महंगाई भले ही अरबपति मुख्यमंत्रियों /करोडपति मंत्रियों /उद्योगपतियों /नौकरशाहों /बड़े व्यापारियों के लिए कोई मायने नहीं रखती हो लेकिन बेरोजगार/छोटे किसान /गरीब और मजदूर के सामने तो संकट खडा कर ही देती है । महंगाई तो बढ़ी पर मजदूरी या किसानों के उत्पाद का मूल्य वहीँ का वहीँ रहा । इस महंगाई से तो एक भयंकर सामाजिक असंतुलन पैदा हो गया है .
दूसरी सबसे बड़ी समस्या किसानों के लिए पानी की दिखाई दे रही है । जल स्तर कम होने से सिंचाई प्रभावित हो रही है ।सरकार के पास प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के अलावा प्राकृतिक संसाधनों के विकास की कोई नीति नहीं दिखाई दे रही है । पहाड़ों पर सड़कें तो बनाई जा रही हैं लेकिन सडकों के निर्माण में इन्जिनिरियंग का काम कोई बेहतर नहीं दिखाई दे रहा है । यहाँ की इंजीनियरिंग का कार्य अदूरदर्शी है । प्राकृतिक स्थितियों से इनका कोई विशेष लेनादेना नहीं दिखाई देता है । इन्हें पैसा और पहाड़ दिखाई देता है अन्धान्धुन्ध तरीके से पहाड़ खोदे जा रहे हैं ।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
संध्या के कितने रुप ?
-
महंगाई भले ही अरबपति मुख्यमंत्रियों /करोडपति मंत्रियों /उद्योगपतियों /नौकरशाहों /बड़े व्यापारियों के लिए कोई मायने नहीं रखती हो लेकिन बेरोज...
-
आज बुरी तरह थक गया हूँ । या बुखार आने वाला है । लेकिन सोऊंगा तो ब्लॉग लिखकर ही । कल मैंने लिखा था कि किसान को आर्थिक सुरक्षा देनी होगी । तभी...
-
सुबह का उगता सूरज दिन की कथा के शीर्षक की तरह है . इसलिए जरुरी है कि सुबह अच्छी हो . आशावादी हो दिन की कथा का शीर्षक . एक सुखद संगीत प...
सुन्दर लेखन।
जवाब देंहटाएंadaraneeya aacharya ji , twarit tippani ke liye hardik abhaar .
जवाब देंहटाएं