शनिवार, 5 दिसंबर 2009
अंधेरे का साथ
एक बार जी में आ रहा था कि कुछ देर मीठी धूप में सो लेना चाहिए । हरी धरती और नीले आकाश को देखता रहूँ । रोजमर्रा की सारी झंझटों को एक किनारे फैंक दूँ । न तो पत्नी की बाहें हों न प्रेमिका का ख़याल । लेकिन इन्हीं सारी झंझटों ने बुरी तरह घेर कर रखा है। और देखते -देखते धूप की तपिश कम हो गई । लगा की पत्नी एक गिलास चाय ले आती तो ठीक रहता । उमा ने दो बार चाय पिलाई भी । पत्नी और बच्चों से घिरा उन्हीं से बतियाते हुए दिन निकल गया , बच्चों के बीच भी लगा कि सारी परेशानियों से दूर हूँ । धूप के यूँ ही चले जाने का कोई मलाल नहीं हुआ । धूप गई तो कोई बात नहीं खूबसूरत पहाड़ तो साथ हैं । और जब अँधेरा इन्हें भी ढँक लेगा तो खूबसूरत अँधेरा तो साथ रहेगा ही ।अँधेरा- एक मौन , एक विराम । नई शुरुआत के लिए ।
शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009
आज फिर कई दिनों बाद ब्लॉग पर बैठा हूँ , सुबह सोचा था कि आज तीन ग्राम पंचायतों का भ्रमण करूंगा लेकिन एक तलाई और अफों में ही दिन ढलने लगा । दिन इतने छोटे हो गए हैं कि कब दिन निकला और कब ढल गया पता ही नहीं लगता । लौटते हुए सोच रहा था कि नदी में पानी का स्तर अभी से गिरना शुरू हो गया है जंगलों में पेड़ों की सघनता कम हो गई और सबसे महत्त्व का और ध्यान देने की बात है की जंगलों से छोटे जीव जंतु लगभग गायब हो गए हैं जिससे की बाघ और चीतों का पारंपरिक भोजन जंगलों में ख़त्म हो गया है जिस कारण बाघों और चीतों /तेंदुओं ने गावों पर हमला करना शुरू कर दिया है । अभी कुछ दिन पहले अखबार में पढ़ा था कि उत्तराखंड में गत वर्ष करीब १३ बाघ मारे जा चुके हैं । जो कि एक चिंता का विषय है । बाघों का इस तरह आक्रामक हो जाने का एक मुख्य कारण जंगलों उनके भोजन की कमी भी है ।
सोमवार, 23 नवंबर 2009
आज कई दिनों बाद अपने ब्लॉग पर बैठा हूँ । लिखने के लिए बहुत कुछ है शुरुआत हिन्दी विरोधी राज ठाकरे से करता हूँ । यह हिन्दुस्तान के विरोध की दस्तक भी हो सकती है । यानी राज ठाकरे के अलगाव वादी नीति की शुरुआत । भारतीय संसद को इस घटना को पूरी गंभीरता से लेते हुए सख्त कदम उठाना चाहिए . हिन्दी भाषियों को राज ठाकरे की इस घिनोनी हरकत का विरोध सड़क पर आकर करना चाहिए । कोई भी संभ्रांत भारतीय हिन्दी का विरोध नहीं कर सकता है ।आज राज ठाकरे ने हिन्दी का विरोध किया कल दक्षिण में कोई हिन्दी विरोधी पैदा होगा परसों उत्तर में कोई हिन्दी विरोधी पैदा होगा और सरकार ख़ामोशी से सब देखती रहेगी सरकार की यह उदासीनता उचित नहीं ।
शनिवार, 24 अक्टूबर 2009
कलम मैं ताकत
दिन में एक चक्कर गैरखेत गया हिमाच्छादित पहाडियों ने मन मोह लिया । आज लगभग छः माह बाद दो कवितायें लिखी । हो सकता है की अभी सोते सोते एक कविता और लिख डालूं । काफ़ी समय से लग रहा था की मैं कविताओं की दुनियां से रिटायर हो गया हूँ । वैसे भी हर गंभीर और मौलिक विधा लगभग रिटायर -सी होती जा रही है । कोई कह रहा है कि कविता मर रही कोई कह कर चला जा रहा है कि कहानी ,उपन्यास,या निबंध मर रहा है । दरअसल ये सब हारे/ ऊबे/चुके हुए लोग हैंजिनके पास नया कहने को कुछ नहीं है जो आम जन को उकेरता हो। उनका मानना है कि कलम बेअसर हो चुकी है। उन्हौंने लिखना बंद किया तो घोषणा कर डाली कि यह सब तो मर रहा है । जो अपनी दूकान बंद कर जुआ घर मैं बैठे हैं। या नशे मैं धुत्त हैं ।या समाज के बारे मैं सोचना बंद कर दिया है। उन्होंने लिखना बंद किया तो पढ़ना भी बंद किया । लेकिन सौभाग्य से यह सब फल-फूल रहा है। लोग लिख रहे हैं । और समाज की चेतना को झकझोर भी रहे हैं । उनकी कलम मैं ताकत है।
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009
शिक्षा में गावं और गरीब
इस बीच लगातार व्यस्तता के कारण ब्लॉग पर नहीं बैठ पाया । कई गावों मैं घूमा कई लोगों से मिला गावों और पहाड़ को बिल्कुल करीब से देखा । मन को बाँध लेने वाले पानी के बहते गधेरे नदियाँ और हरियाली । लेकिन उतनी ही चिंताजनक अशिक्षा और गरीबी । शिक्षा, विशेष कर उच्च शिक्षा में तो गावं के लिए कोई जगह नहीं है । प्रतिभाओं के लिए भी नहीं , यदि जगह है तो धनी शहरियों के लिए । माननीय कपिल सिब्बल जी की शिक्षा नीति में तो गरीब ,गावं के लिए तो कोई जगह नहीं दिखाई दे रही है । वहाँ एक वर्ग विशेष है जिसके लिए गावं और गरीब का गला घोंटा जा रहा है । एक व्यापक वर्ग को वेहतर उच्च शिक्षा से वंचित रहना होगा माननीय कपिल सिब्बल जी की शिक्षा नीति से समाज के एक बड़े वर्ग के युवाओं में अपने भविष्य के प्रति घोर निराशा उत्पन्न होगी । जो कि समाज के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं है ।
बुधवार, 14 अक्टूबर 2009
ठण्ड एकदम बढ़ गई । मौसम में यह परिवर्तन बहुत सुखद लगा । परसों मोहना गया था । मोबाइल से कुछ सांझ के चित्र खींचे लेकिन अफसोस कि ढलती सांझ को शब्दों में नहीं ढाल पाया । और मुस्कराती हुई साँझ पलटकर चली गई । और इसी के साथ प्रकृति का परिधान भी बदल गया । और इससे पहले कि अंधेरे का परदा कायनात को ढक ले मैं और उमा मासी को लौट आए ।
शनिवार, 10 अक्टूबर 2009
विश्व शान्ति का स्वरुप क्या है ? मानक क्या हैं ?
आजकल शाम होते-होते बुरी तरह थक जा रहा हूँ । न लिखने की फुर्सत न पढ़ने की । उमा का तो और भी बुरा हाल हो जाता है । सुबह ४ बजे से काम पर शुरू हो जाती है और रात बिस्तर पर जाने तक लगातार काम । इसी आपाधापी के चलते आजकल वह कमजोर भी हो गई है ।
कल समाचार पढा कि बराक ओबामा को नोबेल पुरूस्कार मिला है । लगा कि नोबेल समिति ने इस पुरुस्कार की घोषणा जल्द बाजी में कर दी है । ओबामा महोदय की कार्य शैली को कम-से-कम तीन -चार साल देख लेना चाहिए था। पुरूस्कार की व ओबामा महोदय जी की भी महत्ता घटी है। इसे कम-से-कम गौरवशाली उपलब्धि तो नहीं कहा जा सकता है। नोबेल पुरूस्कार की गिरती साख को देखते हुए इस पुरुस्कार को या तो बंद कर देना चाहिए या इसी के समकक्ष एक नए पुरूस्कार का सर्जन कर एक नई समिति बनानी चाहिए जिसमें कि इस विश्व स्तर के पुरूस्कार को बांटने का विवेक हो । इस पुरूस्कार के साथ एक सबसे बड़ी समस्या है कि यह पुरूस्कार अंग्रेजी से बाहर नहीं जा पा रहा है जिससे यह नोबेल समिति यह साबित कराती है के अंग्रेजी के अलावा दुनिया के किसी भी साहित्य में किसी भी विज्ञान में या अन्य विषयों में कुछ भी श्रेष्ट नहीं है , और अंग्रेजों के अलावा कोई दूसरा व्यक्ति श्रेष्ट नहीं है । बराक ओबामा महोदय के विश्व शान्ति के प्रयास क्या हैं ?
कल समाचार पढा कि बराक ओबामा को नोबेल पुरूस्कार मिला है । लगा कि नोबेल समिति ने इस पुरुस्कार की घोषणा जल्द बाजी में कर दी है । ओबामा महोदय की कार्य शैली को कम-से-कम तीन -चार साल देख लेना चाहिए था। पुरूस्कार की व ओबामा महोदय जी की भी महत्ता घटी है। इसे कम-से-कम गौरवशाली उपलब्धि तो नहीं कहा जा सकता है। नोबेल पुरूस्कार की गिरती साख को देखते हुए इस पुरुस्कार को या तो बंद कर देना चाहिए या इसी के समकक्ष एक नए पुरूस्कार का सर्जन कर एक नई समिति बनानी चाहिए जिसमें कि इस विश्व स्तर के पुरूस्कार को बांटने का विवेक हो । इस पुरूस्कार के साथ एक सबसे बड़ी समस्या है कि यह पुरूस्कार अंग्रेजी से बाहर नहीं जा पा रहा है जिससे यह नोबेल समिति यह साबित कराती है के अंग्रेजी के अलावा दुनिया के किसी भी साहित्य में किसी भी विज्ञान में या अन्य विषयों में कुछ भी श्रेष्ट नहीं है , और अंग्रेजों के अलावा कोई दूसरा व्यक्ति श्रेष्ट नहीं है । बराक ओबामा महोदय के विश्व शान्ति के प्रयास क्या हैं ?
बुधवार, 7 अक्टूबर 2009
बर्षा चक्र
आज बुरी तरह थक गया हूँ । या बुखार आने वाला है । लेकिन सोऊंगा तो ब्लॉग लिखकर ही । कल मैंने लिखा था कि किसान को आर्थिक सुरक्षा देनी होगी । तभी वह अपनी खेती को बढ़ाने या खेती पर अपनी निर्भरता को मजबूत करेगा । पहाडों में खेती पर तो किसान जिंदा नहीं रह सकता । यहाँ जहाँ पर खेती बर्षा पर निर्भर है वहां परम्परागत बुआई में या फसल चक्र में परिवर्तन के साथ -साथ समय चक्र में भी परिवर्तन की आवश्यकता है क्योंकि पिछले कुछ बर्षों से यह देखने में आ रहा है कि बारिश का समय एक-डेढ़ माह आगे खिसक गया है यानी जो बारिश जुलाई -अगस्त में होती थी वह बारिश सितम्बर अक्टूबर में होने लगी है। इससे फसल का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है । और हर साल सूखे की स्थिति उत्पन्न हो रही है । और किसानों में हर साल एक निराशा घर कर जाती है। मैंने कई जगह देखा है कि वहां किसान वारिश होने के बाद ही बोआई करते हैं और बर्षा चक्र के साथ चलने के कारण अच्छी फसल प्राप्त करते हैं ।
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009
हमारे किसान
आजकल गावों में भ्रमण कार्यक्रम में व्यस्त हूँ । कल और परसों बारिश की वजह से नहीं गया । किसान हाड़ तोड़ मेहनत करता है । उसपर यदि समय पर बारिश नहीं हुई तो किसान बहुत हताश हो जाता है । उसे अपने व बच्चों का भविष्य शून्य दिखाई देता है ग्रामीण व छोटे किसानों का भविष्य तो बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है । सारी मेहनत के बाद किसान बाज़ार की ओ़र ताके तो क्या होगा ? वह खेती छोड़ मेहनत मजदूरी की तरफ़ भागेगा । किस्सान के पलायन के साथ ही एक परम्परा का भी समाप्त होने का खतरा रहता है । हर किसान के भीतर एक पीढियों पुरानी परम्परा भी होती है । किसान के पलायन के साथ ही गावं और जमीन के भी प्रभावित होने की पूरी संभावना रहती है । इसलिए किसी भी प्रकार हो किसान को आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिए ।
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009
जीवन की रिक्तता
असोज का महीना क्या लगा कि घर के काम में उलझ कर रह गया हूँ -यह भी एक अनुभव है . दिन भर काम करने के साथ -साथ यह भी सोचना होता है कि आज ब्लॉग पर क्या लिखूं । हमारे जीवन में हर रोज कुछ न कुछ ऐसा घटित होता है कि हमें वह पल याद रहता है और हम कुछ दिन तक अपने मित्रों से उस बात का जिक्र करते हैं । वह एक सुखद या दुखद स्वप्न भी हो सकता है । या एक रिक्तता -जिसका जिक्र भी बहुत महत्व का होता है । कुछ लोग खालीपन से भागते हैं ,जबकि कुछ ऐसे भी हैं जो अपने जीवन के खाली स्थान को सुरक्षित रखना चाहते हैं । ताकि जिंदगी की भाग -दौड़ से उबने के बाद अपनी जिंदगी के खाली कमरे में आ कर कुछ पल आराम से बिताये जा सकें और इस रिक्तता से नई ऊर्जा प्राप्त की जा सके । यह रिक्तता आत्ममंथन की प्रेरणा देती है हमें चिंतन का अवसर मिलता है । और हम इत्मीनान से पीछे और आगे देख सकते हैं । अपने रास्ते तय कर सकते हैं । यह खालीपन फूलों की सुगंध से भरा होना चाहिए ।
बुधवार, 30 सितंबर 2009
याद नहीं स्वप्न
रात जो स्वप्न देखे वे पूरे याद नहीं रहे । आधे -अधूरे । जिनसे कोई संकेत नहीं पकडा जा सकता । आजकल मन्दिर का काम देख रहा हूँ तो सपने भी मन्दिर से ही सम्बंधित हो रहे हैं । लेकिनगावं मैं होने वाली भावी घटनाओं से उनका कुछ न कुछ संकेत तो है ही ।
दिन में घरेलू काम से फुर्सत मिलाने के बाद आफिस में बैठकर संस्था का काम देखा ।कल के लिए कार्यक्रम की रूप रेखा तय की ।
दिन में घरेलू काम से फुर्सत मिलाने के बाद आफिस में बैठकर संस्था का काम देखा ।कल के लिए कार्यक्रम की रूप रेखा तय की ।
मंगलवार, 29 सितंबर 2009
महिलाओं की दिनचर्या
नीद जल्दी खुल गई थी . लेकिनअंधरे की वजह से बाहर निकालने का मन नहीं कर रहा था । सुबह जाड़ा दस्तक देने लगा है । दिन गर्म और शाम फिर ठंडी । गावों में महिलाओं की दिनचर्या बहुत व्यस्त होने लगी है सुबह से ही उन्हें घास काटने का तनाव घेर लेता है फिर खाना बनाने की फिक्र दूसरी तरफ़ अनाज व अन्य फसलों को कूटने/मानने /सुखाने -सभालने की मारामारी ,तीसरी चिंता की यदि वारिश हो गई तो बर्ष भर के किए कराये पर पानी फ़िर जायगा -सारे काम आनन -फानन में करने हैं । तब माना जायगा की असोज बटोर लिया है । पहाड़ का दिन महिलाओं के लिए पहाड़ की चढाई जैसा कठिन होता है शाम होते-होते इतना थक चुकी होती हैं कि अपने लिए खाना बनाने की भी सामर्थ्य नहीं रहती । और अगर बच्चे छोटे हों ,उन्हें घर पर देखने वाला कोई न हो तो महिलाओं के साथ -साथ बच्चों की स्थिति भी बहुत दयनीय हो जाती है । रोजगार के लिए पलायन ने पहाड़ की महिलाओं /बूढों और बच्चों को एक भयानक अकेलापन दिया है । पहाडों का सौंदर्य जितना अद्वितीय है समस्यायें भी उतनी ही विकट हैं ।
सोमवार, 28 सितंबर 2009
धूप में शब्द
धूप कहना चाह रही थी कि मैं धूप हूँ । और तुम छांह ढूंढ़ लो ।
लेकिन शब्द नहीं मान रहे थे । वे निकल पड़े चरवाहों के साथ । शब्द धूप में तपना चाहते थे ,वे सारी गर्मी/सारा तेज सोख लेना चाहते थे अपने भीतर , शब्द मेरी आंखों को देना चाहते थे तेज
दिन में सोच रहा था कि आज शाम को काफी लिखूंगा लेकिन खाना खाते ही पलकें भारी लगाने लगी । और ज्यादा देर तक कंप्यूटर पर बैठना नहीं हो सकेगा ।
लेकिन शब्द नहीं मान रहे थे । वे निकल पड़े चरवाहों के साथ । शब्द धूप में तपना चाहते थे ,वे सारी गर्मी/सारा तेज सोख लेना चाहते थे अपने भीतर , शब्द मेरी आंखों को देना चाहते थे तेज
दिन में सोच रहा था कि आज शाम को काफी लिखूंगा लेकिन खाना खाते ही पलकें भारी लगाने लगी । और ज्यादा देर तक कंप्यूटर पर बैठना नहीं हो सकेगा ।
रविवार, 27 सितंबर 2009
लेकिन सुकून
कल लिखने का मन नहीं किया । थक गया था । गावं कैसे भी हों होते बहुत सुंदर हैं शांत और गंभीर । चारों ओर से प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य से घिरे । जिस गावं में भी जाना होता है उस गावं में ही लगता है कि यहीं घर बनाकर रहा जाय। आज तो लगभग गावं सड़क से जुड़ गए हैं लेकिन पुराने समय में लोगों ने अपना समय बहुत कठिनाई में गुजारा होगा । तब सड़कें नहीं थी पैदल मार्ग प्रचलन में थे । आज की तरह हर गावं के नजदीक बाज़ार नहीं थे । लोगों को रोजमर्रा की चीजें लेने बहुत दूर तक पैदल ही जाना होता था । लेकिन जरूरतें भी बहुत कम हुआ करती थी अनाज व शाक- सब्जी का उत्पादन घर पर ही प्रयाप्त हो जाता था पानी की कोई कमी नहीं थी वे लोग जो तमाम कठिनाइयोंऔर असाध्य रोगों के बावजूद जो बच गए वे बहुत ताक़तवर होते थे तथा शारीरिक श्रम बहुत किया करते थे । तथा खाने में दूध/दही/ छाछ /घी का प्रयोग किया करते थे क्योंकि पशु पालन तब मुख्य व्यसाय था । और हर घर में दूध, दही,घी की कोई कमी नहीं थी । । तब लोग घरेलू इलाज पर ज्यादा निर्भर होते थे । जबकि आज देखने में आ रहा है कि ऐलोपथी से ऊबे हुए लोग घरेलू /आयुर्वेदिक इलाज की ओ़र झुक रहे हैं । पहाडों में दूर दूर ऊँचाइयों में बसे गावों को देख कर पुराने ज़माने के लोगों की याद आई । आज सुविधाओं ने जीवन को बहुत आसान बना दिया है । हर चीज मनुष्य के वश में है । लेकिन सुकून नहीं ।
गुरुवार, 24 सितंबर 2009
जादुई मिठास .
कल अल्मोड़ा गया था ।साथ में -मां नंदा देवी सेवा समिति के अद्ध्यक्ष श्री किशानंद उप्रेती जी भी थे । संस्था के पंजीकरण का नवीनी करण करवाया, देर होगई तो रात वहीं होटल में रुके । शाम को एक चक्कर बाज़ार घूमने गए यहाँ पर लोग शाम के वक़्त बाज़ार मैं घूमना ज्यादा पसंद करते हैं शाम के वक़्त में बाज़ार में अच्छी रौनक रहती है । लोग तरह-तरह की चीजों की खरीददारी ,घूमने,मिलने -मिलाने आते हैं ।लोगों की वाणी में एक तरह का जादुई मिठास है । शहर -एक बौद्धिक शहर भी है और खूबसूरत भी । सबसे खास बात यह है की शहर अपने भीतर गावं की संस्कृति को भी जीवित रखे हुए है ।
मैं और उप्रेती जी साथ ही रुके । रात देर तक संस्था के कार्यों के बारे मैं चर्चा करते रहे । लौट कर खाना खाकर कुछ देर पिताजी के साथ बैठा । बातचीत की । थकान महूसस हो रही थी .तो सोचा की जल्द ही डायरी लिख कर सो जाना चाहिए ।
मैं और उप्रेती जी साथ ही रुके । रात देर तक संस्था के कार्यों के बारे मैं चर्चा करते रहे । लौट कर खाना खाकर कुछ देर पिताजी के साथ बैठा । बातचीत की । थकान महूसस हो रही थी .तो सोचा की जल्द ही डायरी लिख कर सो जाना चाहिए ।
सोमवार, 21 सितंबर 2009
प्रतिदिन एक समय
दिन में अपने अन्य कार्यों के साथ सोच रहा था की आज अपने ब्लॉग पर क्या लिखूंगा और अब नींद के मारे बुरा हाल है मन कर रहा है कि छोड़ो भी अब क्या लिखना है । अधिकांश समय इसी कमरे में कम्प्यूटर पर बीता । कभी कुछ --कभी कुछ करता रहा ।उब गया तो रसोई में जाकर चाय बनाकर चाय पी ,फिर खेत में जाकर कुछ काम किया . बच्चों के साथ बैठा ,लौटकर फ़िर कमरे में आया कुछ पुरानी फाइलें देखी । कुछ किताबें तरतीबवार लगाई और अपनी डायरी के पुराने पन्ने पढ़े । कम से कम पाँच सौ पन्ने होंगे जिन्हें सम्पादित करना है । और कम से कम चार सौ कवितायें होंगी जिन्हें संपादित कर प्रकाशन के लिए तैयार करना है । अब इन्हीं कार्यों को प्रथिमकता की सूची में रखना होगा , प्रतिदिन का एक समय इस काम के लिए निर्धारित कर दूंगा ।
असोज के काम ने बहुत जोर पकड़ लिया है । लोग बाज़ार से बिल्कुल से गायब से हो गए हैं । लोग यानी खरीददार ।
असोज के काम ने बहुत जोर पकड़ लिया है । लोग बाज़ार से बिल्कुल से गायब से हो गए हैं । लोग यानी खरीददार ।
रविवार, 20 सितंबर 2009
आंखों में रंग
कोई और काम नहीं था सिवाय घर देखने के । सुबह उमा के साथ धान मानंने खेत में गया ,खेतों में काम करना मेरे लिए काफी आनंददायी काम है । खेतों में मैं प्रकृति के करीब होता हूँ पौंधों और मिट्टी से बातें कर सकता हूँ । हवा को सुन सकता हूँ । अपनी आंखों मैं भर सकता हूँ रंग पूरी प्रकृति के । रच सकता हूँ कोई तस्वीर मन के भीतर ।
खेत से लौटकर मैं सीधे अपने कम्प्यूटर कक्ष मैं आ गया । कुछ फाइलें चेक की । उमा मुझे कुछ घर के काम का निर्देश देकर फ़िर घास के लिए चली गई । मुझे उसके लौटने तक दिन के खाने की सारी तैयारी पूरी करके रखनी थी । खाना खा कर थोडी देर आराम करने के बाद वह फ़िर घास के लिए निकल गई . वह शाम तक बुरी तरह थक चुकी होती है । पहाड़ में औरतें बहुत मेहनत करती हैं । पूरे घर का बोझ उनके कन्धों पर टिका होता है । और ८०% आदमियों का भी । क्योंकि आदमी बाज़ार से शाम को दारु के नशे में धुत्त होकर घर पहुंचता है । दिनभर की थकी औरत को उसकी गालियाँ ,मार ,ताने और उसकी बुरी हालत को भी झेलना होता है ।
खेत से लौटकर मैं सीधे अपने कम्प्यूटर कक्ष मैं आ गया । कुछ फाइलें चेक की । उमा मुझे कुछ घर के काम का निर्देश देकर फ़िर घास के लिए चली गई । मुझे उसके लौटने तक दिन के खाने की सारी तैयारी पूरी करके रखनी थी । खाना खा कर थोडी देर आराम करने के बाद वह फ़िर घास के लिए निकल गई . वह शाम तक बुरी तरह थक चुकी होती है । पहाड़ में औरतें बहुत मेहनत करती हैं । पूरे घर का बोझ उनके कन्धों पर टिका होता है । और ८०% आदमियों का भी । क्योंकि आदमी बाज़ार से शाम को दारु के नशे में धुत्त होकर घर पहुंचता है । दिनभर की थकी औरत को उसकी गालियाँ ,मार ,ताने और उसकी बुरी हालत को भी झेलना होता है ।
शनिवार, 19 सितंबर 2009
पहाड़ और परेशानी
आज दिन बहुत थका देने वाला था । पहले गावं गया । वहां माईथान और धूणी मन्दिर मैं धूप बत्ती की । फिर वहाँ से लौटकर तिमिलखाल में आयोजित शहीद मोहन चंद्र शर्मा जी के पुण्य तिथि के दिन आयोजित श्रद्धांजलि समारोह में श्रद्धा सुमन अर्पित करने गया । लौटकर फलाहार लिया । पहली नवरात्रि का व्रत लिया था ।
तिमिलखाल की चढाई देख कर बहुत आश्चर्य हुआ कि यहाँ लोगों कोअपने घर तक पहुचने के लिए पहाड़ चदनेमें बहुत परेशानी होती होगी रोजमर्रा के सामान ले जाने में तो और भी दिक्कत का सामना करना पड़ता होगा आज के इस समय में तो जबकि हर घर तक को सड़क मार्ग से जोड़ा जा रहा है यह गावं वंचित कैसे रह गया .तथा इससे ऊपर के गावों में तो और भी अधिक बुरा हाल होगा, यहाँ की आबोहवा बहुत अच्छी है ।
तिमिलखाल की चढाई देख कर बहुत आश्चर्य हुआ कि यहाँ लोगों कोअपने घर तक पहुचने के लिए पहाड़ चदनेमें बहुत परेशानी होती होगी रोजमर्रा के सामान ले जाने में तो और भी दिक्कत का सामना करना पड़ता होगा आज के इस समय में तो जबकि हर घर तक को सड़क मार्ग से जोड़ा जा रहा है यह गावं वंचित कैसे रह गया .तथा इससे ऊपर के गावों में तो और भी अधिक बुरा हाल होगा, यहाँ की आबोहवा बहुत अच्छी है ।
गुरुवार, 17 सितंबर 2009
स्वप्न कथा
सुबह उमा ने ४ बजे उठा दिया, खेती के दिन हैं वह अपने दिन के काम की तैयारियों में लग गई ।और मैं अपने रोज के काम में । दिन कंप्यूटर पर बीता, कुछ देर खेत में काम किया । शाम को बाज़ार की तरफ़ निकला दोस्तों से गप्पें मारने । बंधू जी से गप्पें मारी लेकिन वहाँ मौलिक /सामाजिक बातें होती हैं सुरेश देव्तल्ला प्रधान , महेश वर्मा , भगवत सिंह रावत ,राजेंद्र बिष्ट ,चंदू भाई, से होता हुआ मिन्टो दीदी जी के घर ।
रचनात्मक कुछ भी नहीं । दिन के बेकार ही गुजर जाने का एहसास (बेकार गुजर जाना यानि सृजन किए बगैर गुजर जाना ) रात को होता है , तब दिन निकल चुका होता है । और हमारे पास एक रात होती है , स्वप्न देखने के लिए । वहाँ सृजन नहीं होता है - हो सकता है सृजन की प्रेरणा हो -स्वप्न अतीत भी है और भविष्य भी । स्वप्न अक्सर हमें रास्ते पर लाने की कोशिश करते हैं हमारा अंतर्मन हमारे भविष्य की गणना करता है बहुत दूर तक देखता है । आवश्यकता है तो स्वप्न को समझने के द्रष्टिकोण की ।
रचनात्मक कुछ भी नहीं । दिन के बेकार ही गुजर जाने का एहसास (बेकार गुजर जाना यानि सृजन किए बगैर गुजर जाना ) रात को होता है , तब दिन निकल चुका होता है । और हमारे पास एक रात होती है , स्वप्न देखने के लिए । वहाँ सृजन नहीं होता है - हो सकता है सृजन की प्रेरणा हो -स्वप्न अतीत भी है और भविष्य भी । स्वप्न अक्सर हमें रास्ते पर लाने की कोशिश करते हैं हमारा अंतर्मन हमारे भविष्य की गणना करता है बहुत दूर तक देखता है । आवश्यकता है तो स्वप्न को समझने के द्रष्टिकोण की ।
बुधवार, 16 सितंबर 2009
आस्था का केन्द्र
दिन में मैं और उमा गावं गए । मन्दिर निर्माण का कार्य देखा इशवरी दत्त ,बाला दत्त ,दामोदर ,प्रकाश चन्द्र , मोहन चन्द्र काम कर रहे थे । उमा घास काटने चली गई और मैं मन्दिर में रहा । सभी लोगों की आस्था का केन्द्र , यहाँ आकर सभी सर झुकाते हैं अपनी समस्याओं के समाधान चाहते हैं . अपनी गलतियों को स्वीकार करते हैं दिमाग मैं एक नई ताजगी और आत्मविश्वाश लेकर घर लौटते हैं . कुछ देर बाद मैं भी खेत में चला गया ,दिमाग को एक अद्भुत शान्ति मिलती है इन खेतों के बीच ।मुझे तो इन खेतों के बीच बहुत आनंद आता है लेकिन देख रहा हूँ कि उमा के पास काम की अधिकता हो गई है शाम होते -होते वह बुरी तरह थक चुकी होती है । जबकि अभी असोज का पूरा महीना शेष है । फसल भी कटनी है और घास भी काटनी है । इसे व्यस्थित करना होगा । सुबह एक आसमानी रंग की खुबसूरत चिड़िया घर के आगे के पेड़ पर बैठ गई यह आगंतुक चिड़िया थी । कुछ देर पेड़ की शाख बैठकर पर उसने गाना गया ।
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सुबह का उगता सूरज दिन की कथा के शीर्षक की तरह है . इसलिए जरुरी है कि सुबह अच्छी हो . आशावादी हो दिन की कथा का शीर्षक . एक सुखद संगीत प...