रविवार, 22 अप्रैल 2012
Abhinav Gatha: बड़ी देर से बैठा सोच रहा था कि आज शुरू कहाँ से कर...
स्वप्न बहुत महत्वपूर्ण हैं . उन्हें देखो, समझो और जानो .
रविवार, 8 अप्रैल 2012
गावं में तो भीड़ देखने को बाज जगह तो पांच -पांच किलोमीटर चल कर लोग दिखाई देते हैं . और यहाँ खाली जगह देखने को नहीं मिल रही है .
पूरा पहाड़ यहाँ आ चुका है वहां पर बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है .लेकिन जीवन स्तर अच्छा है .वहां एक बड़ी प्रवृति है कि क्षेत्रीय स्तर पर रोजगार कि संभावनाएं पैदा करने कि कोशिश नहीं की जाती है . युवा इंटर पास करके सीधे दिल्ली दौड़ पड़ते हैं . यहाँ की तड़क भड़क आकर्षित करती है .
यह भी सच है कि लोगों ने यहाँ आकर बहुत अंधाधुंध पैसे कमाए हैं .
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि पहाड़ में रोजगार कि संभावनाएं ख़त्म हो गयी हों . अपार संभावनाएं हैं. कृषि में बागवानी में ,लघु उद्योगों में , व्यापार में .आवश्यकता है तो सकारात्मक नजरिये और मेहनत की.
दिल्ली बहुत अच्छा शहर है .किन्तु धनवानों के लिए . नेताओं के लिए .
आम आदमी के लिए नहीं . आम आदमी तो नेताओं/पूंजीपतियों के हिस्से का नरक भोग रहा है.
बुधवार, 14 मार्च 2012
एक बहुत ही ख़ुशी का त्यौहार . छोटे -छोटे बच्चे आते हैं घर की देहरी मैं फूल रखते हैं और बदले मैं उन्हें चावल दिए जाते हैं . बच्चों का समूह गावं के हर घर में जाता है . नवजात बच्चों के लिए एक अलग नई टोकरी ले कर जाते हैं . बच्चे पहले दिन से ही जंगलों से तरह -तरह के फूल तोड़ कर लाते हैं .बच्चे बहुत खुश दिखाई देते हैं
और घर की देहरी में बिखरे फूल घर को भी ख़ुशी दे जाते हैं .
आज त्यौहार मनाया .
सोमवार, 5 मार्च 2012
Abhinav Gatha: सुबह का उगता सूरज दिन की कथा के शीर्षक की तरह है...
इसलिए जरुरी है कि सुबह अच्छी हो . आशावादी हो दिन की कथा का शीर्षक .
एक सुखद संगीत पूरे दिन मन में गूंजता रहे .
सपने हों आँखों में .
अंतर्मन में हो प्यास प्रेम की .
लेकिन यह सब होने के लिए क्या हम अपने चारों ओर के मानवीय और पर्यावरणीय वातावरण के प्रति संवेदनशील हैं?
हमने सहनशीलता खो दी है . धैर्य खो दिया है और दूसरों के लिए जीवन दूभर बनाते जा रहे हैं .दूसरों में वे सब जो प्रकृति के जीव हैं .जो प्राण हैं . उनमें स्वयं हम भी हैं . प्रकृति के साथ हमारा व्यवहार बहुत ही अमर्यादित होता जा रहा है.
हर क्षण धरती पर फटने वाले बमों / परमाणु युद्धों के इस दौर में प्राकृतिक हितों की बात करना बेमानी है. महाशक्तियां तो सब कुछ ख़त्म कर देना चाहती हैं .खुद को भी .
फिर भी एक चींटी की तरह प्रयास तो किया जा सकता है . कि धरती में जीवन सभी के लिए सुगम बने .
गुरुवार, 1 मार्च 2012
jangal bavhao
लेकिन फिर भी हर वर्ष जंगल जलाये जा रहे हैं . आग को रोकने का क्या किसी के पास कोई इन्तेजाम नहीं है क्या ?
या आग बुझाना नहीं चाहते ? या यह लीसा और लकड़ी माफियाओं ,जंगली जानवरों के तस्करों और ग्रामीणों की मिलीभगत से हो रहा है. अकेला साधन हीन वन विभाग कुछ नहीं कर सकता .
जैसे भी हो रहा है .गावों के भविष्य के लिए तो अच्छा संकेत नहीं है . गावों में सूखा बढेगा , फसल का उत्पादन प्रभावित होगा , रोजगार के अवसर प्रभावित होंगे और पलायन बढेगा , अंततः गावों का अस्तित्व ही खतरे में होगा .
हर साल चातुर्मास में करोड़ों का पौंधा रोपण होता है और मार्च आते-आते सब जलकर स्वाहा हो जाता है धरती हरी-भरी होगी कैसे ?
गुरुवार, 26 जनवरी 2012
बुधवार, 25 जनवरी 2012
मंगलवार, 24 जनवरी 2012
चुनाव चर्चा
लेकिन दिखाई दे रहा है कि अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए जनता का विवेक नहीं जागा है । लोग तय नहीं कर पा रहे हैं कि किसे चुनें ?और क्यों चुनें ? अच्छे और बुरे तक को तय करने का विवेक नहीं है । धन की चकाचोंध में लोग यह मालूम करना भी भूल गए हैं कि इतना बेतहाशा धन आया कहाँ से ?प्रत्याशी की आय का श्रोत क्या है ? और यह प्रत्याशी इतनी विशाल धनराशि खर्च क्यों कर रहा है ? एक आम आदमी ने अपने जीवन में उतने सादे पन्ने नहीं देखे होंगे जितने नोट इन चुनावों में खर्च होते हैं । इन हालातों में तो लोकतंत्र /सत्ता न तो आम आदमी के हाथ में रहेगी और न ही आम आदमी के लिए । लोकतंत्र बाहुबलियों /धनबलियों /छलबलियों की गिरफ्त में आ जायगा । आम आदमी अन्याय और भ्रष्ट्राचार की मार सहेगा । वह लोकतंत्र में शक्तिविहीन होगा ।
धनबल ,बाहुबल,छलबल की चर्चा तो सुनी जा रही है लेकिन आत्मबल की आवाज कहीं नहीं सुनाई दे रही है । मतदाताओं को विवेक से निर्णय लेने की बात कहने के लिए कोई मध्यस्त प्रचारक नहीं है ।
शुक्रवार, 23 सितंबर 2011
उपवास या उपहास
गाँधी तो सदियों में एक होंगे । वह भी घोर तपस्या और संघर्ष के बाद ।
दूसरी बात समझ नहीं आ रही है कि इस सरकार के सलाहकारों को क्या हो गया ? क्या वे विपक्ष के साथ है ?
ग़रीबी रेखा पर कांग्रेस सरकार का आंकड़ा बेहद शर्मनाक है !क्या सरकार के इन मंत्रियों को मालूम है कि आम आदमी के एक समय का सादा खाना कम से कम ३० रुपये में बनता है दो समय का साठ रुपये में ।
यह आकंडा तो सरकार के किसी सलाहकार और मत्री ने मिल कर किसी पञ्च तारा होटल में बैठकर ही बनाया होगा । गरीब को और महंगाई को देख कर नहीं । ग़रीबी और बदहाली को देखना है तो गावों में देखो , महानगरों की अँधेरी तंग गलियों में जाकर देखो । तब आकंडा पेश करो ।
एक तथ्य तो स्पष्ट है कि सरकार के मंत्री गण ही विपक्ष को हल्ला करने का मौका देरहे हैं। क्यों ?क्या उन्हें माननीय मनमोहन सिंह जी बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं ?या सरकार की दूसरी पारी हजम नहीं हो रही ?
यदि कोंग्रेस विवेक से निर्णय ले तो सरकार अवश्य तीसरी बार भी कांग्रेस की ही बनेगी ।
रविवार, 18 सितंबर 2011
पहाड़ और पलायन
आँगन में कुछ काम किया । कुछ देर खेत में काम किया । असोज का महीना है । एक तरफ खेतों में अनाज तैयार खड़ा हैं दूसरी तरफ जंगलों में घास भी तैयार है ।
किसान इतने व्यस्त हैं कि उनके पास सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है । लेकिन दूसरी तरफ महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि गावों में किसान दिन प्रति दिन कम होते जा रहे हैं । लोगों का रुझान खेती की ओर से हट रहा है । वे लोग बस किसी भी प्रकार खेती से छुटकारा पा कर कोई भी नौकरी कर लेना चाहते है। लोगों ने यह धारणा बना ली है कि पहाड़ों में खेती में अब भविष्य नहीं रहा । जिस गावं में भी जाता हूँ देखता हूँ कि गावों में खेत के खेत बंजर पड़े हैं । जो घर में हैं भी वे भी खेती के इच्छुक नहीं दिखाई देते । वे भी खेतों को बंजर छोड़ते जा रहे हैं । पशुधन कम होते जारहे हैं । लोग अपने मवेशियों को छोड़ कर उनसे पीछा छुड़ा रहे हैं । किसी समय में पहाड़ के किसानों की रीढ़ होने वाले जानवर आज पहाडो में यत्र तत्र आवारा घूम रहे हैं । कहीं वे बाघ का निवाला बन रहे हैं तो कहीं लोग उन्हें बुरी तरह पीट कर भगा रहे हैं । गाय किसी युग में माता के सामान हुआ करती होगी । आज तो एक बोझ है। मनुष्य की एक क्रूरता स्पष्ट रूप से सामने आ रही है ।
यहाँ से पलायन कर गया अधिकांश युवक कोई बेहतर स्थिति में नहीं दिखाई देते । यदि वे घर पर रह कर अपने लिए खेतों में रोजगार के नए अवसर पैदा करने कि कोशिश करते तो कहीं बेहतर स्थिति में होते ।
आज भी पहाड़ में खेती के स्वर्णिम अवसर हैं । आवश्यकता है तो मेहनत की। बुद्धि की । युक्ति की । कृषि में नए प्रयोग करने की । उद्यान में नए प्रयोग करने की । पानी और हवा में नए प्रयोग कर अवसर पैदा करने की ।
आज पलायन पहाड़ के वयोवृद्ध पुरुषों व महिलाओं के लिए एक त्रासदी बनकर सामने आ रही । वे घरों में एकाकी पड़ गए हैं । उनका अंतिम समय अपने बच्चों के साथ के बगैर गुजर रहा है। वे मौन होते जा रहे हैं । वे असहाय होते जा रहे हैं । वे अपने अंतिम समय को लेकर खुश नहीं हैं।
बुधवार, 14 सितंबर 2011
गुलाम मानसिकता से भी आजादी चाहिए .
उन सभी नेताओं को जो हिंदी या अन्य भारतीय जनों की प्रांतीय भाषाओँ के मतदाताओं के मतों से जीत कर संसद पहुंचते हैं । किन्तु वहां जाकर अंग्रेजी में अपना भाषण देते हैं ।
जब वोट मांगते हैं तब उन्हें हिंदी या अन्य भारतीय/प्रांतीय भाषा बोलनी आती है । किन्तु संसद में पहुंचते ही वे सबसे पहले अपनी भाषा बदलते हैं । यह जनता का सरासर अपमान है । राष्ट्र का अपमान है ,हिंदी का अपमान है । हिंदी भाषियों का अपमान है । जनता को अधिकार है कि वे संसद में अपनी भाषा का तिरष्कार करने वाले सांसदों को भी बदलें .हिंदी के हर साहित्यकार का दायित्व है कि वह प्रधानमंत्री को राष्ट्र भाषा के प्रयोग के लियें लिखें । कम से कम भारत माता के मंदिर में तो राष्ट्र भाषा को प्राथिमकता मिले । वे सांसद जो हिंदी नहीं जानते हैं .क्या अपनी क्षेत्रीय भाषा भी नहीं जानते हैं ।
इस गुलाम मानसिकता से भी आजाद होना ही होगा ।
शनिवार, 10 सितंबर 2011
कविता और सत्ता
प्रकृति से संवाद रोजमर्रा का एक हिस्सा होता है।
और यहीं जन्म लेती हैं कवितायेँ । हवा की मानिंद किताबों से होते हुए आप तक पहुंचती हैं .
आप लोग पढ़ें , न पढ़ें या क्यों पढ़ें । यह तो आप की बात है । मैं तो फूलों से रंग और सुगंध ,जंगलों से हरियाली और हवा ,पहाड़ों से ठंडी बयार ,नदी की छल-छल ,कल-कल की मधुर ध्वनियाँ और सायं -सायं की गर्जना ,तथा अपने मन की बात । सब कुछ मिलाकर आपकी ओर बढ़ा देता हूँ ।
पढ़ना आज एक समस्या हो गयी है । लोगों की दिनचर्या से पढ़ने के लिए समय ख़त्म हो गया है । और प्रेम करने के लिए भी । प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए भी । ह्रदय एक पम्पिंग मशीन बनकर रह गया है । व्यक्ति राजनीति का एक मोहरा मात्र रह गया है । उसकी अपनी चेतना की डोर जैसे राजनेताओं के हाथों में चली गयी हो ।
यहाँ साहित्य समाप्त हो जाता है , कविता समाप्त हो जाती है । संवेदना ख़त्म हो जाती है ।
एक सुगन्धित और खुबसूरत फूल का होना न होना कोई अर्थ नहीं रखता है ।
क्योंकि सत्ता तो लाशों के ढेर के ऊपर से हो कर गुजरती है । तो जाहिर सी बात है की राज नेता भी सत्ता के पीछे पीछे उसी तरह चलता जायगा ।
राजनेता के लिए सत्ता पाना और सत्ता में बने रहना ही अंतिम सत्य है । और यह रास्ता तानाशाही की ओर जाता है । तानाशाह आजकल क्या कर रहें हैं यह तो आप देख ही रहे हैं ।
शुक्रवार, 9 सितंबर 2011
रंगों का मेला
कुदरत का यह मिजाज बहुत मन भावन लगता है ।
यह यादों के लौट आने का मौसम है !
जब हमें उम्मीद रहती है किसी के आने की तो लौट कर आती हैं सिर्फ यादें ।
ठण्ड के साथ । ठण्ड की तरह ।
लौट कर आने लगे हैं फूलों के रंग । जंगलों में हरी घास के साथ कई तरह के फूल अपने -अपने रंगों में खिल आए हैं । यूँ लगा कि कुदरत के मेले में सब पौंधे अपने -अपने रंगों की दुकान ले आए हैं । इन खुबसूरत जंगलों से जाने की इच्छा ही नहीं होती है। कौन सा रंग ले जाऊ ? किस रंग से खुश होगी प्रियतमा ?
बहुत सुन्दर है यह रंगों का मेला । तरह -तरह के रंग हैं , सुख के रंग ,दुःख के रंग।
सबसे सुन्दर रंग है प्रीत का रंग ।
गुरुवार, 8 सितंबर 2011
अत्यंत दुखद/निंदनीय
दिल्ली बम ब्लास्ट की निंदा करता हूँ ।
ईश्वर बम ब्लास्ट में मारे गए लोगों की आत्मा को शांति प्रदान करे । तथा उनके शोक शंतप्त परिजनों को इस दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे ।
यह बहुत ही दुखद है । ओह ! मानवता अभी भी कितने खूंखार दानवों को झेल रही है ।हम अहिंसा के पक्षधर हैं । यह घटना विश्व शांति पर आघात है ।
क्या हम सब सुरक्षित हैं ?
सरकार क्या कर रही है ? सिर्फ घोटाले और भ्रष्टाचार विरोधियों को जेल भेजने में व्यस्त है ?
क्यों?
सोमवार, 5 सितंबर 2011
लोग याद रखते हैं .
आज जमाना डाकखाने का तो लगभग नहीं के बराबर है । पत्र आने अब बंद हो गए हैं । फ़ोन पर हुई बात में वह बात नहीं । एक बार मिले पत्रे को हम कई बार पढ़ते हैं । फिर संभाल कर रखते हैं । कुछ दिनों के बाद फिर उसी को पढ़ना चाहते हैं । बरसों बाद भी उसी पत्र को पढ़ कर वही आनंद आता है । और दशकों बाद वह एक बहुमूल्य दस्तावेज बन जाता है । और हम चाहते हैं कि हमारी मृत्यु के बाद भी पत्र सुरक्षित रहे । लोग पढ़ें । हमारे बच्चे ,बच्चों के भी बच्चे और पूरी दुनियां जाने हमारे राज ।
एक बार लिखकर बाहर आने के बाद वह अमिट हो जाता है । लोग याद रखते हैं । पत्रों को ।
पत्रों के बहाने हमको ।
शनिवार, 3 सितंबर 2011
आत्म सुधार की कोशिश हो .
सरकार यह भूल रही है कि अन्ना भारत के दूसरे गाँधी हैं । और स्वतंत्र भारत के पहले गाँधी । जनता इसे माफ़ नहीं करेगी । सरकार को सुधार की मुहिम सरकार से आरंभ करनी चाहिए । यदि कांग्रेस चाहती है कि तीसरी बार सत्ता मिले तो उसे अन्ना और अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी जन लोक पाल बिल का सहर्ष स्वागत करना चाहिए । यदि सरकार बदले की भावना से काम करेगी तो मौजूदा सांसदों का दुबारा जीत कर आना मुश्किल होगा ।
सरकार जनता की प्रतिनिधि की तरह काम करे । राज शाही की तरह नहीं । अन्ना के खिलाफ लगातार अनुचित टिप्पणियां करने वाले सरकार के मंत्री और सांसद जनता के बीच सरकार की छवि धूमिल करने का काम कर रहे हैं ।
मंगलवार, 30 अगस्त 2011
कहीं कोई सपना नहीं था
तो सोचा कि कुछ रुका हुआ काम निबटा लिया जाय । लेपटोप पर कवितायेँ टाईप की
काम करते- करते तीन बज गए थे । इस बीच रात में कई बार बाहर आया । रात के अँधेरे का सन्नाटा बहुत डरावना लग रहा था ।
पेड़ कैसे रहते होंगे इस भयानक सन्नाटे के बीच ।
किसी पत्ते के गिरने की आवाज भी डरा देती है । मैंने खूबसूरत चांदनी रातों को भी देखा है ।और उन रातों में खड़े पेड़ों की मस्ती और ख़ुशी भी ।
रात भर काम करता रहा, बरसों पुरानी कविताओं के बीच से होकर गुजरा । लगा कि मैं कहीं कुछ छोड़ आया था । जो अब भी वहीँ पर है । एक नदी आज भी वहीँ पर बह रही है । उसकी सायं -सायं कि आवाज अब भी अपनी ओर खींच रही है । आज भी कोई मुझसे मिलने की आतुरता में घर से निकलने का बहाना ढूंढ़ रही है ।
जैसे- तैसे मैंने कवितायेँ समेटी । घडी देखी तो साढ़े तीन बज चुके थे ।
सिर्फ डेढ़ घंटा सोया ।
लेकिन कहीं कोई सपना नहीं था ।
सोमवार, 29 अगस्त 2011
सत्यमेव जयते
स्वतंत्र भारत में सत्य और अहिंसा का पहला राष्ट्रव्यापी प्रयोग जो पूरे विश्व को एक सन्देश भी दे गया ।
यह तो सर्वमान्य तथ्य है कि दुराचार एक न एक दिन ख़त्म होता ही है । चाहे वह कितना ही सशक्त क्यों न हो ।
लेकिन एक महत्त्वपूर्ण बात सामने आई । सत्य में शक्ति है । कि सिर्फ एक ईमानदार व्यक्ति के पीछे पूरा भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया खड़ी हो गई ।और दिग्गज नेताओं का समूह भी उसके आगे बौना हो गया । यह ईमान के प्रति लोगों की श्रद्धा है । और भ्रष्टाचार के विरुद्ध नफ़रत भी ।
शनिवार, 27 अगस्त 2011
Abhinav Gatha: अन्ना हजारे , देश के आम भारतीय की आवाज .
अन्ना हजारे , देश के आम भारतीय की आवाज .
लेकिन क्या आम भारतीय का नेतृत्व भी उतना ही पाक -साफ़ है ।
यक़ीनन नहीं ।
इसीलिए भ्रष्ट्राचार के खिलाफ अन्ना हजारे को अनशन करते हुए बारह दिन हो गए हैं ।यह भारतीय संसद और सरकार के लिए शर्म का विषय है . अन्ना हजारे के पीछे खड़ी होने वाली भीड़ ने साबित किया कि अन्ना हजारे पूरे देश के आम भारतीय की आवाज है । देश का नेतृत्व भ्रष्ट्राचार के दलदल में डूबता जा रहा है । सांसदों ,मंत्रियों ,मुख्यमंत्रियों के मुह पर सत्ता और दौलत का खून इस तरह लग गया है कि वे घोटालों ,रिश्वतखोरी ,भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध बोलने वालों को ही मार खाने को दौड़ रहे हैं ।
वे जन शक्ति को भूल गए हैं । वे यह भी भूल गए हैं कि हमें संसद भेजने वाली यह आम जनता ही है । जिसे ज्यादा समय तक बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है ।
और सरकारी पक्ष के सभी सांसदों ने अन्ना हजारे के अनशन को एक मजाक बना कर रख दिया है ।
सरकार बदहवास हो गयी है केबिनेट के मंत्री अपनी वाणी पर अपना संतुलन खो चुके हैं।
सरकार और सांसदों ने सिद्ध किया कि भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के हित सर्वोपरि है ।
सोमवार, 25 जुलाई 2011
खाली पन्ने
आश्चर्य !कि लोग उसमें से भी अपने विचारों के अनुसार सामग्री पढ़ने की कोशिश करते हैं । यानि कि पन्ना कोरा नहीं रहता । आकाश बिल्कुल खाली रहने के बाद भी लोग आकाश में अपना कोई कोना तलाशते हैं ।
अपने विचारों के लिए कोई सितारा तलाशते हैं । खाली आकाश से बातें करते हैं । या मौन होकर आकाश को एकटक निहारते हैं । तारों के बीच देखने की कोशिश करते हैं अपने बिछुड़े हुए प्रिय जनों को ।
लोग खाली पन्नों की किताब को सहेज कर रखते हैं । क्योंकि उसमें दर्ज किया जा सकता है जीवन --मृत्यु पर्यंत ।
लेकिन बहुधा खाली पन्नों की किताब खाली ही रह जाती है।
शनिवार, 2 जुलाई 2011
हरियाली है तो जीवन है .
आँखों के सामने पहाड़ों में फैली हरियाली थी । जिनमें से पढ़नी थी कथाएं अतीत की । और कथाएं अपने चारों ओर बिखरी लोगों की दिनचर्या की ।
खेतों और हरियाली / अनाज की पौंध से कितना प्यार करती हैं महिलाएं । सब कुछ भूलकर खेतों में रोपाई करने में व्यस्त हैं । कभी बारिश झम्म से आकर उन्हें भिगो जाती है तो कभी धूप गरमी से त्वचा जलने को तैयार रहती है । लेकिन ममता तो ममता है । धान हैं तो सपने हैं । हरियाली है तो जीवन है / प्यार है ।
हरियाली है तो आशा है ।
उमंग है ।
और हैं सपने ।
गुरुवार, 30 जून 2011
रात भी एक कविता है .
कभी ख़ामोशी से पढो ।
दिन से तय कर लो कि आज रात के साथ वक़्त गुजारना है ।
रात के रंग देखने हैं ।
रात आने वाले सपनों का भी स्वागत करना है ।
रात को आपके पास सिर्फ रात रहे ।
कोई शब्द नहीं ।
कभी -कभी शब्द जब ख़ामोशी तोड़ते हैं ।
तो रात चली जाती है ।
तब हम सिर्फ एक अँधेरे से घिरे हुए होते हैं ।
मंगलवार, 28 जून 2011
प्रेम की बरसात में .
मेरे भीतर की जमीन देख रही है बादलों को कि बरसे तो भीगेगा रोम -रोम ।
प्रेम की फसल के लिए जरूरी है भीतर के बादलों का बरसना ।
बरसेंगे बदल तो जरूर खिलेंगे हरी जमीन पर हल्के गुलाबी रंग के प्रेम के फूल।
हर चेहरे खिला होगा प्रेम का खूबसूरत रंग ।
लोग मिलेंगे आपस में प्रेम की बरसात में भीगते हुए ।
सोमवार, 20 जून 2011
साँसों में सुगंध
आजकल खेतों में मेला- सा लगा हुआ है । कोई गुड़ाई में व्यस्त है तो कोई रोपाई में । जमीन में हरे रंग के छींट की चादर बिछने लगी है । किसान सपने बो रहे हैं , सपनों की रोपाई कर रहे हैं ।
बारिश इस रंग में आनंद का एक और रंग घोल रही है ।
खेतों में भीगने का आनंद ।
तन के साथ साथ मन के भीगने का आनंद । बादलों के साथ -साथ घूमने का आनंद . बादलों के बीच सांस लेने का आनंद ।
लगता है कि इस मौसम में पेड़ -पशु- पक्षी -कीट -पतंगे सब एक अनूठे आनंद का अनुभव लेते हैं । एक नई उर्जा अपने भीतर जमा करते हैं .
मंगलवार, 24 मई 2011
आम आदमी का संघर्ष
ईमानदार आदमी को अपना उद्देश्य निरर्थक लगता है .
ईमानदार आदमी असुरक्षित है .क्योंकि सरकार ताकतवर भ्रष्टों का एक समूह बन बन गया है ।
समाज की वर्तमान जीवन शैली में कोई नहीं सोच रहा है देश में सिर्फ अपने आर्थिक हितों के बारे सोचने की एक लाइन बन गयी है सामाजिक हित दरकिनार हो गए हैं । मानवीय हित एक किनारे कर दिए गए हैं ।
एक नीति बन गई है कि कुछ भी करो किसी को भी मारो लेकिन रुपया बनाओ । समय रुपयों का है ।
आज आम आदमी प्रदूषित जिंदगी जीने को विवश है ।वह अपनेऔर अपनी आने वाली पीढ़ी के वजूद के लिए संघर्ष कर रहा है ।आम आदमी व्यवस्था बदलने की सोचता है । लेकिन हर बार दुर्भाग्य से सिर्फ सत्ता बदलती है । कभी चील सत्ता पर होती है तो कभी कौए ।
सोमवार, 18 अप्रैल 2011
उफ!
बिजली भी चमकी ।
मैं दिल खोल कर बैठा था कि बिजली मेरे दिल में उतरेगी।
लेकिन मालूम नहीं किसके दिल में उतरी ?
जहां उतरी होगी वहां फूल खिल गए होंगे ।
मैं तो बस, भीगता रहा सारी रात । बिलकुल तनहा ।
सुबह देखा तो धरती चमक रही थी ।
रात बिजली हरियाली भी बिखेर गई होगी ।
उफ!
मंगलवार, 12 अप्रैल 2011
इस मौसम में बारिश चाहिए ।
गधेरे/श्रोत /नदियाँ सूखने के कगार पर हैं । फसल को बारिश का इंतज़ार है । फूलों को भी अपने रंग बिखेरने के लिए बारिश चाहिए ।
बारिश में ही तन और मन भी भीगेगा ।
भीतर कहीं एक आग भी लगेगी ।
रविवार, 10 अप्रैल 2011
कभी -कभी लगता है कि लिखने के लिए कुछ नहीं बचा । लेकिन फिर दिखाई देता है कि इतना बचा है कि अभी तो शुरू भी नहीं माना जा सकता ।
इस देश में भ्रष्ट्राचार के खिलाफ सरकार को हिलाने के लिए एक ही व्यक्ति काफी है बशर्ते कि वह खुद भ्रष्ट न हो । स्वार्थी न हो ।
भ्रष्ट्राचार की हद तो काफी पीछे छूट गई है । इस कीचड़ में देश बहुत आगे निकल आया है ।
जनता के पास नेताओं का विकल्प भी होना चाहिए ।क्यों कि कुरसी मिलते ही नेता की सोच ख़त्म हो जाती है । विवेक ख़त्म हो जाता है । या भ्रष्टाचार के बल पर विवेकहीन सत्ता पर काबिज हो जाते हैं ।
मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011
शब्दों की माला
लेकिन जंगलों में मेहल, कनेर ,बुरांश ,पीहुली और भी कई तरह के फूल खिले हुए हैं । जंगलों में इस तैयारीको देख कर लगता है कोई परी इस धरती पर उतरने वाली है ।
या मेरी प्रेमिका ने यह सब सजा कर रखा है ।
बहर हाल यह कुछ भी हो , मैं तो मंत्र मुग्ध हो गया हूँ ।
शब्दों की माला गूँथ रहा हूँ । उसी के लिए
जिसने मेरे लिए जंगल सजाया ।
मुझे स्वप्न दिए । मुझे रंग दिए और प्रेम दिया।
जिसका कोई ओर न छोर
फूलों में रंग और सुगंध की तरह ही है जो मेरे भीतर ।
रविवार, 6 फ़रवरी 2011
महफ़िल
या कि शब्दों का ही इंतज़ार था ।
किसी भी बहाने से नहीं आ रहे हैं शब्द। न फूलों के बहाने से , न प्रेमिकाओं के बहाने से , न भूख के बहाने से , न अत्याचार के बहाने से ।
महफ़िल सजी हुए है । एक तनहाई छाई हुई है । शब्द कहीं नहीं हैं ।
यह ख़ामोशी मेरे भीतर एक ताना बना बुन रही है ।
एक कथा या कविता ।
गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011
गावं
गावों को बहुत करीब से देखने का मौका मिला ।
गावं और पहाड़ -घाटियाँ मुझे बचपन से ही बहुत लुभाते हैं ।
संस्था के गठन के साथ ही पहाड़ के दूर दराज की जिंदगी को बहुत करीब से देखा । लोग बहुत कठिन जीवन जीते हैं ।
कठिन श्रम ! लेकिन कठिन श्रम के बाद भी आर्थिक रूप से काफी पीछे हैं । शिक्षा और जागरूकता का स्तर अभी बहुत पीछे है। आश्चर्य कि स्कूलों में लगभग सभी अध्यापक स्थानीय होते हैं। यानि सभी शिक्षक स्थानीय होने के नाते जिम्मेदार भी होने चाहिए । लेकिन ऐसा नहीं है। शिक्षा तो जैसे इन स्कूलों पर आकर थम जाती है । छात्रों का विकास यहीं से अवरुद्ध होना शुरू हो जाता है । एक गावं का परिचय वहां के बच्चे दे देते हैं । आप उनसे कुछ बोलो मत, कुछ पूछो मत. बस उनकी गतिविधियाँ देखते रहो ।
फिर भी पहाड़ के लोग बुद्धिमान , एकांत ,और शांत प्रिय लोग होते हैं ।
रविवार, 16 जनवरी 2011
सपनों का सच

कल दिनभर सपनों को सींचती रही बारिश,
कल दिन भर की बारिश के बाद एक खुशनुमा दिन ।
दिन धूप की किरणों के साथ चुपचाप खिसकता गया । मैं धूप में बैठा सपनों के ताने -बाने बुनता रहा । कुछ देखे हुए सपने ,और कुछ अनदेखे सपने ,देखे हुए सपनों के धागों से अनदेखे सपनों के चित्र बना रहा था ।
सतरंगी किरणें चुपचाप मेरे सपनों में रंग भर रही थी । मैं सपनों को आकार लेते हुए देख रहा था ।
मेरे सपनों को इंतज़ार था प्राणों का ,मुझे सपनों में प्राण डालने हैं । सपनों में प्राण तो हमें ही पिरोने होते हैं ।
सपने सच भी होते हैं ।
होते भी आये हैं । बिलकुल सच । जैसे देखे थे । तुमने, मैंने ,उसने ,हम सब ने ।
गुरुवार, 13 जनवरी 2011
प्रकृति
लेकिन मेरे पास वक़्त नहीं था कि मैं धूप के साथ कुछ देर खड़ा रह सकूँ ।कुछ देर बहती छलछलाती नदी के पास जाऊ ,कुछ देर मछलियों से बातें करूँ ।
और सुबह की ठण्ड भी बहुत तीखी थी लेकिन उसको भी महसूस करने का वक़्त मेरे पास नहीं था । मेरे पास सफ़ेद कुहरे के पास जाने का भी वक़्त नहीं था ।
लगता है कि मेरे केंद्र से प्रकृति हट गई है ,प्रकृति साहित्य के केंद्र से भी हट गई है । कविता के केंद्र से भी हट गई है ।
प्रकृति युद्ध के केंद्र में है ।
और युद्ध का नियंत्रण महाशक्तियों के हाथ में है ।
हर ओर तबाही
भयंकर विनाश । .........दूसरों के विनाश में ही महाशक्तियों का जीवन है ।अन्यथा वे कुछ नहीं
यह सब हमारे हाथ में नहीं । हमारे हाथ में तो सिर्फ लिखना है । बस कुछ अच्छा लिखा जाय ।
बुधवार, 8 दिसंबर 2010
पलायन का दंश

एक गावं सुराना रिखारी से अभी-अभी लौटा हूँ । प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर गावं । यहाँ से चारों ओर का नजारा देख सकते हैं .हिमालय श्रंखला की हिमाच्छाद्दित पहाड़ियां मन को मोह लेती हैं । तो नीचे की ओर रामगंगा घाटी आकर्षित करती है ।इतनी ऊंचाई पर बसा यह गावं प्राकृतिक रूप से धनी होने के साथ -साथ फसल उत्पादन में भी आत्म निर्भर है । यहाँ पानी भी प्रचुर मात्र में उपलब्ध है । इसे प्रयास करके आर्थिक रूप से भी आत्म निर्भर बनाया जा सकता है । लेकिन यह गावं भी रोजगार की कमी के कारण पलायान का दंश झेल रहा है । पहाड़ों में गावों में उत्साही नवयुवकों के पलायन से वृद्ध लोगों के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई है । वे लोग भी अकलेपन का दंश झेल रहे हैं ।
मैंने अभी तक देखा है कि गावों में रोजगार सृजन के लिए प्रयास किये जायं तो काफी हद तक पलायन रुक सकता है ।
नेट पर बैठ कर मेल देखी । कुछ काम निबटाये ।
सुबह दिल्ली से मामाजी जी आये थे । कुछ देर उनके साथ बैठ कर बातें की।
रविवार, 5 दिसंबर 2010
कुछ लिखना चाहिए
दिन यूँ ही बीता । गावं की तरफ गया । धूप थी लेकिन ठण्ड के कारण महसूस नहीं हो रही थी ।
इस बार वारिश हुई तो सीधे बरफ गिरेगी ।
बर्फ के साथ गिरेंगी यादें ।
सुबह उमा के हाथों की पहली चाय और फिर अखबार के साथ दिन की शुरुआत की । कविताओं में खोने की सोच रहा था ,खोया ,लेकिन कविताओं में नहीं , बरफीली पहाड़ियों में । ठंडी हवाओं में । हरे भरे जंगलों में ।
लौटा तो लगा कि खाली लौट आया । एक शून्य मेरे भीतर था ।
जिसमें कहीं कोई शब्द नहीं था ,
कोई आवाज नहीं थी ,बिलकुल निः शब्द ।
लौटने के बाद मैंने और उमा ने साथ चाय पी । अच्छा लगा। शून्य में एक दस्तक ।
द्वार खोलो शब्द भीतर आना चाहते हैं ।
मुझे लगा कि आज तो कुछ लिखना ही होगा ।
सांझ ढल गई ठण्ड ने फिर आ घेरा । सारे पक्षी अपने अपने घोंसलों में लोट आए हैं । इस मोह ने एक शून्य को तोडा
और मैं फिर शब्दों के बीच आ बैठा । सोचा कि कुछ लिखना चाहिए ।
बुधवार, 1 दिसंबर 2010
अंतर
आज कई दिनों के बाद लिखने बैठा हूँ ,इस लिए सोच रहा हूँ कि क्या लिखूं ? नेताओं को मुद्दे चाहिए ,चाहे वह समाज के लिए कितना ही घातक क्यों न हो .वहां विवेक का कोई महत्त्व नहीं है
और लेखक को विषय .किन्तु विवेक के साथ ।
एक सत्ता से उतरते ही भुला दिया जाता । और दूसरे को पीढियां याद करती हैं एक के सम्मान की सीमा है और दूसरे का सम्मान वैश्विक होता है । एक अथाह दौलत पाना चाहता है और अथाह दूसरा ज्ञान । एक समेटता है दूसरा बांटता है. यह समाज है ।
आदमी और आदमी के बीच सत्ता ने एक गहरी खाई खोद रक्खी है । उस खाई को पाटे यही लेखक का काम है ।
गुरुवार, 4 नवंबर 2010
उल्लास भी एक रौशनी है

दीपावली पर सभी मित्रों व पाठकों को हार्दिक शुभ कामनाएं .
आज लगा कि कुछ अपनी बात कहनी चाहिए । कई दिनों से खामोश था ।
बिलकुल मौन । यानि एक प्रकार से अँधेरे को ओढ़े हुए ,
दीपावली - प्रकाश पर्व पर तो हर ओर प्रकाश होना ही चाहिए
उल्लास भी एक रोशनी है ।
और उम्मीद भी । दोनों एक साथ मिलें तो मंजिल की ओर एक उत्साह के साथ कदम बढ़ेंगे ।
बुधवार, 29 सितंबर 2010
यह दैवीय आपदा थी
आज बहुत दिन हुए अपने ब्लॉग पर बैठे । इस साल की बारिश ने बहुत तबाही मचाई । लग रहा था कि pरक्रती सब कुछ तबाह कर डालेगी । पहाड़ की हर सड़क हर १०० मीटर पर या तो टूट गई थी या ऊपर दे मलवा आने के कारण अवरुद्ध हो गई थी कई जगह तो सड़क का नामो निशान ही नहीं था । एक हफ्ता तक यातायात ठप रहा । वह तो जे सी बी/अर्थ मूवर ने ताबड़ तोड़ चौबीसों घंटे काम करके कुछ मुख्य सड़कें हलके वाहनों के लिए खोल दी .खाने की चीजें ख़त्म होने लगी .आपूर्ति बंद हो गई .हर ओर बाढ़ - भू स्खलन का खतरा मंडरा रहा था । और बारिश थी की थमनेका नाम ही नहीं ले रहे थी .इन्हें दुरुस्त होने में बरसों लगंगे हर गावं में मकानों में दरारें आई कई मकान मलवे के नीचे जमींदोज हो गए . कई लोग दब कर मर गए। ऊपर से पहाड़ धंस कर आने से एक स्कूल में मलवा दीवार तोड़कर अन्दर आने से एक दर्जन से अधिक बच्चे दब कर मर गए । कई आदमी/ औरतें उफनते नदी नालों में बह गए पहाड़ों में भयंकर तरीके से भू स्खलन हुआ .प्रशासन ने कई जगह गावं के गावं खाली करवाए । लोगों ने दहशत में रातें बिताई । लग रहा था कि हर पहाड़ दरकने वाला है ।विशाल चट्टानें खिसक कर ऊपर से नीचे तक आगई . खड़े पहाड़ों के नीचे का हर गावं जमींदोज होने के खतरे के अन्दर था .पूरा उत्तराखंड बरसों पीछे चला गया । लोगो को बचाने के सरकार के प्रयास बहुत सराहनीय थे ।
अब धूप आयी । लेकिन लोगों के आंसूं अब भी बरस रहे हैं । किसी का घर गया तो किसी का प्राणों का प्यारा ।
यह दैवीय आपदा थी । समर्थ पर भी आयी और असमर्थ पर भी ।
मंगलवार, 31 अगस्त 2010
कामन वेल्थ का खेल
यह सरकार को धिक्कारने का विषय है ।
भारत के किसी भी कोने से कुछ भी लिया होता तो गर्व का विषय होता ।
स्पष्ट होता है कि संसद में कैसे लोग बैठे हैं ।लगता है कि आत्म सम्मान के खेल में हम खेलने से पहले ही हार गए हैं । खेलों में घोटालों के महा खेल के बारे में तो खेलों के बाद ही मामला साफ़ होने के बाद कुछ कहा जा सकेगा । जब धुआं उठा है तो आग भी जरुर लगी होगी।
आज कई दिनों बाद आसमान साफ़ देखा । जमीन पानी से पूरी तरह भर चुकी है । नदी नाले भरे हुए हैं यह बारिश कई बरसों बाद हुई है । हालाँकि काफी जान माल का नुक्सान हुआ .बहुत लोगों ने अपनों को खोया यह बारिश उनके लिए कहर बनकर बरसी । फिर भी धरती के लिए यह बारिश अमृत की तरह थी ।
यह धूप भी अमृत की तरह लग रही है ।
गुरुवार, 26 अगस्त 2010
हरा मौसम
यह सब अनियंत्रित निर्माण का नतीजा है ।
दिन बहुत व्यस्त रहा । दोपहर बाद कमरे से बाहर निकलने का समय नहीं मिला । कुछ प्रधान लोग आये थे । उनके साथ बातों में रह गया । शाम को बाहर निकल कर कुदरत का नजारा देखा । हरियाली धरती पर बिछ गयी है ,। एक हरे कालीन की तरह ,जिस पर चलते हुए हरे सपने देखे जा सकते हैं ।
यह मौसम प्यार का है । और इसे सहेज कर रखा जा सकता है।
बादलों को देखा । अभी पानी से भरे आकाश में घूम रहे थे लग रहा था कि बरसने के लिए जगह तलाश रहे हों ।
कई दिनों से पुराने सूख चुके झरनों को फिर झरते देखा ।लगता था कि दूध के झरने हैं ।
सोमवार, 2 अगस्त 2010
हरे सपनों का संसार
हम इस रंग से बहुत उत्साहित होते हैं । और चाहते हैं कि इस हरियाली को हम दीर्घजीवी होकर देखते रहें । इसमें हमारा अतीत भी है और भविष्य भी । स्वप्न भी सच्चाई भी ।
एक सुखद अनुभव भी ।
मैं चाहता हूँ इस हरियाली को अपने रोम -रोम में उगा लूँ , सपनों में सहेज कर रख लूँ । थोड़ा धूप , थोड़ा बादल और थोड़ा पानी अपने भीतर जमा कर लूँ ।
ताकि मेरे भीतर भी हरियाली हमेशा रहे ।
शनिवार, 31 जुलाई 2010
पेड़ लगायें
यह हरियाली,मौसम का यह रूप सहेज कर रखने लायक है
ऐसी बारिश समय समय पर होती रहे तो पहाड़ों में गर्मियों में पीने के पानी की परेशानी नहीं होगी और वातावरण भी स्वच्छ रहेगा ।
हमें इसके लिए अधिक से अधिक बांज ,उतीस ,देवदार बुरांश कंफल के पेड़ लगाने चाहिये।
बुधवार, 21 जुलाई 2010
शिक्षा का गिरता स्तर
गावं कोई भी हो इस समय बहुत खराब दौर से गुजर रहे हैं । हर गावं पलायन का दंश झेल रहा है । कई जगह तो गावं का अस्तित्व ही खतरे में है ।
बेरोजगारी के साथ-साथ शिक्षा का गिरता स्तर भी इसके लिए जिम्मेदार है । सरकारी स्कूलों में किताबें निःशुल्क मिलती हैं दोपहर का खाना निःशुल्क मिलता है फिर भी इन स्कूलों में कोई अपने बच्चों को नहीं भेजना चाहता है । खुद इन्हीं शिक्षकों के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ने जाते हैं ।सरकारी स्कूलों के अध्यापकों का वेतन भी निजी स्कूलों के अध्यापकों के वेतन का दस गुना तक ज्यादा है इसके अलावा सरकारी अध्यापकों को दुनियां भर की ट्रेनिंग दी जाती हैं । । लेकिन निजी स्कूलों मे बिना किसी विशेष ट्रेनिंग के भी बेहतर काम दिखाई देता है । सरकार भी बच्चों के साथ खिलवाड़ में पीछे नहीं है । हर वर्ष किताबें बदल जाती हैं । और छात्रों तक किताबें पहुचने में भी बहुत बिलम्ब होता है ।आखिर यह सब क्यों ? बच्चों के साथ यह खिलवाड़ क्यों ? शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है । यह सब सरकारी नियंत्रण से हटाना होगा।
शनिवार, 17 जुलाई 2010
हरियाला आप सभी को मंगलमय हो .
मंगलवार, 13 जुलाई 2010
अपनी कहानी
अपनी कहानी का एक पात्र हूँ । और एक रस्सी की तरह बहुत सारी चीजों को अपने इर्द-गिर्द लपेटते हुए कई पात्रों को अपने साथ जोड़ते हुए
सब लोगों के बीच खड़ा हूँ या साथ चल रहा हूँ ।
हर रोज अपनी कहानी खुद ही पढ़नी होती है । बिलकुल अकेले ।
रोज की तरह सुबह उठा , पत्नी चाय बनाकर ले आयी । बाहर सुबह की ठंडी बयार में बैठ कर चाय पी । और फिर अपने रोजमर्रा के कामों में जुट गया । एक -एक पल एक कहानी को रचते हुए ।
चारों ओर की सुखद हरियाली ,बादलों से भरा नीला आकाश । और मैं अपने सपनों को तराशते हुए आगे बढ़ते हुए आज की कहानी लिखने बैठा हूँ ।- काश! मौसम का यह रूप हमेशा साथ रहता .
रात स्वप्न अपनी कहानी लिखेंगे ।
कभी -कभी स्वप्न भी बहुत भयानक कहानी रच डालते हैं । बावजूद इसके स्वप्नों की कहानी भी होती बड़ी दिलचस्प है। और हम बहुत कुछ स्वप्नों की कथा में भी छुपाते हैं । खुद अपनी पत्नी से भी । जो कि हमारी कथा की सबसे पहली पात्र है .
शनिवार, 10 जुलाई 2010
अतीत का केनवास
रूटीन के काम निबटाये . कुछ पुराने कागज पत्र देखे । कुछ बेकार -से कागज जलाये ।
लगा की यादों को जला रहा हूँ । लेकिन यादें हैं कि और ताजा होती जाती हैं
फिर सोचा कि यादों को इस तरह नहीं जलाना चाहिए । उन्हें सहेज लेना ही बेहतर होगा .चाहे मन के किसी कोने में । कमरे की दीवारों में यादों के लिए भी जगह होनी चाहिए ।
कभी- कभी अंतर्यात्रा के समय मन की यादों की गेलरी से होते हुए जाना काफी सुकून भरा लगता है । उस गेलरी में एक विराट केनवास है ।जिसे देखते हुए निकलना बहुत आश्चर्य भरा लगता है । यकीन नहीं होता है कि इस केनवास में चित्रित चित्र स्वयं की जिंदगी के हिस्सा थे । अच्छे या बुरे - सुखद या दुखद , यह बात अलग है ।
अंतर्यात्रा आत्म सुधार के लिए का एक अवसर भी है । आत्म समालोचना भी है। कि हम कहाँ थे और कहाँ हैं ।
मंगलवार, 6 जुलाई 2010

दो दिनों से लगातार बारिश से धरती नहा रही है । और निखरती जा रही है । हरियाली का यह रूप सम्मोहक है । मन को अनूठी शांति मिलती है .पहाड़ों की घाटी हो या शिखर या आकाश । यह बदलाव हमारे मन के भीतर नयी ऊर्जा और ताजगी देता है । नदी- नाले, गाड़-गधेरे सब पानी से भर गए हैं , अभी कुछ दिनों पहले की पानी की त्राहि -त्राहि मची थी .और आज तो लगता ही नहीं कि पांच दिन पहेले इतना भयानक सूखा पड़ा था ।
सुबह अल्मोड़ा जाने की तयारी की थी लेकिन बारिश को देखते हुए फिर कार्यक्रम बदल दिया ।
कमरे में बैठ कर पुराने कागज छांटे कमरे की सेटिंग बदली कुछ रुका हुआ काम किया और मौसम का पूरा आनंद लिया । इत्मीनान से बारिश में भीगा ।
बारिश को अभी भी चैन नहीं । लेकिन जमीन को अभी लगभग चार दिन-रात बारिश चाहिए ।
शुक्रवार, 2 जुलाई 2010
आदमी कितना असहाय है

दिन भर कई काम किये । कभी इधर तो कभी उधर । बारिश की इंतजार में बीता दिन । मौसम अपने समय से काम न करे तो एक भयंकर असंतुलन पैदा हो जाता है । लोग परेशान होने लगते हैं । ईश्वर पर से भरोसा उठ भी जाता है और ईश्वर पर भरोसा करने के आलावा कोई रास्ता भी नहीं दीखता । आदमी कितना असहाय है इस वैज्ञानिक युग में । आज जबकि विज्ञानं ईश्वर की हर रचना को चुनौती दे रहा है ।
टी वी पर बाजार में बिक रहे नकली मिलावटी सामान/फलों के बारे में देख रहा था । यह जहर पूरे समाज को कमजोर /बीमार कर देगा .हमें घरेलू जरुरत की चीजें सीधे किसानों से खरीदने चाहिए । या बाजार सेकच्चा माल खरीद कर घर में तैयार करनी चाहिए ,
गुरुवार, 1 जुलाई 2010
महंगाई
दूसरी सबसे बड़ी समस्या किसानों के लिए पानी की दिखाई दे रही है । जल स्तर कम होने से सिंचाई प्रभावित हो रही है ।सरकार के पास प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के अलावा प्राकृतिक संसाधनों के विकास की कोई नीति नहीं दिखाई दे रही है । पहाड़ों पर सड़कें तो बनाई जा रही हैं लेकिन सडकों के निर्माण में इन्जिनिरियंग का काम कोई बेहतर नहीं दिखाई दे रहा है । यहाँ की इंजीनियरिंग का कार्य अदूरदर्शी है । प्राकृतिक स्थितियों से इनका कोई विशेष लेनादेना नहीं दिखाई देता है । इन्हें पैसा और पहाड़ दिखाई देता है अन्धान्धुन्ध तरीके से पहाड़ खोदे जा रहे हैं ।
कैसी थी सुबह
यह भी याद नहीं कि सबह के साथ धूप आई या नहीं । खेतों में किसान भरे पड़े थे । सब आपाधापी में थे । देख रहा था कि औरते खेतों से कितना प्यार करती हैं ।
सुबह एक चक्कर गावं गया माई थान दिया जलाया
दिन कंप्यूटर पर बीता । सीधा -साधा नामालूम- सा
गावं में आम आदमी महंगाई के बोझ के नीचे खो -सा गया है । महंगाई के साथ ही उसकी मजदूरी को भी बढ़ाया जाना चाहिए । करोड़ पति मंत्री /नेताओं /उद्योगपतियों और नौकर शाहों के लिए चीजों का महंगा होना कोई मायने नहीं रखता है.लेकिन गरीब के लिए तो महंगाई होना कुँए में धकेले जाने के समान है
शुक्रवार, 25 जून 2010

शनिवार .पूरे हफ्ते के कामों के पुनरावलोकन का दिन । कोई विराम नहीं । काफी दिनों से अपनी कविताओं व आत्मकथा को सम्पादित व व्यस्थित करने की सोच रहा हूँ लेकिन इसके लिए समय प्रबंधन नहीं कर पा रहा हूँ । लगनों के सीजन के कारण समय नहीं निकाल पा रहाहूँ । पिछले महीने अपनी पुरानी सुमो बेचकर नयी स्पार्क कार लाया हूँ इससे थोड़ा व्यस्तता बढ़ गई है । और अव्यस्थित भी हो गया हूँ
मौसम में एक खुशनुमा परिवर्तन हुआ है । वारिश ने धरती के साथ-साथ लोगों के चहेरे के रंग भी बदल दिए हैं । खेतों में नयी रंगत लौट आयी है । और लोग खुश हैं कि अब कुछ होगा .खेतों में मेला लगा हुआ है । लगता है कि यह समय किसानों का ही है ।
शनिवार, 22 मई 2010
सोमवार, 12 अप्रैल 2010
आखिर कब तक ?
मौसम का यह मिजाज लोगों को विचलित कर रहा है । शहर और गावं दोनों चिंचित हैं .वह किसान हो या नौकरीपेशा चिंता हर कहीं है । करोड़ों रुपये खर्च करके भी आप कुदरत के रस्ते नहीं रोक सकते .क्योंकि आपने ही करोड़ों खर्च करके कुदरत के साथ खिलवाड़ किया है । कुदरत नदी या हवा के प्रदुषण के लिए जिम्मेदार नहीं है । कुदरत जंगलों के सफाए के लिए भी जिम्मेदार नहीं है । यह सब अपने आप नहीं हो रहा है । यह किया जा रह़ा है ।
दर असल जबतक ये जिम्मेदारियां तय नहीं हो जाती तब तक सुधार की कोई भी कोशिश सफल नहीं होगी और हालात बदतर होते जायंगे । हवा और पानी के लिए घर -घर लड़ेंगे गली -मोहल्ले लड़ेंगे , गावं-गावं लड़ेंगे ,शहर -शहर लड़ेंगे ,देश- देश लड़ेंगे । लेकिन सुधार की तरफ कोई नहीं सोचेगा ।हर किसी के अपने स्वार्थ हैं . पूंजीपतियों के अपने स्वार्थ हैं .फैक्ट्रियों और नेताओं के अपने स्वार्थ हैं . आज पानी बोतलों में बिक रहा है कल हवा बिकेगी फिर धूप बिकेगी । ये स्थिति आने वाली है । वर्तमान हालात को देखते हुए यह स्थिति ज्यादा दूर नहीं दिखती । क्योंकि अपनी तरफ से कोई कुछ करता नहीं दिखाई नहीं दे रहा । सबकी नजर सरकारी वजट पर है । और वजट की बन्दर बाँट होती है । फिर सब कुछ वैसा का वैसा । हम सुधार की प्रक्रिया को अपने पूजा -पाठ या भोजन की तरह अनिवार्य क्यों नहीं बनाते ?
शनिवार, 3 अप्रैल 2010
कहानियां तरह-तरह की
प्रकृति में चारों ओर हमारे मित्र फैले हुए हैं । कमी है तो उनके साथ दोस्ताना संवाद की । यही चीजें हमारी कहानी के जीवंत और रोचक पात्र हो सकते हैं । इनके और हमारे बीच के संवाद दूसरों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते है । प्रकृति के साथ बात करती एक कहानी इस पूरी धरती को ख़ुशी दे सकती है । ख़ुशी किसी उपदेश में नहीं मिलती है किसी के कहने से नहीं मिलती । प्रकृति के साथ एक मधुर संवाद कुछ पल हमें अपने आप से संवाद की ओर ले जाता है जहां हमें किसी ख़ुशी की तलाश नहीं रह जाती । और बाहर निकलते ही हम फिर ख़ुशी तलाशते हैं ।अपने दिन में टुकड़ा-टुकड़ा घटनाएँ जोड़ कर एक कहानी बनाते हैं ।ख़ुशी की कहानी । दुःख की कहानी ।सच/झूठ और भी तमाम तरह की कहानियां ।
शनिवार, 27 मार्च 2010
मंगलवार, 23 मार्च 2010
अनुभव
सोचता हूँ कि जो निकल गया उसे छोड़ दूँ लेकिन फिर भी कुछ न कुछ यादों में सिमटा रहता है और उसे लिखे बगैर चैन नहीं ।
शनिवार, 13 फ़रवरी 2010
फिर मर गए तेंदुए
भतीजे राजेश जी की शादी में दिल्ली गया था । घर से मैं दिनु और इजा गए थे . शादी ठीक रही कई ऑरकुट मित्र भी मिले ,दामोदर ,कैलास आदि । परिवार और गावं के सभी लोगों से मुलाकात हुई । अच्छा लगा । कुछ समय के liye तो laga ही नहीं कि हम लोग दिल्ली में हैं ।
शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010
मीटिंग में काफी लोग आये थे । कई नए मित्र बने । कई नयी जानकारियां मिली । अनुभव बढ़ा ।
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
सार में सारस
साथ में समयांतर ले कर गया था । कुछ देखा । अखबार देखा कि मुंबई में शाहरुख़ खान के घर पर भाषाई तालिबानों का हमला हुआ । लानत है इन्हें । आखिर बाल ठाकरे और राज ठाकरे इस देश को क्या बनाना चाहते हैं ? यह तो बहुत ही घटिया और गटर लेबल की राजनीति हुई । इन दोनों की देश विरोधी हरकतों पर तत्काल पावंदी लगनी चाहिए । अगर इन्हें ढील दी गई तो यह कोढ़ कल पूरे देश में फैलेगा । तब सरकार के आगे बड़ी समस्या खड़ी हो जायगी .मुंबई और ऑस्ट्रेलिया की घटनाओं में फर्क क्या रहा ?
-सारा भारत एक है । इस विचार को ताकत मिलनी चाहिए ।
शनिवार, 30 जनवरी 2010
सुबह जल्दी उठकर रोज के काम निबटाये ठण्ड बहुत थी लेकिन तेज धूप भी । कल रानीखेत गया था एक मीटिंग थी । लौटते हुए शाम हो गई थी । पहाड़ों का बहुत खुबसूरत नजारा देखते हुए जाने का पूरा आनंद लिया । हर मोड़ पर खूबसूरती इंतज़ार करती लगती है । लेकिन हमें तो देखकर निकल जाना होता है । -खूबसूरती भी ,बदसूरती भी और रह जाते हैं रस्ते । जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण सुख इन रास्तों के पास ही होता है जो ये हमें देदेते हैं ।
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
ठण्ड में सारस
शुक्रवार, 22 जनवरी 2010
आज और कुछ नहीं
मंगलवार, 19 जनवरी 2010
हिंसा की पाठशाला
शनिवार, 16 जनवरी 2010
गुरुवार, 31 दिसंबर 2009
नए साल की शुभ कामनाएं .
रविवार, 27 दिसंबर 2009
मछलियाँ कहाँ गई ?
शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009
ठंडी सुबह की शुरुआत
गुरुवार, 24 दिसंबर 2009
पाले कि चादर
बुधवार, 23 दिसंबर 2009
हर पल एक नया रंग
मंगलवार, 22 दिसंबर 2009
यह समय
यह समय सबकुछ बचाने का है हमें धूप बचानी है । वर्षा बचानी है । पेड़ बचाने हैं। हवा बचानी है । और मानवीय संवेदना बचानी है तथा प्रकृति के साथ अपने रिश्ते बचाने हैं ।
सोमवार, 21 दिसंबर 2009
किसान और महंगाई
शनिवार, 5 दिसंबर 2009
अंधेरे का साथ
शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009
सोमवार, 23 नवंबर 2009
शनिवार, 24 अक्टूबर 2009
कलम मैं ताकत
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009
शिक्षा में गावं और गरीब
बुधवार, 14 अक्टूबर 2009
शनिवार, 10 अक्टूबर 2009
विश्व शान्ति का स्वरुप क्या है ? मानक क्या हैं ?
कल समाचार पढा कि बराक ओबामा को नोबेल पुरूस्कार मिला है । लगा कि नोबेल समिति ने इस पुरुस्कार की घोषणा जल्द बाजी में कर दी है । ओबामा महोदय की कार्य शैली को कम-से-कम तीन -चार साल देख लेना चाहिए था। पुरूस्कार की व ओबामा महोदय जी की भी महत्ता घटी है। इसे कम-से-कम गौरवशाली उपलब्धि तो नहीं कहा जा सकता है। नोबेल पुरूस्कार की गिरती साख को देखते हुए इस पुरुस्कार को या तो बंद कर देना चाहिए या इसी के समकक्ष एक नए पुरूस्कार का सर्जन कर एक नई समिति बनानी चाहिए जिसमें कि इस विश्व स्तर के पुरूस्कार को बांटने का विवेक हो । इस पुरूस्कार के साथ एक सबसे बड़ी समस्या है कि यह पुरूस्कार अंग्रेजी से बाहर नहीं जा पा रहा है जिससे यह नोबेल समिति यह साबित कराती है के अंग्रेजी के अलावा दुनिया के किसी भी साहित्य में किसी भी विज्ञान में या अन्य विषयों में कुछ भी श्रेष्ट नहीं है , और अंग्रेजों के अलावा कोई दूसरा व्यक्ति श्रेष्ट नहीं है । बराक ओबामा महोदय के विश्व शान्ति के प्रयास क्या हैं ?
बुधवार, 7 अक्टूबर 2009
बर्षा चक्र
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009
हमारे किसान
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009
जीवन की रिक्तता
बुधवार, 30 सितंबर 2009
याद नहीं स्वप्न
दिन में घरेलू काम से फुर्सत मिलाने के बाद आफिस में बैठकर संस्था का काम देखा ।कल के लिए कार्यक्रम की रूप रेखा तय की ।
मंगलवार, 29 सितंबर 2009
महिलाओं की दिनचर्या
सोमवार, 28 सितंबर 2009
धूप में शब्द
लेकिन शब्द नहीं मान रहे थे । वे निकल पड़े चरवाहों के साथ । शब्द धूप में तपना चाहते थे ,वे सारी गर्मी/सारा तेज सोख लेना चाहते थे अपने भीतर , शब्द मेरी आंखों को देना चाहते थे तेज
दिन में सोच रहा था कि आज शाम को काफी लिखूंगा लेकिन खाना खाते ही पलकें भारी लगाने लगी । और ज्यादा देर तक कंप्यूटर पर बैठना नहीं हो सकेगा ।
रविवार, 27 सितंबर 2009
लेकिन सुकून
गुरुवार, 24 सितंबर 2009
जादुई मिठास .
मैं और उप्रेती जी साथ ही रुके । रात देर तक संस्था के कार्यों के बारे मैं चर्चा करते रहे । लौट कर खाना खाकर कुछ देर पिताजी के साथ बैठा । बातचीत की । थकान महूसस हो रही थी .तो सोचा की जल्द ही डायरी लिख कर सो जाना चाहिए ।
सोमवार, 21 सितंबर 2009
प्रतिदिन एक समय
असोज के काम ने बहुत जोर पकड़ लिया है । लोग बाज़ार से बिल्कुल से गायब से हो गए हैं । लोग यानी खरीददार ।
रविवार, 20 सितंबर 2009
आंखों में रंग
खेत से लौटकर मैं सीधे अपने कम्प्यूटर कक्ष मैं आ गया । कुछ फाइलें चेक की । उमा मुझे कुछ घर के काम का निर्देश देकर फ़िर घास के लिए चली गई । मुझे उसके लौटने तक दिन के खाने की सारी तैयारी पूरी करके रखनी थी । खाना खा कर थोडी देर आराम करने के बाद वह फ़िर घास के लिए निकल गई . वह शाम तक बुरी तरह थक चुकी होती है । पहाड़ में औरतें बहुत मेहनत करती हैं । पूरे घर का बोझ उनके कन्धों पर टिका होता है । और ८०% आदमियों का भी । क्योंकि आदमी बाज़ार से शाम को दारु के नशे में धुत्त होकर घर पहुंचता है । दिनभर की थकी औरत को उसकी गालियाँ ,मार ,ताने और उसकी बुरी हालत को भी झेलना होता है ।
शनिवार, 19 सितंबर 2009
पहाड़ और परेशानी
तिमिलखाल की चढाई देख कर बहुत आश्चर्य हुआ कि यहाँ लोगों कोअपने घर तक पहुचने के लिए पहाड़ चदनेमें बहुत परेशानी होती होगी रोजमर्रा के सामान ले जाने में तो और भी दिक्कत का सामना करना पड़ता होगा आज के इस समय में तो जबकि हर घर तक को सड़क मार्ग से जोड़ा जा रहा है यह गावं वंचित कैसे रह गया .तथा इससे ऊपर के गावों में तो और भी अधिक बुरा हाल होगा, यहाँ की आबोहवा बहुत अच्छी है ।
गुरुवार, 17 सितंबर 2009
स्वप्न कथा
रचनात्मक कुछ भी नहीं । दिन के बेकार ही गुजर जाने का एहसास (बेकार गुजर जाना यानि सृजन किए बगैर गुजर जाना ) रात को होता है , तब दिन निकल चुका होता है । और हमारे पास एक रात होती है , स्वप्न देखने के लिए । वहाँ सृजन नहीं होता है - हो सकता है सृजन की प्रेरणा हो -स्वप्न अतीत भी है और भविष्य भी । स्वप्न अक्सर हमें रास्ते पर लाने की कोशिश करते हैं हमारा अंतर्मन हमारे भविष्य की गणना करता है बहुत दूर तक देखता है । आवश्यकता है तो स्वप्न को समझने के द्रष्टिकोण की ।
बुधवार, 16 सितंबर 2009
आस्था का केन्द्र
मंगलवार, 15 सितंबर 2009
धान उनकी रग-रग में
अभी खाना खा कर कुछ देर इजा -बौज्यू के साथ बैठ कर बात चीत की । उससे पहले मुन्नू,कुन्नु और दिप्पी ने दिमाग का भुजिया बना कर रख दिया था । बारिश के बंद होने के साथ ही खेती बाड़ी के काम ने जोर पकड़ लिया है । यह समय किसानों के लिए बहुत ही व्यस्तता का होता है । पूरी सार किसानों से भरी पड़ी है । कोई फसल काट रहा है तो कोई उन्हें ढेर लगा रहा है । तो कोई दूसरी फसलों को काट कर घर को ले जा रहा है । चाय- नाश्ता, खाना -पानी सब खेत में । ऊपर से मौसम का भी डर है इसलिए सारे काम फ़टाफ़ट निबटाने हैं ।
रविवार, 13 सितंबर 2009
प्रेम की भाषा का जवाब
शनिवार, 12 सितंबर 2009
यह सौंदर्य और स्वप्न
शुक्रवार, 11 सितंबर 2009
अभी इस अंधेरे में बहार बर्षा की पायल बज रही है -छम्म -छम्म! अँधेरा इतना सुहावना भी होता है ? मन करता है कि इस सुंदर अंधेरे में घुमने निकलूं और उड़ान भरूं मन के आकाश में ।
संध्या के कितने रुप ?
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महंगाई भले ही अरबपति मुख्यमंत्रियों /करोडपति मंत्रियों /उद्योगपतियों /नौकरशाहों /बड़े व्यापारियों के लिए कोई मायने नहीं रखती हो लेकिन बेरोज...
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आज बुरी तरह थक गया हूँ । या बुखार आने वाला है । लेकिन सोऊंगा तो ब्लॉग लिखकर ही । कल मैंने लिखा था कि किसान को आर्थिक सुरक्षा देनी होगी । तभी...
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सुबह का उगता सूरज दिन की कथा के शीर्षक की तरह है . इसलिए जरुरी है कि सुबह अच्छी हो . आशावादी हो दिन की कथा का शीर्षक . एक सुखद संगीत प...

