गुरुवार, 24 दिसंबर 2009
पाले कि चादर
यूँ तो सुबह बहुत जल्दी उठ गया था लेकिन चाय पी कर फिर बिस्तर में घुस गया था और उजाला होने के बाद बाहर निकल कर देखा कि बहुत कड़ाके की ठण्ड है । बाहर निकलने की हिम्मत नहीं आ रही है ।मैंसोच रहा था कि आज कोई चिड़िया गा क्यों नहीं रही ? इतनी ठण्ड में कौन पक्षी बाहर निकल कर गायेगा । जबकि बाहर घना कुहरा और जमीन में सफ़ेद पाले की चादर बिछी है और पानी छूना तो आग छूने के समान हो रहा है । ऊँची पहाड़ियों में तो धूप निकल आई होगी .और इस मासी की घाटी में तो कुहरा छंटने के बाद ही धूप आएगी .दिन इतने छोटे हो गए हैं कि बारह बजने के बाद तो लपक कर सीधे सांझ पेश आ रही है । उमा कह रही है कि महाशय जी नहा लो लेकिन मैंने हाथ खड़े कर दिए हैं । अब दिन के काम की रुपरेखा तैयार करता हूँ । अब पक्षियों के गाने की आवाज आने लगी है लगता है कि धूप आ गई है ।
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