गुरुवार, 1 जुलाई 2010

सुबह मालूम नहीं कैसी थी ।
दुकान खोलते ही तीन चार ततैयों ने डंक दे मारा ।
सुबह का सुहानापन तो दर्द की भेंट चढ़ गया । लेकिन दर्द तो मुझे हुआ था सुबह तो हर रोज की तरह सुहावनी ही थी ।

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