कई दिन हो गए अपने ब्लॉग पर नहीं बैठे .लगा कि कुछ छूट गया । दिन में कई तरह के विचार आते जिन्हें तुरंत नोट कर लेना चाहिए था लेकिन जो छूट गया वो छूट गया । उसे उसी रूप में सहेजना फिर बहुत मुश्किल होता है । जैसे हम कई बार धूप से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि कि धूपको लिखना चाहते हैं लेकिन शाम को धूप नहीं लिखी जा सकती । अनुभव में बहुत कुछ बयां करना छूट जाता या फिर कुछ बनावटी सा बन पड़ता है ।
सोचता हूँ कि जो निकल गया उसे छोड़ दूँ लेकिन फिर भी कुछ न कुछ यादों में सिमटा रहता है और उसे लिखे बगैर चैन नहीं ।
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