समूचे विश्व में युद्धों में मारे गए निर्दोष नागरिकों, सैनिकों, बच्चों , पशुओं, वृक्षों कीट पतंगों , व प्रकृति की हर संरचना के विध्वंश पर उन्हें श्रद्धांजलि।
क्रूर, अत्याचारी , सत्ता लोलुप तानाशाहों को धिक्कार।
विश्व में युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहे। रूस - यूक्रेन/नाटो , हमास - इज़राइल , हिज़्बुल्ला - इज़राईल, ईरान -इज़राईल के सर्वनाशी युद्धों के साथ -साथ एक छोटी - सी झलक भारत और पाकिस्तान की भी देखने को मिली इसके साथ ही कम्बोडिया थाईलैंड और भी कई देश युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं. हर ओर भयंकर विनाश का तांडव देखने को मिल रहा है। शांति के लिए बोलने वालों की आवाज हवा में घुल कर लुप्त हो जा रही है. विनाशक हथियारों , परमाणु अस्त्रों के दम्भ में कोई देश किसी की सुनाने को तैयार नहीं है. राष्ट्रों को युद्धों की आग में झोंकने वाले तानाशाह, आतंकवाद के पोषक राष्ट्रों के क्रूर और निर्मम शासक अज्ञात जगहों पर अपने बंकरों में छुपे मौज कर सिर्फ बमबारी के आदेश दे रहे हैं. मरने वालों का कोई आंकड़ा नहीं है। भूख ,विस्थापन ,भय यह सब आम नागरिकों के लिए दैनिक जीवन का एक हिस्सा बन चुका है. निर्दोष जनता और निर्दोष सैनिकों को विनाशक हथियारों की आग में झोंका जा रहा है. और यह सब तानाशाहों के सत्ता की हवस के सिवाय कुछ नहीं है.
विश्व के सभी जागरूक नागरिक प्रकृति, समस्त प्राणी ,पर्यावरण एवं मानवता के पक्ष में युद्धों के विरुद्ध अपनी आवाज तेज करें। युद्धों का विरोध करें।
ऋतु एक सुहावनी करवट ले रही है। बरसात के बाद आसमान बिल्कुल प्रदुषण रहित ,साफ़- स्वच्छ होने के कारण सूर्य की किरणें गर्म लोहे की छड़ की तरह तेज और बदन को जला देने वाली पड़ रही हैं. दिन छोटे होने लगे हैं.
उत्तराखंड के पहाड़ों के गावों में खेती का काम आरम्भ हो गया है। यानि आश्विन मास लग गया है। ग्रामीण आजकल इतने व्यस्त हैं. कि बुखार और छोटी- मोटी बीमारियों की चिकित्सा आदि के लिए चिकित्सक के पास जाने का भी समय नहीं, वो तो खेत से घर और घर से खेत आने जाने में ही ठीक हो जाता है। खाने के लिए घर आने का भी समय नहीं होता है घर का एक सदस्य खाना बनाकर उनके लिए खेतों में ले जाता है। या सुबह घर से खाना बनाकर अपने साथ ले जाते हैं। किसान होना कोई आसान काम नहीं है. हमें मात्र तैयार उपज दिखती है।
कुछ ही समय पश्चात् बाजार में नई फसल की गहत, उड़द , मडुवा , झंगोरा, बाजरा, तिल, चौलाई, धान आदि आने लगेगा । फसल के साथ -साथ पूरे वर्ष भर के लिए पशुओं के लिए घास भी जमा करनी होती है। और अगली बुआई के लिए खेत भी तैयार करने होते हैं।
रोजगार के अभाव में पहाड़ों से पलायन के कारण कृषि और पशु पालन भी प्रभावित हुआ है। बच्चे न होने के कारण कई गावों में स्कूल बंद होने की स्थिति में हैं. कई गावों में पहाड़ी शैली में बने आलीशान नक्काशीदार घर खंडहर हो चुके हैं। आधे से अधिक खेत बंजर हो चुके हैं।
जो एक बार यहाँ से रोजगार के लिए पलायन कर गया वह फिर लौट कर गावं देखना भी नहीं चाहता ,या रोजगार की आपाधापी में उसे गावं के बारे में सोचने का भी समय नहीं मिल पता हो।
प्रणाम मित्रो ,
हमारे उत्तराखंड ( भारत ) में जंगलों में लगने वाली आग से वातावरण धुआं - धुआं हो रहा है। बाहर प्रचंड गर्मी है। यदि वनाग्नि नहीं लगी होती तो इतनी गर्मी नहीं पड़ती। हर वर्ष लगाने वाली इस आग ने न मालूम कितनी महत्वपूर्ण जड़ी बूटियों का वंश समाप्त हो जाता है। धरती हर वर्ष पेड़/ वनस्पतियां उगाकर धरती को हरा भरा बनाने की कोशिश करती है।
हर बरसात में वृक्षारोपण होता है और हर मई - जून में सब स्वाहा हो जाता है।
इस्राईल - हमास- ईरान , यूक्रेन - रूस , पिछले एक साल से भी अधिक समय से चल रहे हैं. धरती फाड़ी जा रही है. निर्दोष प्राणी मरे जा रहे हैं. हिंसा और विनाश का यह खेल बंद होने का नाम नहीं ले रहा है. सारे घातक और विनाशक हथियारों का प्रयोग /प्रदर्शन हो रहा है,
युद्धों की इस सनक / पागलपन में जीवन का कोई मूल्य नहीं,
यूनाइटेड नेशंस की भूमिका अभी स्पष्ट नहीं दिख रही है कि युद्ध बनाये रखना चाहता है या रोकना। युद्ध लड़ाने वालों की और है या पीड़ितों की और।
नाटो देश अपने हथियार खपाने में लगे हैं।
यह मानवीय हितों के प्रति विश्व समुदाय का स्तब्ध कर देने वाला व्यवहार है।
अँधेरे को भी अस्त होना होता है। बिलकुल दिन की मानिंद। उसकी अवधि और महत्त्व दोनों हैं। महाभारत कालीन युद्धों में भी रात को युद्ध विराम होता था। आज तो भयंकर विनाशकारी युद्ध , बमबारी रात को ही हो रही हैं,
रात एक विराम का नाम भी है जो आपके दुखों, तनावों, द्वंद्वों को अपनी ममता की छाँव देती है। सबकुछ भूलकर सो जाने को कहती है। आपकी पीड़ाएँ रात बाँट लेती है. एक सुखद सुबह के आगमन का आश्वासन देती है।
इसलिए दिनभर की थकान , ऊब निराशा, को ऊर्जावान दूसरे दिन में बदलने , जीवन में एक नए प्रकाश आगमन के लिए रात का स्वागत करें.
शांति के लिए रात का भी एक उत्सव की तरह स्वागत करें।
आपका जीवन सुखमय और लम्बा होगा।
दिन को भूल जाएँ क्योँकि वह लौटकर आनेवाला नहीं है। हाँ दिन की भूलें जरूर याद रखें। रात के अँधेरे को उन भूलों को भी मिटाने का अवसर दें। दिनभर के सारे द्वन्द्व रात को सौंप दें।
भोर एक नए समाधान के साथ जरूर आएगी।
स्वप्न देखें . अचेतन भी संकेत देता है.
भारी बमबारी के बीच सांता इस्राइल- ग़ज़ा पहुंचा या नहीं, यूक्रेन- रसिया पहुंचा या नहीं। क्योँकि वहां सांता के जाने का समाचार नहीं देखा। कोई शांति लिए नोबल पुरस्कार विजेता बम बर्षकों के नीचे खड़े होकर चिल्लाया नहीं कि बंद करो ये विनाश। ऐसा भी कोई समाचार नहीं देखा। किसी को कंधे में क्रॉस रख कर वहां शांति की अपील करते नहीं देखा. वहां किसी इस्लामिक पैगम्बर के अनुयायी को शांति के लिए मार्च निकालते नहीं देखा। सारे चर्च और मस्जिदें मौन क्योँ हैं.
एक विचित्र द्विविधा में दिखते हैं दोनों। आतंक का साथ दें या युद्ध का।
युद्धों के बीच मात्र तानाशाहों की क्रूरता , आतंक , भय ,मृत्यु और विनाश को अपनी भाषा बोलते देख रहा हूँ।
यहाँ पर आकर दिखाई देता है कि नोबल पुरस्कार किस को और क्योँ दे दिऐ जाते हैं।
आतंक और युद्ध किसकी भाषा है और शांति का नोबल किस प्रकार के लोगों की भाषा बोलने वालों को दिया जाता है.
सुबह - सुबह पक्षियोँ के कलरव से नींद खुली। चाय पीकर बाहर निकला तो देखा कि खेतों ने घने कुहरे की चादर ओढ़ी है और ठण्ड हरियाली के पहरे में खड़ी है। बाहर निकलने का साहस नहीं हो रहा था लेकिन समय के साथ चलने के लिए कमरे से बाहर निकला।
धूप के निकलने के साथ ही कुहरा हवा में घुलने लगा और ठण्ड भी किरणों के रथ में बैठकर चली गई। हरियाली निश्चिंत होकर अपनी आभा बिखेरने लगी घाटी के दोनों और की पहाड़ियां आकर खड़ी हो गई।
शीत ऋतु में हर वर्ष कई प्रकार के नए - नए अतिथि पक्षी घर के आस पास आकर चहकने लगते हैं या कहूँ कि मिलने आते हैं.
उनका आना अच्छा लगता है। मेरे मित्रों में वे भी प्रिय मित्र हैं.
या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ,
जिस धर्म के ग्रंथों ऐसा नारी को शक्ति स्वरूपा माना गया हो। पत्नी के रूप में अर्धांगिनी माना गया हो। जिसके बिना हिन्दू धार्मिकों के पूजा आदि कोई भी कार्य अपूर्ण माने जाते हैं. संसार जिसे जननी के रूप में मानता है , जिसे बैभव की देवी लक्ष्मी माना गया हो। जिसे विद्या की देवी सरस्वती माना गया हो, जिसे असुरों के विनाश की देवी महाकाली माना गया हो उस देश में नारी के लिए अबला शब्द कहाँ से आगया?
कल अष्टमी के श्राद्ध के साथ ही पिताजी को हमसे बिछड़े हुए एक वर्ष हो गया है।
इन बारह महीनों मैं पिता जी ममत्व की छत्र छाया में व्यतीत अपने बचपन से लेकर उनके हमारे बीच उनके अंतिम दिन तक की यात्रा तक की पुस्तक को पुनः खोल कर देखा। हर घटना से पुनः गुजरा।
आज भी घर के हर कोने में उन्हें ढूंढता हूँ। कभी लगता है वे दुकान में ग्राहकों से बातें कर रहे हैं। उनकी आवाज कानों में गूंजती है। लेकिन वे कहीं दिखाई नहीं देते हैं।
निशा शान्त अवश्य होती है पर मौन नहीं। तिमिर की कालिमा में दिनभर के सारे प्रश्न जाग उठते हैं.
उनके प्रश्न जिनकी आवाज दिन को सुनाई नहीं देती है। दिन के प्रकाश की चकाचौंध में जिनकी आवाज दब जाती है अन्याय और शोषण के कोलाहल से भयभीत जो अपनी बात नहीं कह पाते रात्रि उनके क्रंदन से सो नहीं पाती। उनके साथ बैठ कर उनकी बातें सुनती है शोषण और अन्याय की झकझोर देने वाली कहानियां उसकी चिन्ता बन जाती है।
रात्रि के आकाश में न्याय के लिए पुकारने की गूंजती आवाजों पर न्याय उसका उत्तरदायित्व होता है।
शांत हृदय से कभी रात्रि में बाहर बैठ कर अँधेरे की सुंदरता का आनंद लें।
जंगलों से आती उन सभी की मधुर आवाजों को सुनें जो दिन में नहीं बोल पाते। या दिन के कोलाहल में उनकी आवाज हम तक नहीं पहुँच पाती है उनका बोलना एक सम्मोहक संगीत है जो सर्वत्र गूंजता रहता है। रात्रि हमेशा सोने के लिए ही नहीं होती है। अँधेरे का रास्ता भोर के दिव्य प्रकाश के साथ दिन के उजाले की ओर जाता है। किसी पहाड़ी के शिखर पर बैठकर कभी शांत मन से अँधेरे के साथ इस राह के यात्री बने।
श्रावण मास की सुहावनी ऋतु चल रही है। अभी दो मास पहले गर्मी और वनाग्नि की घुटन से प्राणी मात्र त्रस्त थे।
वनाग्नि हर वर्ष की घटना होती जा रही है। हर वर्ष जंगलों का जलना भी हमारे जीवन के एक आवश्यक घटना क्रम की तरह बन चुका है। हर वर्ष महत्वपूर्ण जड़ीबूटियां, जंगल के छोटे छोटे पक्षी , चीटियां, कीट पतंगे स्वच्छ हवा,जंगलों की मिटटी की नमी, शीतलता सब वनाग्नि की भेंट चढ़ जाते हैं.
हम कुछ नहीं कर पाते हैं. सिर्फ दूर दूर तक जलते जंगलों को जलते देखते रहते हैं.
इस बार की बरसात भी भीषण विनाशकारी रूप में आई और यहाँ भी हम प्रकृति के इस रौद्र रूप को मात्र देखते रहे।
लेकिन यदि परमाणु यद्ध हुआ तो हम उस विनाश को भी देखते रहेंगे। यदि ये परमाणु युद्ध हमारे आसपास नहीं हुआ तो। परमाणु युद्ध का रौद्र रूप के समक्ष तो प्राकृतिक विनाश कुछ भी नहीं है.
आईये दुनियां के परमाणु संपन्न तानाशाहों से पूछें कि वे परमाणु युद्धों के बाद विश्व को कैसा देखना चाहते हैं.
नमस्कार
विश्व को अहिंसा की आवश्यकता है इसी में मानवीय हित सुरक्षित हैं. मानवाधिकारों की रक्षा के लिए वैश्विक अभियान चलाएं।
महाशक्तियां आज अपने घातक, संहारक व्यापक विनाशकारी हथियारों का प्रयोग कर उनकी संहारक क्षमता को प्रदर्शित करने को उतावली हैं ऐसी स्थिति में भारत को ही शांति की पहल करने आगे आना होगा अन्यथा हिंसा का जो तांडव ये महाशक्तियां करने को उतावली हैं वह अब तक की महा हिंसा होगी। जिसमें दुनियां के मैदान शवों के लिए छोटे पड़ जायेंगे। न कोई शवों को उठाने वाला होगा न कोई अपनों के लिए रोने वाला बचेगा। सेनाओं के पास मात्र एक ही लक्ष्य होगा मारो और मारो जब तक अंतिम व्यक्ति जीवित है तब तक लड़ो। संवेदनाएं ख़त्म हो जाएँगी।
आइये युद्धों को रोकने के लिए पहल करें। विश्व शांति की कामना करें। बर्बर सत्ताधीशों विरुद्ध दुनियां के शांतिप्रिय देश एकजुट हों. प्राणी मात्र को बचाने के लिए युद्धों का विरोध करें।
संहारक अस्त्र शस्त्रों को नष्ट करने के लिए वैश्विक सहिंता बनाएं ।
संध्या के कितने रुप ?