
अभिनव गाथा - लेखक - गोपाल दत्त देवतला
कल रातभर वर्षा होती रही। इस वर्षा ने प्राकृतिक सौंदर्य में नए प्राण डाल दिए हैं. बसंत पंचमी के आगमन के साथ ही वातावरण में एक नयापन आ गया है।पहाड़, पेड़ - पौंधे सब वर्षाजल से नहा धोकर नई चमक के साथ बसंत के स्वागत के लिए तैयार हैं. धरती एक नया उत्सव मना रही है। जंगली फूल खिलने शुरू हो गए हैं। पतझड़ के बाद वृक्षों में नई कोपलें आने लगी हैं। ठण्ड ने अपनी शीतलता की प्रकृति में बदलाव कर दिया है. वर्षा के बाद धूप ने पहाड़ों को मन मोहक रंग बांटने शुरू कर दिए है.
ऊँची पहाड़ियों में बर्फ गिरनी शुरू हो गई है। हवा में बर्फ की ठंडक और सुई की नोक की तरह चुभन है। वैसे वर्षा के बाद की ठण्ड हानिकारक नहीं होती है. लेकिन सावधानी तो बरतनी ही होती है.
नमस्कार मित्रो ,
नव वर्ष की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
जनवरी की ठिठुरन आरम्भ हो गई है। पतझड़ वाले वृक्षों ने पत्ते छोड़ दिए हैं। यहाँ भी अद्भुत सौंदर्य है। शाखों से गिरे पत्तों को सब अपने सुखों या दुखों के अनुसार देखते हैं। पत्तों के संगीत को सब अपने अनुसार सुनते हैं। उनके रंग सबको अलग अलग दिखते हैं। हवा के साथ उनकी अठखेलियों को सब अपने अपने अनुसार देखते हैं पत्तों से रहित वृक्षों शाखाओं की स्थिति का वर्णन भी सभी अपने अनुसार करते हैं। जैसी मनःस्थिति वैसी दृष्टि और वैसा ही वर्णन।
पतझड़ एक अनूठा अनुभव है। और दर्शन भी। पतझड़ का होना बताता है कि नई कोपलें आने वाली हैं ,नए पत्ते आने वाले हैं. नए फूलों का मौसम आने वाला है। नए फल आने वाले हैं।
भयंकर और विनाशकारी युद्ध अब एक सामान्य समाचार है। युद्ध लड़ने वाले भी नित्य की भांति रोटी खा रहे हैं और युद्ध के शिकार भी रोटी खाकर सो रहे हैं। दोनों पक्ष एक दूसरे पर घात प्रतिघात कर रहे हैं। सारे उन्नत, आधुनिक , तकनीकी हथियार युद्धों को रोमांचक बना रहे हैं।
समूचे विश्व में मानवाधिकार संगठनों के सारे विरोध प्रदर्शन अब मौन हैं. युद्ध के पक्ष में हैं या भयभीत हैं कह नहीं सकता इन्होंने अब निर्दोष हताहतों के प्रति संवेदना में मोमबत्ती जलाना भी लगभग बंद कर दिया है। लगता है कि हर युद्ध एक नया रोमांचक मनोरंजन है।
संवेदनाओं के सारे द्वार अब बंद हैं। सिर्फ ऑंखें और मस्तिष्क हैं. जैसे कि रोबोट की होती हैं।
हम प्रतिदिन जितने लोगों या जीव जंतुओं से मिलते हैं सबके भीतर सैकड़ों कहानियां होती हैं सुख और दुःख की। हर पल जीवन में एक नया शब्द जोड़ जाता है। लेकिन विषय वस्तु सभी की लगभग समान होती है। सुख या दुःख। तीसरा रूप कहीं दिखता नहीं। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त हर व्यक्ति के जीवन में कहानियों का जाल ,ताना बाना सुख दुःख के शब्दों से बुने होते हैं ।
हर व्यक्ति अपनी कहानी सुनाना चाहता है। वह चाहता है कि मेरी कथा - व्यथा सुनी जाय । मेरा सुख और मेरा दुःख दूसरों की तुलना में कितना बड़ा है। कितने लोग हैं जिनकी कथा व्यथा समान है।
हम हर रोज जो भी नया ढूंढते हैं वह सुख या दुःख होता है। शब्द अलग हो सकते हैं।
ठंड बढ़ने लगी है सुबह कड़ाके की ठण्ड और दिन में तेज धूप। आजकल अपनी पहले की लिखी कविताओं को फिर से देख रहा हूँ। पांडुलिपियां बहुत समय से फाइलों और डायरियों में बंद थी। देख रहा हूँ कि आज कितनी प्रासांगिक हैं बरसों पहले लिखी कविताएं। अब जो कविताएं रहेंगी उन्हें सम्पादित करने की आवश्यकता नहीं होगी। उनमें प्रेम , प्रकृति और समाज झलकता है ,
कविता अंतरतम के अनंत की और एक यात्रा है किन्तु अध्यामिक नहीं।
कविता लिखते जाना और एक लम्बे समय के लिए जमा करते जाना तथा एक अवधि के बाद देखना साहित्य साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है
तात्कालिकता या शब्द संयोजन ज्यादा दूर तक नहीं जा पाते।