कि खाली लौट आया । एक शून्य मेरे भीतर था ।
जिसमें कहीं कोई शब्द नहीं था ,
कोई आवाज नहीं थी ,बिलकुल निः शब्द ।


लौटने के बाद मैंने और उमा ने साथ चाय पी । अच्छा लगा। शून्य में एक दस्तक ।
द्वार खोलो शब्द भीतर आना चाहते हैं ।
मुझे लगा कि आज तो कुछ लिखना ही होगा ।
सांझ ढल गई ठण्ड ने फिर आ घेरा । सारे पक्षी अपने अपने घोंसलों में लोट आए हैं । इस मोह ने एक शून्य को तोडा
और मैं फिर शब्दों के बीच आ बैठा । सोचा कि कुछ लिखना चाहिए ।

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

अंतर

ठण्ड अब बढ़ने लगी है । धूप मीठी लग रही है । और मौसम बिलकुल साफ़ है ।
आज कई दिनों के बाद लिखने बैठा हूँ ,इस लिए सोच रहा हूँ कि क्या लिखूं ? नेताओं को मुद्दे चाहिए ,चाहे वह समाज के लिए कितना ही घातक क्यों न हो .वहां विवेक का कोई महत्त्व नहीं है
और लेखक को विषय .किन्तु विवेक के साथ ।
एक सत्ता से उतरते ही भुला दिया जाता । और दूसरे को पीढियां याद करती हैं एक के सम्मान की सीमा है और दूसरे का सम्मान वैश्विक होता है । एक अथाह दौलत पाना चाहता है और अथाह दूसरा ज्ञान । एक समेटता है दूसरा बांटता है. यह समाज है ।
आदमी और आदमी के बीच सत्ता ने एक गहरी खाई खोद रक्खी है । उस खाई को पाटे यही लेखक का काम है ।

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

उल्लास भी एक रौशनी है


दीपावली पर सभी मित्रों व पाठकों को हार्दिक शुभ कामनाएं .
आज लगा कि कुछ अपनी बात कहनी चाहिए । कई दिनों से खामोश था ।
बिलकुल मौन । यानि एक प्रकार से अँधेरे को ओढ़े हुए ,
दीपावली - प्रकाश पर्व पर तो हर ओर प्रकाश होना ही चाहिए
उल्लास भी एक रोशनी है ।
और उम्मीद भी । दोनों एक साथ मिलें तो मंजिल की ओर एक उत्साह के साथ कदम बढ़ेंगे ।

बुधवार, 29 सितंबर 2010

यह दैवीय आपदा थी

आज बहुत दिन हुए अपने ब्लॉग पर बैठे । इस साल की बारिश ने बहुत तबाही मचाई । लग रहा था कि pरक्रती सब कुछ तबाह कर डालेगी । पहाड़ की हर सड़क हर १०० मीटर पर या तो टूट गई थी या ऊपर दे मलवा आने के कारण अवरुद्ध हो गई थी कई जगह तो सड़क का नामो निशान ही नहीं था । एक हफ्ता तक यातायात ठप रहा । वह तो जे सी बी/अर्थ मूवर ने ताबड़ तोड़ चौबीसों घंटे काम करके कुछ मुख्य सड़कें हलके वाहनों के लिए खोल दी .खाने की चीजें ख़त्म होने लगी .आपूर्ति बंद हो गई .हर ओर बाढ़ - भू स्खलन का खतरा मंडरा रहा था । और बारिश थी की थमनेका नाम ही नहीं ले रहे थी .इन्हें दुरुस्त होने में बरसों लगंगे हर गावं में मकानों में दरारें आई कई मकान मलवे के नीचे जमींदोज हो गए . कई लोग दब कर मर गए। ऊपर से पहाड़ धंस कर आने से एक स्कूल में मलवा दीवार तोड़कर अन्दर आने से एक दर्जन से अधिक बच्चे दब कर मर गए । कई आदमी/ औरतें उफनते नदी नालों में बह गए पहाड़ों में भयंकर तरीके से भू स्खलन हुआ .प्रशासन ने कई जगह गावं के गावं खाली करवाए । लोगों ने दहशत में रातें बिताई । लग रहा था कि हर पहाड़ दरकने वाला है ।विशाल चट्टानें खिसक कर ऊपर से नीचे तक आगई . खड़े पहाड़ों के नीचे का हर गावं जमींदोज होने के खतरे के अन्दर था .पूरा उत्तराखंड बरसों पीछे चला गया । लोगो को बचाने के सरकार के प्रयास बहुत सराहनीय थे ।

अब धूप आयी । लेकिन लोगों के आंसूं अब भी बरस रहे हैं । किसी का घर गया तो किसी का प्राणों का प्यारा ।

यह दैवीय आपदा थी । समर्थ पर भी आयी और असमर्थ पर भी ।

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

कामन वेल्थ का खेल

आज सुबह टी वी पर कामन वेल्थ खेलों का संगीत देखा , बेहद शर्मनाक प्रस्तुति थी ।भारतीय शास्त्रीय संगीत के सन्दर्भ में तथा भारतीय शास्त्रीय नृत्य के सन्दर्भ में बेहद निराशाजनक स्थिति लगी । भारतीय संस्कृति तथा सैकड़ों क्षेत्रीय संस्कृतियों के इस देश में क्या परोसने के लिए कुछ नहीं था । रहमान साहब को क्या यह नहीं बताया गया था कि कामन वेल्थ खेल भारत में हो रहे हैं ।
यह सरकार को धिक्कारने का विषय है ।
भारत के किसी भी कोने से कुछ भी लिया होता तो गर्व का विषय होता ।
स्पष्ट होता है कि संसद में कैसे लोग बैठे हैं ।लगता है कि आत्म सम्मान के खेल में हम खेलने से पहले ही हार गए हैं । खेलों में घोटालों के महा खेल के बारे में तो खेलों के बाद ही मामला साफ़ होने के बाद कुछ कहा जा सकेगा । जब धुआं उठा है तो आग भी जरुर लगी होगी।
आज कई दिनों बाद आसमान साफ़ देखा । जमीन पानी से पूरी तरह भर चुकी है । नदी नाले भरे हुए हैं यह बारिश कई बरसों बाद हुई है । हालाँकि काफी जान माल का नुक्सान हुआ .बहुत लोगों ने अपनों को खोया यह बारिश उनके लिए कहर बनकर बरसी । फिर भी धरती के लिए यह बारिश अमृत की तरह थी ।
यह धूप भी अमृत की तरह लग रही है ।

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

हरा मौसम

आज काफी दिनों के बाद अपने ब्लॉग पर बैठा हूँ एक अजीब -सी उधेड़बुन में हूँ कि क्या लिखूं और क्या न लिखूं ? बरसात अपनी हद से आगे निकल कर सब कुछ तहस नहस करने पर आमादा है । कभी पहाड़ सूख रहे थे और अब जगह-जगह पहाड़ धंस रहे हैं । लगता है कि पहाड़ों पर बना हर मकान खतरे की जद में है ।
यह सब अनियंत्रित निर्माण का नतीजा है ।
दिन बहुत व्यस्त रहा । दोपहर बाद कमरे से बाहर निकलने का समय नहीं मिला । कुछ प्रधान लोग आये थे । उनके साथ बातों में रह गया । शाम को बाहर निकल कर कुदरत का नजारा देखा । हरियाली धरती पर बिछ गयी है ,। एक हरे कालीन की तरह ,जिस पर चलते हुए हरे सपने देखे जा सकते हैं ।
यह मौसम प्यार का है । और इसे सहेज कर रखा जा सकता है।
बादलों को देखा । अभी पानी से भरे आकाश में घूम रहे थे लग रहा था कि बरसने के लिए जगह तलाश रहे हों ।
कई दिनों से पुराने सूख चुके झरनों को फिर झरते देखा ।लगता था कि दूध के झरने हैं ।

सोमवार, 2 अगस्त 2010

हरे सपनों का संसार

हरी भरी धरती जीवन में उत्सव की तरह है ।
हम इस रंग से बहुत उत्साहित होते हैं । और चाहते हैं कि इस हरियाली को हम दीर्घजीवी होकर देखते रहें । इसमें हमारा अतीत भी है और भविष्य भी । स्वप्न भी सच्चाई भी ।
एक सुखद अनुभव भी ।
मैं चाहता हूँ इस हरियाली को अपने रोम -रोम में उगा लूँ , सपनों में सहेज कर रख लूँ । थोड़ा धूप , थोड़ा बादल और थोड़ा पानी अपने भीतर जमा कर लूँ ।
ताकि मेरे भीतर भी हरियाली हमेशा रहे ।

शनिवार, 31 जुलाई 2010

पेड़ लगायें

वारिश में दिन कमरे में ही बीता। कुछ देर रामगंगा नदी देखने गया .अपने पूरे उफान पर थी । देख कर सर चकरा रहा था । लौट कर अपने कमरे में बैठ गया
यह हरियाली,मौसम का यह रूप सहेज कर रखने लायक है
ऐसी बारिश समय समय पर होती रहे तो पहाड़ों में गर्मियों में पीने के पानी की परेशानी नहीं होगी और वातावरण भी स्वच्छ रहेगा ।
हमें इसके लिए अधिक से अधिक बांज ,उतीस ,देवदार बुरांश कंफल के पेड़ लगाने चाहिये।

बुधवार, 21 जुलाई 2010

शिक्षा का गिरता स्तर

पिछली पोस्टें देख रहा था तो कैलाश देवतल्ला भाई की टिप्पणी पर नजर पड़ी - भाई इस समय तो पिछले तीन दिनों से गावं वारिश में नहा रहा है । बहुत मजेदार वारिश हो रही है ।
गावं कोई भी हो इस समय बहुत खराब दौर से गुजर रहे हैं । हर गावं पलायन का दंश झेल रहा है । कई जगह तो गावं का अस्तित्व ही खतरे में है ।
बेरोजगारी के साथ-साथ शिक्षा का गिरता स्तर भी इसके लिए जिम्मेदार है । सरकारी स्कूलों में किताबें निःशुल्क मिलती हैं दोपहर का खाना निःशुल्क मिलता है फिर भी इन स्कूलों में कोई अपने बच्चों को नहीं भेजना चाहता है । खुद इन्हीं शिक्षकों के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ने जाते हैं ।सरकारी स्कूलों के अध्यापकों का वेतन भी निजी स्कूलों के अध्यापकों के वेतन का दस गुना तक ज्यादा है इसके अलावा सरकारी अध्यापकों को दुनियां भर की ट्रेनिंग दी जाती हैं । । लेकिन निजी स्कूलों मे बिना किसी विशेष ट्रेनिंग के भी बेहतर काम दिखाई देता है । सरकार भी बच्चों के साथ खिलवाड़ में पीछे नहीं है । हर वर्ष किताबें बदल जाती हैं । और छात्रों तक किताबें पहुचने में भी बहुत बिलम्ब होता है ।आखिर यह सब क्यों ? बच्चों के साथ यह खिलवाड़ क्यों ? शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है । यह सब सरकारी नियंत्रण से हटाना होगा।

शनिवार, 17 जुलाई 2010

हरियाला आप सभी को मंगलमय हो .



हरियाला त्यौहार पर सभी उत्तराखंड वासियों व सम्मानित पाठकों को हार्दिक बधाई । यह हरियाली धरती पर कायम रहे यही कामना है सब कुछ हरा भरा हो बाहर भी - भीतर भी ।आँखों में प्रेम का हरीतिमा छाई रहे । बातों में प्रेम का हरा पन हो ।
हरियाली , चारों ओर हरियाली .

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

अपनी कहानी

सुबह से लेकर दिन ढलने तक की दिनचर्या एक कहानी बन चुकी होती है । अपनी कहानी । जिसे देख भी सकते हैं ,सुन भी सकते हैं दूसरों को सुना भी सकते हैं , पढ़ भी सकते हैं .विश्लेषण भी कर सकते हैं । पर उस कहानी को सम्पादित कर उसमें कोई बदलाव नहीं कर सकते हैं । उस कहानी कोई री -टेक नहीं है। किसी को कुछ कह दिया तो कह दिया । रोटी खाई तो खाई । नहीं खाई तो नहीं खाई । हारे तो हारे ,जीते तो जीते । एक अंश मात्र भी बदलाव की संभावना नहीं ।
अपनी कहानी का एक पात्र हूँ । और एक रस्सी की तरह बहुत सारी चीजों को अपने इर्द-गिर्द लपेटते हुए कई पात्रों को अपने साथ जोड़ते हुए
सब लोगों के बीच खड़ा हूँ या साथ चल रहा हूँ ।
हर रोज अपनी कहानी खुद ही पढ़नी होती है । बिलकुल अकेले ।
रोज की तरह सुबह उठा , पत्नी चाय बनाकर ले आयी । बाहर सुबह की ठंडी बयार में बैठ कर चाय पी । और फिर अपने रोजमर्रा के कामों में जुट गया । एक -एक पल एक कहानी को रचते हुए ।
चारों ओर की सुखद हरियाली ,बादलों से भरा नीला आकाश । और मैं अपने सपनों को तराशते हुए आगे बढ़ते हुए आज की कहानी लिखने बैठा हूँ ।- काश! मौसम का यह रूप हमेशा साथ रहता .
रात स्वप्न अपनी कहानी लिखेंगे ।
कभी -कभी स्वप्न भी बहुत भयानक कहानी रच डालते हैं । बावजूद इसके स्वप्नों की कहानी भी होती बड़ी दिलचस्प है। और हम बहुत कुछ स्वप्नों की कथा में भी छुपाते हैं । खुद अपनी पत्नी से भी । जो कि हमारी कथा की सबसे पहली पात्र है .

शनिवार, 10 जुलाई 2010

अतीत का केनवास

शनिवार । दिन बहुत गर्म था ।
रूटीन के काम निबटाये . कुछ पुराने कागज पत्र देखे । कुछ बेकार -से कागज जलाये ।
लगा की यादों को जला रहा हूँ । लेकिन यादें हैं कि और ताजा होती जाती हैं
फिर सोचा कि यादों को इस तरह नहीं जलाना चाहिए । उन्हें सहेज लेना ही बेहतर होगा .चाहे मन के किसी कोने में । कमरे की दीवारों में यादों के लिए भी जगह होनी चाहिए ।
कभी- कभी अंतर्यात्रा के समय मन की यादों की गेलरी से होते हुए जाना काफी सुकून भरा लगता है । उस गेलरी में एक विराट केनवास है ।जिसे देखते हुए निकलना बहुत आश्चर्य भरा लगता है । यकीन नहीं होता है कि इस केनवास में चित्रित चित्र स्वयं की जिंदगी के हिस्सा थे । अच्छे या बुरे - सुखद या दुखद , यह बात अलग है ।
अंतर्यात्रा आत्म सुधार के लिए का एक अवसर भी है । आत्म समालोचना भी है। कि हम कहाँ थे और कहाँ हैं ।

मंगलवार, 6 जुलाई 2010


दो दिनों से लगातार बारिश से धरती नहा रही है । और निखरती जा रही है । हरियाली का यह रूप सम्मोहक है । मन को अनूठी शांति मिलती है .पहाड़ों की घाटी हो या शिखर या आकाश । यह बदलाव हमारे मन के भीतर नयी ऊर्जा और ताजगी देता है । नदी- नाले, गाड़-गधेरे सब पानी से भर गए हैं , अभी कुछ दिनों पहले की पानी की त्राहि -त्राहि मची थी .और आज तो लगता ही नहीं कि पांच दिन पहेले इतना भयानक सूखा पड़ा था ।
सुबह अल्मोड़ा जाने की तयारी की थी लेकिन बारिश को देखते हुए फिर कार्यक्रम बदल दिया ।
कमरे में बैठ कर पुराने कागज छांटे कमरे की सेटिंग बदली कुछ रुका हुआ काम किया और मौसम का पूरा आनंद लिया । इत्मीनान से बारिश में भीगा ।
बारिश को अभी भी चैन नहीं । लेकिन जमीन को अभी लगभग चार दिन-रात बारिश चाहिए ।

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

आदमी कितना असहाय है


दिन भर कई काम किये । कभी इधर तो कभी उधर । बारिश की इंतजार में बीता दिन । मौसम अपने समय से काम न करे तो एक भयंकर असंतुलन पैदा हो जाता है । लोग परेशान होने लगते हैं । ईश्वर पर से भरोसा उठ भी जाता है और ईश्वर पर भरोसा करने के आलावा कोई रास्ता भी नहीं दीखता । आदमी कितना असहाय है इस वैज्ञानिक युग में । आज जबकि विज्ञानं ईश्वर की हर रचना को चुनौती दे रहा है ।
टी वी पर बाजार में बिक रहे नकली मिलावटी सामान/फलों के बारे में देख रहा था । यह जहर पूरे समाज को कमजोर /बीमार कर देगा .हमें घरेलू जरुरत की चीजें सीधे किसानों से खरीदने चाहिए । या बाजार सेकच्चा माल खरीद कर घर में तैयार करनी चाहिए ,

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

महंगाई

महंगाई भले ही अरबपति मुख्यमंत्रियों /करोडपति मंत्रियों /उद्योगपतियों /नौकरशाहों /बड़े व्यापारियों के लिए कोई मायने नहीं रखती हो लेकिन बेरोजगार/छोटे किसान /गरीब और मजदूर के सामने तो संकट खडा कर ही देती है । महंगाई तो बढ़ी पर मजदूरी या किसानों के उत्पाद का मूल्य वहीँ का वहीँ रहा । इस महंगाई से तो एक भयंकर सामाजिक असंतुलन पैदा हो गया है .
दूसरी सबसे बड़ी समस्या किसानों के लिए पानी की दिखाई दे रही है । जल स्तर कम होने से सिंचाई प्रभावित हो रही है ।सरकार के पास प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के अलावा प्राकृतिक संसाधनों के विकास की कोई नीति नहीं दिखाई दे रही है । पहाड़ों पर सड़कें तो बनाई जा रही हैं लेकिन सडकों के निर्माण में इन्जिनिरियंग का काम कोई बेहतर नहीं दिखाई दे रहा है । यहाँ की इंजीनियरिंग का कार्य अदूरदर्शी है । प्राकृतिक स्थितियों से इनका कोई विशेष लेनादेना नहीं दिखाई देता है । इन्हें पैसा और पहाड़ दिखाई देता है अन्धान्धुन्ध तरीके से पहाड़ खोदे जा रहे हैं ।
सुबह मालूम नहीं कैसी थी ।
दुकान खोलते ही तीन चार ततैयों ने डंक दे मारा ।
सुबह का सुहानापन तो दर्द की भेंट चढ़ गया । लेकिन दर्द तो मुझे हुआ था सुबह तो हर रोज की तरह सुहावनी ही थी ।

कैसी थी सुबह

देखा ही नहीं कि सुबह कैसी थी
यह भी याद नहीं कि सबह के साथ धूप आई या नहीं । खेतों में किसान भरे पड़े थे । सब आपाधापी में थे । देख रहा था कि औरते खेतों से कितना प्यार करती हैं ।
सुबह एक चक्कर गावं गया माई थान दिया जलाया
दिन कंप्यूटर पर बीता । सीधा -साधा नामालूम- सा
गावं में आम आदमी महंगाई के बोझ के नीचे खो -सा गया है । महंगाई के साथ ही उसकी मजदूरी को भी बढ़ाया जाना चाहिए । करोड़ पति मंत्री /नेताओं /उद्योगपतियों और नौकर शाहों के लिए चीजों का महंगा होना कोई मायने नहीं रखता है.लेकिन गरीब के लिए तो महंगाई होना कुँए में धकेले जाने के समान है

शुक्रवार, 25 जून 2010


शनिवार .पूरे हफ्ते के कामों के पुनरावलोकन का दिन । कोई विराम नहीं । काफी दिनों से अपनी कविताओं व आत्मकथा को सम्पादित व व्यस्थित करने की सोच रहा हूँ लेकिन इसके लिए समय प्रबंधन नहीं कर पा रहा हूँ । लगनों के सीजन के कारण समय नहीं निकाल पा रहाहूँ । पिछले महीने अपनी पुरानी सुमो बेचकर नयी स्पार्क कार लाया हूँ इससे थोड़ा व्यस्तता बढ़ गई है । और अव्यस्थित भी हो गया हूँ
मौसम में एक खुशनुमा परिवर्तन हुआ है । वारिश ने धरती के साथ-साथ लोगों के चहेरे के रंग भी बदल दिए हैं । खेतों में नयी रंगत लौट आयी है । और लोग खुश हैं कि अब कुछ होगा .खेतों में मेला लगा हुआ है । लगता है कि यह समय किसानों का ही है ।

शनिवार, 22 मई 2010

अभी अभी एक निमंत्रण से लौटा हूँ । आजकल निमंत्रणों की भरमार है । पिछले दिनों की वारिश से मौसम में कुछ तबदीली आई है । वर्ना इस वर्ष गर्मी से बुरा हाल होता ।
कुछ ख़ास नहीं लिख पाया । हिंद युग्म में कुछ कवितायें प्रकाशित हुई ।

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

आखिर कब तक ?

आज दिन बहुत गर्म था । लगता था कि जून आ गया ।
मौसम का यह मिजाज लोगों को विचलित कर रहा है । शहर और गावं दोनों चिंचित हैं .वह किसान हो या नौकरीपेशा चिंता हर कहीं है । करोड़ों रुपये खर्च करके भी आप कुदरत के रस्ते नहीं रोक सकते .क्योंकि आपने ही करोड़ों खर्च करके कुदरत के साथ खिलवाड़ किया है । कुदरत नदी या हवा के प्रदुषण के लिए जिम्मेदार नहीं है । कुदरत जंगलों के सफाए के लिए भी जिम्मेदार नहीं है । यह सब अपने आप नहीं हो रहा है । यह किया जा रह़ा है ।
दर असल जबतक ये जिम्मेदारियां तय नहीं हो जाती तब तक सुधार की कोई भी कोशिश सफल नहीं होगी और हालात बदतर होते जायंगे । हवा और पानी के लिए घर -घर लड़ेंगे गली -मोहल्ले लड़ेंगे , गावं-गावं लड़ेंगे ,शहर -शहर लड़ेंगे ,देश- देश लड़ेंगे । लेकिन सुधार की तरफ कोई नहीं सोचेगा ।हर किसी के अपने स्वार्थ हैं . पूंजीपतियों के अपने स्वार्थ हैं .फैक्ट्रियों और नेताओं के अपने स्वार्थ हैं . आज पानी बोतलों में बिक रहा है कल हवा बिकेगी फिर धूप बिकेगी । ये स्थिति आने वाली है । वर्तमान हालात को देखते हुए यह स्थिति ज्यादा दूर नहीं दिखती । क्योंकि अपनी तरफ से कोई कुछ करता नहीं दिखाई नहीं दे रहा । सबकी नजर सरकारी वजट पर है । और वजट की बन्दर बाँट होती है । फिर सब कुछ वैसा का वैसा । हम सुधार की प्रक्रिया को अपने पूजा -पाठ या भोजन की तरह अनिवार्य क्यों नहीं बनाते ?

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

कहानियां तरह-तरह की

हर रोज अपनी बात कहनी होती है . या कहूँ कि पल-पल को जोड़ कर एक कहनी बनानी होती है .जो बहुत रोचक हो । कहानी सिर्फ अपनी ही लगाने से नहीं बनती है । उसमें दूसरों को भी जोड़ना होता है या घसीटना होता है । मैं जिससे मिला और जो मुझसे मिला उसे भी । किसी फूल के पास जाकर कुछ पल उसके पास बैठना ,उसकी सुगंध में शामिल होना और उससे चुपचाप मन ही मन अपनी बात कहना भी प्रकृति के साथ हमारे व्यवहार का एक हिस्सा है । जो हमारे दिन को सुखद बनाता है । हम कुछ देर उसके रंग और गंध से सम्मोहित हो जाते हैं .अपने तनावों से दूर हो जाते हैं । किसी को फूल भेंट करना हमें सुकून पहुंचाता है । एक चिड़िया का अपने चूजे के साथ बतियाना हमें ख़ुशी देता है । जबकि हम उनकी भाषा नहीं जानते हैं।
प्रकृति में चारों ओर हमारे मित्र फैले हुए हैं । कमी है तो उनके साथ दोस्ताना संवाद की । यही चीजें हमारी कहानी के जीवंत और रोचक पात्र हो सकते हैं । इनके और हमारे बीच के संवाद दूसरों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते है । प्रकृति के साथ बात करती एक कहानी इस पूरी धरती को ख़ुशी दे सकती है । ख़ुशी किसी उपदेश में नहीं मिलती है किसी के कहने से नहीं मिलती । प्रकृति के साथ एक मधुर संवाद कुछ पल हमें अपने आप से संवाद की ओर ले जाता है जहां हमें किसी ख़ुशी की तलाश नहीं रह जाती । और बाहर निकलते ही हम फिर ख़ुशी तलाशते हैं ।अपने दिन में टुकड़ा-टुकड़ा घटनाएँ जोड़ कर एक कहानी बनाते हैं ।ख़ुशी की कहानी । दुःख की कहानी ।सच/झूठ और भी तमाम तरह की कहानियां ।

शनिवार, 27 मार्च 2010

दिन भर बहुत व्यस्त रहा । एक नया ब्लॉग जागरण जंक्शन पर बनाया है । उसे सुबह लिखता हूँ । और इस ब्लॉग को शाम को लिखता हूँ । दिन में अन्य कार्य । गर्मी जल्दी शुरू हो गई है । दिन में देख रहा था कि रामगंगा नदी में पानी अब एक घराट के बराबर रह गया है । यह चिंता का विषय है । कि इस नदी में पानी कैसे बढेगा या इस नदी के पानी का विकल्प क्या होगा । यदि जल्द वर्षा नहीं हुई तो पीने के पानी का विकल्प क्या होगा । पानी यहाँ अब एक समस्या बनता जा रहा है । क्योंकि वारिश कम होने के कारण नया पानी नहीं मिल पायेगा जिससे कि श्रोत फूट पड़ते और चातुर्मास तक पानी मिल जाता । पिछली बार चातुर्मास में भी वारिश बहुत कम हुई थी जिस कारण गधेरों में पानी नहीं रहा । रही- सही कसर जंगलों में लगाने वाली आग ने पूरी कर दी । पहाड़ों के लिए अलग जल संरक्षण नीति बना कर तुरंत लागू करनी चाहिए ।

मंगलवार, 23 मार्च 2010

अनुभव

कई दिन हो गए अपने ब्लॉग पर नहीं बैठे .लगा कि कुछ छूट गया । दिन में कई तरह के विचार आते जिन्हें तुरंत नोट कर लेना चाहिए था लेकिन जो छूट गया वो छूट गया । उसे उसी रूप में सहेजना फिर बहुत मुश्किल होता है । जैसे हम कई बार धूप से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि कि धूपको लिखना चाहते हैं लेकिन शाम को धूप नहीं लिखी जा सकती । अनुभव में बहुत कुछ बयां करना छूट जाता या फिर कुछ बनावटी सा बन पड़ता है ।
सोचता हूँ कि जो निकल गया उसे छोड़ दूँ लेकिन फिर भी कुछ न कुछ यादों में सिमटा रहता है और उसे लिखे बगैर चैन नहीं ।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

कल लिखना आधे में ही बंद करना पड़ा । बच्चों ने एकाग्रता भंग कर दी । एक यात्रा( चाहे वह छोटी हो या बड़ी ०) में कुछ बहुत देख सकते हैं । बहुत दूर तक हमारी नजर जा सकती है और बहुत कुछ अपने भीतर समेत सकते हैं । यात्रा का एक मकसद यह भी है कि हम नया क्या देख पाते हैं । मैं जो जिंदगी देखता गया वह मेरे रोजमर्रा की दिनचर्या से बिलकुल अलग थी । लोगों के चेहरों से परेशानियाँ और खुशियाँ, क्रोध और प्रेम हम चलते -चलते देख सकते हैं । जिंदगी कहीं दौड़ रही है तो कही एक घुटन भरे कमरे में कैद है। बच्चों का एक व्यवसाय देखा कूड़ा बीनना ,यह समाज के लिए एक बड़ी दुखद घटना है। कि संवेदनहीन लोग इन्हें बुरी तरह फटकारते हैं । इनके लिए यह काम भी एक मानसिक प्रताड़ना झेलने वाला जोखिम का काम है ।

फिर मर गए तेंदुए

सुबह -सुबह दिल्ली से लौटने पर अखबार देखा तो सर चकरा गया । खबर थी कि देहरादून के वन रेंज में दो तेंदुए मृत पाए गए । इन तेंदुओं की मौत या मारे जाने का सिलसिला ख़त्म नहीं हो रहा है । समाज संवेदनहीन हो गया है और सरकार नाकाम । अब तो भगवान् ही मालिक है । लगता है कि बाघों /तेंदुओं की हत्याओं के प्रति कोई भी गंभीर नहीं है ।
भतीजे राजेश जी की शादी में दिल्ली गया था । घर से मैं दिनु और इजा गए थे . शादी ठीक रही कई ऑरकुट मित्र भी मिले ,दामोदर ,कैलास आदि । परिवार और गावं के सभी लोगों से मुलाकात हुई । अच्छा लगा । कुछ समय के liye तो laga ही नहीं कि हम लोग दिल्ली में हैं ।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

अल्मोड़ा में नाबार्ड की मीटिंग से से कल रात लौटा । देर हो गई थी ,उमा खाना बनाने लग गई थी । यह मोबाइल भी बड़ी अजीब बला है हर घंटे की सूचना बीबी माँगने लगती है । वैसे इसपर झूठ बोलना काफी आसान है । कहीं बैठे रहो और बीबी पूछे तो कहीं बता दो । लेकिन अगर पकडे गए तो बीबी बुरी तरह पीट भी देगी । -सावधान !
मीटिंग में काफी लोग आये थे । कई नए मित्र बने । कई नयी जानकारियां मिली । अनुभव बढ़ा ।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

सार में सारस

अभी-अभी अल्मोड़ा से लौटा हूँ । मासी पहुँच कर देखा कि ढलती सांझ में हरी -भरी सार के ऊपर सारसों का झुण्ड उड़ रहा है । वाह ! अद्भुत !
साथ में समयांतर ले कर गया था । कुछ देखा । अखबार देखा कि मुंबई में शाहरुख़ खान के घर पर भाषाई तालिबानों का हमला हुआ । लानत है इन्हें । आखिर बाल ठाकरे और राज ठाकरे इस देश को क्या बनाना चाहते हैं ? यह तो बहुत ही घटिया और गटर लेबल की राजनीति हुई । इन दोनों की देश विरोधी हरकतों पर तत्काल पावंदी लगनी चाहिए । अगर इन्हें ढील दी गई तो यह कोढ़ कल पूरे देश में फैलेगा । तब सरकार के आगे बड़ी समस्या खड़ी हो जायगी .मुंबई और ऑस्ट्रेलिया की घटनाओं में फर्क क्या रहा ?
-सारा भारत एक है । इस विचार को ताकत मिलनी चाहिए ।

शनिवार, 30 जनवरी 2010

कल का अखबार देखा चौखुटिया के पास एक तेंदुआ फिर मारा गया । आश्चर्य कि तेंदुओं की मौत पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है । यह क्षेत्र वन तस्करों के लिए सुरक्षित क्षेत्र है । साथ ही वन्जारों पर भी नियंत्रण रखा जाना चाहिए । क्योंकि ये लोग छोटे जंगली जानवरों -सियार , जंगली खरगोश , वन मुर्गी ,खुबसूरत और लम्बी पूंछ वाला लुप्तप्राय जानवर जिसे कुमाउनी में अठराव कहते हैं इनका शिकार करते हैं ।
सुबह जल्दी उठकर रोज के काम निबटाये ठण्ड बहुत थी लेकिन तेज धूप भी । कल रानीखेत गया था एक मीटिंग थी । लौटते हुए शाम हो गई थी । पहाड़ों का बहुत खुबसूरत नजारा देखते हुए जाने का पूरा आनंद लिया । हर मोड़ पर खूबसूरती इंतज़ार करती लगती है । लेकिन हमें तो देखकर निकल जाना होता है । -खूबसूरती भी ,बदसूरती भी और रह जाते हैं रस्ते । जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण सुख इन रास्तों के पास ही होता है जो ये हमें देदेते हैं ।

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

ठण्ड में सारस

सुबह अभी बहुत ठण्ड है। इसके बजूद भी पक्षी सुबह की ठण्ड के गीत गाने निकल आये । कल देखा कि रामगंगा नदी में कई सारसों के जोड़े तैर रहे हैं ।काफी समय बाद इन मेहमान पक्षियों को इस नदी में देख कर बहुत ख़ुशी हुई । कल दिन भर बहुत व्यस्त रहा । एक बुकिंग छोड़ने जौरासी गया था । रस्ते में एक्सीलेरेटर का तार टूट गया फिर जुगाड़ कर तार जोड़ा तब वापस मासी आया मौसम सुहावना कहूँ या डरावना कहूँ क्योंकि ऐसे मौसम को देख कर मैं तो खुश हो सकता हूँ लेकिन किसान तो परेशान हैं । उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई दे रहा है। इस महंगाई के दौर में अगर किसान के खेत सूख जाएँ तो किसान तो बेचारे मारे गए । एक एक मंत्री/ उद्योगपति /तस्कर/हीरो करोड़ों अरबों रुपयों का मालिक है । उन्हें क्या परवाह कि वारिश हो या न हो । किसान की कौन सोचता है - सिर्फ किसान । पांच सितारा होटलों में रहने वाले मंत्रियों का भला समाज की चिंताओं से क्या वास्ता ? जो मंत्री समाज को कैटल क्लास की संज्ञा दे उस मंत्रीऔर उस मंत्री को समर्थन देने वाली सरकार से देश की जनता क्या उम्मीद करेगी ? और दुर्भाग्य है इस देश की जनता का कि वे फिर भी मंत्री पद पर बने हुए हैं । सरकार को जनता के हितों के विरुद्ध नहीं जाना चाहिए ।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

आज और कुछ नहीं

कल के अखबार में एक तेंदुए के मारे जाने की खबर फिर छपी । हे भगवान् यह क्या हो रहा है ? इस पर संसद में प्रश्न उठाया जाना चाहिए । और इनकी सुरक्षा निश्चित की जानी चाहिए । आज और कुछ नहीं ।

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

हिंसा की पाठशाला

सुबह चिंताजनक समाचार से शुरू हुई कि कार्बेट पार्क रामनगर में एक बाघ की मौत हो गई है । पूरी दुनिया बाघ बचाने के लिए प्रयास कर रही है । और यहाँ बाघ और अन्य जानवर बेमौत मरे जा रहे हैं .यह घटना प्रशासन तंत्र की मुस्तैदी की पोल खोलती है . साथ ही सरकार की प्राणियों के हितोंकी सुरक्षा की चिंता की पोल भी खोलती है । हर दिशा से शिकारी और अंगों के व्यापारी जानवरों को मार गिराने के लिए बन्दूक ताने खड़े हैं। और सरकारें हैं कि मरने दे रही है .खूबसूरती हमेशा से ही प्राणघातक रही है। गावों में मुर्गी सुबह ब्रह्म मुहूर्त में लोगों को जगाने के लिए बांग देती है जबकि शहर में मुर्गी सुबह ब्रह्म मुहूर्त में अपने प्राणों की रक्षा के लिए चीखती हैभैंस /गाय सुबह अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए राभंती हैं और यहाँ शहर में सुबह बूचड़खाने की ओरजाते हुए अपने प्राणों की रक्षा के लिए राभंती हैं .ये बूचडखाने समाज को हिंसक बनाने की पाठशालाएं हैं . महात्मा गाँधी का अहिंसा का दर्शन अप्रासंगिक लगता है जबकि आज आवश्यकता इस बात कि है इस धरती पर एक गावं या शहर तो ऐसा हो जो मांसाहार का विरोध करता हो या शाकाहारी हो । हम यदि अहिंसा का संकल्प लें तो आतंकवाद की आधी समस्या हल हो जाएगी रह जाएगा तो सिर्फ अन्याय का अहिंसक प्रतिशोध । हमें आज नहीं तो कल अहिंसा का मार्ग चुनना ही होगा ।

शनिवार, 16 जनवरी 2010

कल ही दिल्ली से लौटा हूँ । संस्था के कार्य से गया था । मामा जी के यहाँ रुका था ।मारे कुहरे के तीन दिन धूप नहीं देखी बगैर धूप के जीवन की कल्पना भी इतनी ही ठंडी होगी . पाखी और अहा जिंदगी पत्रिकाएं खरीदी । इनमें रचनाएँ प्रकाशनार्थ भेजूंगा यहाँ की भाग दौड़ वाली जिंदगी थका देने वाली और ऊबाऊ लगती है । दौड़ते भागते वाहनों को देख कर लगता है की यहाँ लोग धैर्य और सुकून की जिंदगी जीना पसंद नहीं करते और न ही दूसरों को इस तरह जीने देना पसंद करते हैं । यहाँ धन ही सब कुछ है । उसके आगे जीवन का कोई मूल्य नहीं । आखिर इस ह्रदयहीन दौड़ा-भागी का औचित्य क्या है ? जीवन के मूल्य अनावश्यक नियम और कानून के फंदे में उलझ कर रह गए हैं ।सत्ता के पास के प्राकृतिक जीवन के दृष्टिकोण का अभाव है .और न ही नागरिकों/प्राणियों के प्राकृतिक हितों की सुरक्षा की कोई चिंता या कार्ययोजना है. जबकि प्राकृतिक नियम बेरहमी से तोड़े जा रहे हैं । यहाँ शुद्ध हवा और शुद्ध जल के लिए कोई नियम नहीं है कुछ इस भावना के साथ कि धन के आगे यह सब कोई मायने नहीं रखते.यहाँ व्यक्ति के धन और स्व केन्द्रित होने के कारण प्राकृतिक तौर पर जीवन मूल्यों का हनन हुआ है

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

नए साल की शुभ कामनाएं .

सभी मित्रों शुभचिंतकों ,विद्वान् पाठकों ,लेखकों ,कवियों, कलाकारों , को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं । हम सभी संकल्प लें कि हम नए साल में एक स्वस्थ , जागरूक ,सह्रदय समाज के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएं । हम अपने आसपास के समाज में ही देखें तो दिखाई देगा कि करने के लिए बहुत कुछ है । कमी है तो सिर्फ द्रष्टिकोण की । मौजदा हालात को बेहतर बनाने संकल्प की । मसलन गंगा या अन्य नदियों को प्रदुषण मुक्त करने के लिए राष्ट्रीय संकल्प से अधिक क्षेत्रीय संकल्प महत्वपूर्ण है । उसी प्रकार सामाज के लिए क्षेत्रीय जागरूकता अधिक महत्वपूर्ण है । अपने आसपास की चीजों को जो की समाज के हित में नहीं है उन्हें बदलने की पहल हमें ही करनी होगी । हमारे आसपास बहुत से ऐसे व्यक्ति महिलाएं ,बच्चे या पशु हैं जिन्हें हमारी जरुरत है । हम अपनी लेखनी उनके हितों के लिए भी चलायें । क्षेत्रीय स्तर साहित्य साधना कर रहे संगठनों को इस ओर भी सक्रिय होना चाहिए ।

रविवार, 27 दिसंबर 2009

मछलियाँ कहाँ गई ?

स्याल्दे से आते हुए देख रहा था कि रामगंगा नदी में जल स्तर बहुत कम हो गया है । यह गर्मियों के लिए अच्छा संकेत नहीं है । और इस तरफ किसी का भी ध्यान नहीं है । जाते समय केदार के पुल से देखा कि बड़ी -बड़ी मछलियाँ धूप सेंकते हुए तैर रहीं है । जबकि मासी क सांगू रो पुल के आस पास अब मछलियाँ दिखनी ही बंद हो गई है । मछुआरों ने कारतूस और महाजाल /फांस लगाकर लगभग सारी मछलियाँ मार डाली है। बहुत पहले ,मुझे अब भी याद है कि सांगू रौ में तो अनगिनत मछलियाँ और बड़ी-बड़ी मछलियाँ इसी तरह जाड़ों में धूप सेंकने आया करती थी और लोग बड़े चाव से इन्हें देखने आते थे । लोगों क शिकार खाने कि हवस ने इस प्राकृतिक मत्स्य विहार का खात्मा कर दिया है । जबकि केदार क बारे में मालूम हुआ कि यहाँ मछलियों क शिकार पर पाबन्दी है । तब मासी में इस तरह की पाबन्दी क्यों नहीं ?

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

ठंडी सुबह की शुरुआत

कल रात इंटरनेट जल्दी चला गया था तो लिख नहीं पाया । सुबह ठण्ड के मारे और कुछ काम तो हो नहीं पाता लगता है कि हिम युग में हूँ इस ठण्ड में या तो दौड़ने निकला जा सकता है या फिर कोई मश्शकत का काम करने निकला जा सकता है ।ताकि शरीर में गर्मी का संचार हो और पसीना निकल आये ।हर रोज रात को निश्चय करके सोता हूँ कि सुबह पांच बजे उठकर घूमने जाऊंगा लेकिन सुबह उठकर देखता हूँ कि अभी तो बहुत अँधेरा है । जंगली जानवरों -सुअरों, बाघों , सियारों के घूमने का समय है । मेरे लिए ब्लॉग पर बैठ कर आराम से लिखना ही ठीक रहेगा । सोच रहा हूँ कि मई में एक पत्रिका 'सृजन सदर्भ' के नाम से प्रकाशित करूँ । इसके लिए लेखकों से रचनाएँ आमंत्रित करनी होंगी । अभी से तयारी करनी होगी । आज एक दो गावों में जाना है । एन जी ओ शुरू करने के बाद हर व्यक्ति से जुड़ने का अवसर मिला है । गावों को करीब से देखने का मौका मिला है । लोग और उनकी परेशानियों को जानने का मौका मिला है ।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

पाले कि चादर

यूँ तो सुबह बहुत जल्दी उठ गया था लेकिन चाय पी कर फिर बिस्तर में घुस गया था और उजाला होने के बाद बाहर निकल कर देखा कि बहुत कड़ाके की ठण्ड है । बाहर निकलने की हिम्मत नहीं आ रही है ।मैंसोच रहा था कि आज कोई चिड़िया गा क्यों नहीं रही ? इतनी ठण्ड में कौन पक्षी बाहर निकल कर गायेगा । जबकि बाहर घना कुहरा और जमीन में सफ़ेद पाले की चादर बिछी है और पानी छूना तो आग छूने के समान हो रहा है । ऊँची पहाड़ियों में तो धूप निकल आई होगी .और इस मासी की घाटी में तो कुहरा छंटने के बाद ही धूप आएगी .दिन इतने छोटे हो गए हैं कि बारह बजने के बाद तो लपक कर सीधे सांझ पेश आ रही है । उमा कह रही है कि महाशय जी नहा लो लेकिन मैंने हाथ खड़े कर दिए हैं । अब दिन के काम की रुपरेखा तैयार करता हूँ । अब पक्षियों के गाने की आवाज आने लगी है लगता है कि धूप आ गई है ।

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

हर पल एक नया रंग

सुबह से ही बहुत व्यस्त था .दिनु की लड़की हुई है . भतीजी हुई है ताऊ बन गया हूँ । एक अद्भुत अनुभव ।ताऊ बनने का ।मुझे अपने ताऊ याद आ गए । कुछ देर संस्था का कार्य किया । फिर टेक्सी चलाई .और फिर वापस आकर धूप सेंकने बैठ गया दिन में धूप में बैठा देख रहा था कि किरणें पहाड़ों को हर पल एक नए रंग से रंग रही थी । पहाड़ हर पल अपनी आभा बदलते जा रहे थे । लग रहा था कि हम सब प्रकृति के केनवास के चित्र हैं । ऐसे चित्र जिनके भीतर भी एक केनवास है जिसमें कि हमें हर पल रंग भरना है यह हम पर निर्भर करता है कि हमकिस तरह के चित्र बनाते हैं कैसा रंग भरते हैं ।

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

यह समय

अगर हमारे पास काम ज्यादा है तो हमें न तो वक़्त का ख़याल रहता है और न ही हमें प्रकृति से कोई लेना देना होता है । हम भावना शून्य हो जातें हैं संवेदना ख़त्म हो जाती है । और अपने ही समाज से कट जाते हैं हमें अपने काम से अलावा और कुछ नहीं दिखाई देता है जब हम अपने काम से थक चुके होते हैं और सोचते हैं कि थोड़ा बाहर देख लें तो बाहर देखने के लिए बहुत देर हो चुकी होती है । हम धूप के आने और जाने का अनुभव भूल चुके होते हैं । यही नहीं हम रिश्ते भी भूल चुके होते हैं । काम कितना ही हो खुद को प्रकृति से कभी दूर नहीं करना चाहिए । एक गाय और एक आदमी का रिश्ता बना रहना चाहिए । एक पेड़ और एक आदमी का रिश्ता बना रहना चाहिए । आदमी और आदमी का रिश्ता बना रहना चाहिए । और यदि प्रकृति के साथ भावनात्मक रिश्ता ख़त्म हो गया तो प्रकृति को ख़त्म होने में ज्यादा वक़्त नहीं लगेगा । तब हम स्वयं को कहाँ बचा पाएंगे ।
यह समय सबकुछ बचाने का है हमें धूप बचानी है । वर्षा बचानी है । पेड़ बचाने हैं। हवा बचानी है । और मानवीय संवेदना बचानी है तथा प्रकृति के साथ अपने रिश्ते बचाने हैं ।

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

किसान और महंगाई

किसान फिर निराश दिखाई दे रहे हैं वर्षा के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं और यदि इस माह वर्षा नहीं हुई तो पहाड़ी क्षेत्रों में गेहूं ,सरसों की फसल मार खा जाएगी । बाज़ार दिन पर दिन महँगा होता जा रहा है गरीब और मजदूरों का क्या होगा यह सरकार के एजंडा में अभी नहीं आया । एक गरीब किसान रो पीट कर /डर के मारे अपना वोट तो दे देता है लेकिन बाद के पांच साल रोता रहता है वोट देने के बाद फिर उसकी कोई नहीं सुनता है । जबकि चुनावों में एक एक नेता लाखों करोड़ों खर्च कर डालता है । खैर में फसल पर बात कर रहा था हमारे यहाँ जल प्रबंधन के साथ साथ फसल प्रबंधन की भी आवश्यकता है । हमें परम्परागत फसल चक्र में परिवर्तन करना होगा तथा बाजार को भी अपने फसल प्रबंधन से जोड़ना होगा ताकि किसान सरकार पर निर्भर न रहे । तथा दिन पर दिन बढ़ती महंगाई से प्रभावित न हो ।

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

अंधेरे का साथ

एक बार जी में आ रहा था कि कुछ देर मीठी धूप में सो लेना चाहिए । हरी धरती और नीले आकाश को देखता रहूँ । रोजमर्रा की सारी झंझटों को एक किनारे फैंक दूँ । न तो पत्नी की बाहें हों न प्रेमिका का ख़याल । लेकिन इन्हीं सारी झंझटों ने बुरी तरह घेर कर रखा है। और देखते -देखते धूप की तपिश कम हो गई । लगा की पत्नी एक गिलास चाय ले आती तो ठीक रहता । उमा ने दो बार चाय पिलाई भी । पत्नी और बच्चों से घिरा उन्हीं से बतियाते हुए दिन निकल गया , बच्चों के बीच भी लगा कि सारी परेशानियों से दूर हूँ । धूप के यूँ ही चले जाने का कोई मलाल नहीं हुआ । धूप गई तो कोई बात नहीं खूबसूरत पहाड़ तो साथ हैं । और जब अँधेरा इन्हें भी ढँक लेगा तो खूबसूरत अँधेरा तो साथ रहेगा ही ।अँधेरा- एक मौन , एक विराम । नई शुरुआत के लिए ।

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

आज फिर कई दिनों बाद ब्लॉग पर बैठा हूँ , सुबह सोचा था कि आज तीन ग्राम पंचायतों का भ्रमण करूंगा लेकिन एक तलाई और अफों में ही दिन ढलने लगा । दिन इतने छोटे हो गए हैं कि कब दिन निकला और कब ढल गया पता ही नहीं लगता । लौटते हुए सोच रहा था कि नदी में पानी का स्तर अभी से गिरना शुरू हो गया है जंगलों में पेड़ों की सघनता कम हो गई और सबसे महत्त्व का और ध्यान देने की बात है की जंगलों से छोटे जीव जंतु लगभग गायब हो गए हैं जिससे की बाघ और चीतों का पारंपरिक भोजन जंगलों में ख़त्म हो गया है जिस कारण बाघों और चीतों /तेंदुओं ने गावों पर हमला करना शुरू कर दिया है । अभी कुछ दिन पहले अखबार में पढ़ा था कि उत्तराखंड में गत वर्ष करीब १३ बाघ मारे जा चुके हैं । जो कि एक चिंता का विषय है । बाघों का इस तरह आक्रामक हो जाने का एक मुख्य कारण जंगलों उनके भोजन की कमी भी है ।

सोमवार, 23 नवंबर 2009

आज कई दिनों बाद अपने ब्लॉग पर बैठा हूँ । लिखने के लिए बहुत कुछ है शुरुआत हिन्दी विरोधी राज ठाकरे से करता हूँ । यह हिन्दुस्तान के विरोध की दस्तक भी हो सकती है । यानी राज ठाकरे के अलगाव वादी नीति की शुरुआत । भारतीय संसद को इस घटना को पूरी गंभीरता से लेते हुए सख्त कदम उठाना चाहिए . हिन्दी भाषियों को राज ठाकरे की इस घिनोनी हरकत का विरोध सड़क पर आकर करना चाहिए । कोई भी संभ्रांत भारतीय हिन्दी का विरोध नहीं कर सकता है ।आज राज ठाकरे ने हिन्दी का विरोध किया कल दक्षिण में कोई हिन्दी विरोधी पैदा होगा परसों उत्तर में कोई हिन्दी विरोधी पैदा होगा और सरकार ख़ामोशी से सब देखती रहेगी सरकार की यह उदासीनता उचित नहीं ।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

कलम मैं ताकत

दिन में एक चक्कर गैरखेत गया हिमाच्छादित पहाडियों ने मन मोह लिया । आज लगभग छः माह बाद दो कवितायें लिखी । हो सकता है की अभी सोते सोते एक कविता और लिख डालूं । काफ़ी समय से लग रहा था की मैं कविताओं की दुनियां से रिटायर हो गया हूँ । वैसे भी हर गंभीर और मौलिक विधा लगभग रिटायर -सी होती जा रही है । कोई कह रहा है कि कविता मर रही कोई कह कर चला जा रहा है कि कहानी ,उपन्यास,या निबंध मर रहा है । दरअसल ये सब हारे/ ऊबे/चुके हुए लोग हैंजिनके पास नया कहने को कुछ नहीं है जो आम जन को उकेरता हो। उनका मानना है कि कलम बेअसर हो चुकी है। उन्हौंने लिखना बंद किया तो घोषणा कर डाली कि यह सब तो मर रहा है । जो अपनी दूकान बंद कर जुआ घर मैं बैठे हैं। या नशे मैं धुत्त हैं ।या समाज के बारे मैं सोचना बंद कर दिया है। उन्होंने लिखना बंद किया तो पढ़ना भी बंद किया । लेकिन सौभाग्य से यह सब फल-फूल रहा है। लोग लिख रहे हैं । और समाज की चेतना को झकझोर भी रहे हैं । उनकी कलम मैं ताकत है।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

शिक्षा में गावं और गरीब

इस बीच लगातार व्यस्तता के कारण ब्लॉग पर नहीं बैठ पाया । कई गावों मैं घूमा कई लोगों से मिला गावों और पहाड़ को बिल्कुल करीब से देखा । मन को बाँध लेने वाले पानी के बहते गधेरे नदियाँ और हरियाली । लेकिन उतनी ही चिंताजनक अशिक्षा और गरीबी । शिक्षा, विशेष कर उच्च शिक्षा में तो गावं के लिए कोई जगह नहीं है । प्रतिभाओं के लिए भी नहीं , यदि जगह है तो धनी शहरियों के लिए । माननीय कपिल सिब्बल जी की शिक्षा नीति में तो गरीब ,गावं के लिए तो कोई जगह नहीं दिखाई दे रही है । वहाँ एक वर्ग विशेष है जिसके लिए गावं और गरीब का गला घोंटा जा रहा है । एक व्यापक वर्ग को वेहतर उच्च शिक्षा से वंचित रहना होगा माननीय कपिल सिब्बल जी की शिक्षा नीति से समाज के एक बड़े वर्ग के युवाओं में अपने भविष्य के प्रति घोर निराशा उत्पन्न होगी । जो कि समाज के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं है ।

बुधवार, 14 अक्टूबर 2009

ठण्ड एकदम बढ़ गई । मौसम में यह परिवर्तन बहुत सुखद लगा । परसों मोहना गया था । मोबाइल से कुछ सांझ के चित्र खींचे लेकिन अफसोस कि ढलती सांझ को शब्दों में नहीं ढाल पाया । और मुस्कराती हुई साँझ पलटकर चली गई । और इसी के साथ प्रकृति का परिधान भी बदल गया । और इससे पहले कि अंधेरे का परदा कायनात को ढक ले मैं और उमा मासी को लौट आए ।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

विश्व शान्ति का स्वरुप क्या है ? मानक क्या हैं ?

आजकल शाम होते-होते बुरी तरह थक जा रहा हूँ । न लिखने की फुर्सत न पढ़ने की । उमा का तो और भी बुरा हाल हो जाता है । सुबह ४ बजे से काम पर शुरू हो जाती है और रात बिस्तर पर जाने तक लगातार काम । इसी आपाधापी के चलते आजकल वह कमजोर भी हो गई है ।
कल समाचार पढा कि बराक ओबामा को नोबेल पुरूस्कार मिला है । लगा कि नोबेल समिति ने इस पुरुस्कार की घोषणा जल्द बाजी में कर दी है । ओबामा महोदय की कार्य शैली को कम-से-कम तीन -चार साल देख लेना चाहिए था। पुरूस्कार की व ओबामा महोदय जी की भी महत्ता घटी है। इसे कम-से-कम गौरवशाली उपलब्धि तो नहीं कहा जा सकता है। नोबेल पुरूस्कार की गिरती साख को देखते हुए इस पुरुस्कार को या तो बंद कर देना चाहिए या इसी के समकक्ष एक नए पुरूस्कार का सर्जन कर एक नई समिति बनानी चाहिए जिसमें कि इस विश्व स्तर के पुरूस्कार को बांटने का विवेक हो । इस पुरूस्कार के साथ एक सबसे बड़ी समस्या है कि यह पुरूस्कार अंग्रेजी से बाहर नहीं जा पा रहा है जिससे यह नोबेल समिति यह साबित कराती है के अंग्रेजी के अलावा दुनिया के किसी भी साहित्य में किसी भी विज्ञान में या अन्य विषयों में कुछ भी श्रेष्ट नहीं है , और अंग्रेजों के अलावा कोई दूसरा व्यक्ति श्रेष्ट नहीं है । बराक ओबामा महोदय के विश्व शान्ति के प्रयास क्या हैं ?

बुधवार, 7 अक्टूबर 2009

बर्षा चक्र

आज बुरी तरह थक गया हूँ । या बुखार आने वाला है । लेकिन सोऊंगा तो ब्लॉग लिखकर ही । कल मैंने लिखा था कि किसान को आर्थिक सुरक्षा देनी होगी । तभी वह अपनी खेती को बढ़ाने या खेती पर अपनी निर्भरता को मजबूत करेगा । पहाडों में खेती पर तो किसान जिंदा नहीं रह सकता । यहाँ जहाँ पर खेती बर्षा पर निर्भर है वहां परम्परागत बुआई में या फसल चक्र में परिवर्तन के साथ -साथ समय चक्र में भी परिवर्तन की आवश्यकता है क्योंकि पिछले कुछ बर्षों से यह देखने में आ रहा है कि बारिश का समय एक-डेढ़ माह आगे खिसक गया है यानी जो बारिश जुलाई -अगस्त में होती थी वह बारिश सितम्बर अक्टूबर में होने लगी है। इससे फसल का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है । और हर साल सूखे की स्थिति उत्पन्न हो रही है । और किसानों में हर साल एक निराशा घर कर जाती है। मैंने कई जगह देखा है कि वहां किसान वारिश होने के बाद ही बोआई करते हैं और बर्षा चक्र के साथ चलने के कारण अच्छी फसल प्राप्त करते हैं ।

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

हमारे किसान

आजकल गावों में भ्रमण कार्यक्रम में व्यस्त हूँ । कल और परसों बारिश की वजह से नहीं गया । किसान हाड़ तोड़ मेहनत करता है । उसपर यदि समय पर बारिश नहीं हुई तो किसान बहुत हताश हो जाता है । उसे अपने व बच्चों का भविष्य शून्य दिखाई देता है ग्रामीण व छोटे किसानों का भविष्य तो बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है । सारी मेहनत के बाद किसान बाज़ार की ओ़र ताके तो क्या होगा ? वह खेती छोड़ मेहनत मजदूरी की तरफ़ भागेगा । किस्सान के पलायन के साथ ही एक परम्परा का भी समाप्त होने का खतरा रहता है । हर किसान के भीतर एक पीढियों पुरानी परम्परा भी होती है । किसान के पलायन के साथ ही गावं और जमीन के भी प्रभावित होने की पूरी संभावना रहती है । इसलिए किसी भी प्रकार हो किसान को आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिए ।

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

जीवन की रिक्तता

असोज का महीना क्या लगा कि घर के काम में उलझ कर रह गया हूँ -यह भी एक अनुभव है . दिन भर काम करने के साथ -साथ यह भी सोचना होता है कि आज ब्लॉग पर क्या लिखूं । हमारे जीवन में हर रोज कुछ न कुछ ऐसा घटित होता है कि हमें वह पल याद रहता है और हम कुछ दिन तक अपने मित्रों से उस बात का जिक्र करते हैं । वह एक सुखद या दुखद स्वप्न भी हो सकता है । या एक रिक्तता -जिसका जिक्र भी बहुत महत्व का होता है । कुछ लोग खालीपन से भागते हैं ,जबकि कुछ ऐसे भी हैं जो अपने जीवन के खाली स्थान को सुरक्षित रखना चाहते हैं । ताकि जिंदगी की भाग -दौड़ से उबने के बाद अपनी जिंदगी के खाली कमरे में आ कर कुछ पल आराम से बिताये जा सकें और इस रिक्तता से नई ऊर्जा प्राप्त की जा सके । यह रिक्तता आत्ममंथन की प्रेरणा देती है हमें चिंतन का अवसर मिलता है । और हम इत्मीनान से पीछे और आगे देख सकते हैं । अपने रास्ते तय कर सकते हैं । यह खालीपन फूलों की सुगंध से भरा होना चाहिए ।

 संध्या के कितने रुप ?