सोमवार, 16 मार्च 2026

 

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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026




आज आदिबद्री मंदिर में भगवान श्री विष्णु , शिव आदि देवों  के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ।  मंदिरों की नक्काशियां आश्चर्य जनक हैं. अद्भुत कला. 










 

बुधवार, 28 जनवरी 2026

कल रातभर वर्षा होती रही।   इस वर्षा ने प्राकृतिक सौंदर्य में नए  प्राण डाल दिए हैं. बसंत पंचमी के आगमन के साथ ही वातावरण में एक नयापन आ गया है।पहाड़, पेड़ - पौंधे सब वर्षाजल से नहा धोकर नई चमक के साथ बसंत के स्वागत के लिए तैयार हैं. धरती एक नया उत्सव मना रही है।   जंगली फूल खिलने शुरू हो गए हैं। पतझड़ के बाद वृक्षों में नई  कोपलें आने लगी हैं।  ठण्ड ने अपनी शीतलता की प्रकृति में बदलाव कर दिया है. वर्षा के बाद धूप  ने पहाड़ों को मन  मोहक  रंग बांटने शुरू कर दिए है.    

ऊँची पहाड़ियों में बर्फ गिरनी  शुरू हो गई है। हवा में बर्फ  की ठंडक और  सुई की नोक की तरह चुभन है। वैसे  वर्षा के बाद की ठण्ड हानिकारक नहीं होती है. लेकिन सावधानी तो बरतनी ही होती है. 


गुरुवार, 1 जनवरी 2026

 नमस्कार मित्रो ,

नव वर्ष की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। 

जनवरी की ठिठुरन आरम्भ हो गई है। पतझड़ वाले वृक्षों ने पत्ते छोड़ दिए हैं।  यहाँ भी अद्भुत सौंदर्य है।  शाखों से गिरे पत्तों को सब अपने सुखों या दुखों के अनुसार देखते हैं।  पत्तों के संगीत को सब अपने अनुसार सुनते हैं।  उनके रंग  सबको अलग अलग दिखते हैं।  हवा के साथ उनकी अठखेलियों को सब अपने अपने अनुसार देखते हैं पत्तों से रहित वृक्षों शाखाओं  की स्थिति का वर्णन  भी सभी अपने अनुसार करते हैं।  जैसी मनःस्थिति वैसी दृष्टि और वैसा ही  वर्णन।  

पतझड़ एक अनूठा अनुभव है।  और दर्शन भी।  पतझड़ का होना बताता है कि  नई कोपलें आने वाली हैं ,नए पत्ते आने वाले हैं. नए फूलों का मौसम आने वाला है।  नए फल आने वाले हैं।  

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

 भयंकर  और  विनाशकारी युद्ध  अब एक सामान्य समाचार है। युद्ध लड़ने वाले भी नित्य की भांति रोटी खा रहे हैं और युद्ध के शिकार भी रोटी खाकर सो रहे हैं।  दोनों पक्ष एक दूसरे पर घात प्रतिघात कर रहे हैं।  सारे  उन्नत, आधुनिक , तकनीकी हथियार  युद्धों  को रोमांचक बना रहे हैं।  

समूचे विश्व में मानवाधिकार संगठनों के सारे विरोध प्रदर्शन अब मौन हैं. युद्ध के पक्ष में हैं या भयभीत हैं कह नहीं सकता इन्होंने अब निर्दोष हताहतों के प्रति संवेदना में मोमबत्ती जलाना भी लगभग बंद कर दिया है।  लगता है कि हर युद्ध एक नया रोमांचक मनोरंजन है।  

संवेदनाओं के सारे द्वार अब बंद हैं।  सिर्फ ऑंखें और मस्तिष्क हैं. जैसे कि रोबोट की होती हैं।  

रविवार, 14 दिसंबर 2025

हम प्रतिदिन  जितने लोगों या जीव जंतुओं से मिलते हैं सबके भीतर सैकड़ों कहानियां होती हैं सुख और दुःख की।  हर पल जीवन में एक नया शब्द जोड़ जाता है। लेकिन विषय वस्तु सभी की लगभग समान  होती है। सुख या दुःख।  तीसरा रूप कहीं दिखता नहीं।  जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त हर व्यक्ति के जीवन में  कहानियों का  जाल ,ताना बाना  सुख दुःख के  शब्दों  से बुने  होते हैं ।  

हर व्यक्ति अपनी कहानी सुनाना  चाहता है।  वह चाहता है कि मेरी कथा - व्यथा सुनी जाय । मेरा सुख और मेरा दुःख दूसरों की तुलना में कितना बड़ा है। कितने  लोग हैं जिनकी कथा व्यथा  समान है।  


हम हर रोज जो भी नया ढूंढते हैं वह सुख या दुःख होता है।  शब्द अलग हो सकते हैं। 

गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

dincharya

ठंड बढ़ने लगी है सुबह कड़ाके की ठण्ड और दिन में तेज धूप। आजकल अपनी पहले की लिखी कविताओं को फिर से देख रहा हूँ।  पांडुलिपियां बहुत समय से फाइलों और डायरियों  में बंद थी।  देख रहा हूँ कि  आज कितनी प्रासांगिक हैं बरसों पहले लिखी कविताएं।  अब जो कविताएं रहेंगी उन्हें सम्पादित करने की आवश्यकता नहीं  होगी। उनमें प्रेम , प्रकृति और समाज झलकता  है , 

कविता अंतरतम  के अनंत की और एक यात्रा है  किन्तु अध्यामिक नहीं। 

कविता लिखते जाना और एक लम्बे समय के लिए जमा करते जाना तथा एक अवधि के बाद देखना साहित्य साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है 

तात्कालिकता या शब्द संयोजन ज्यादा दूर तक नहीं जा पाते।  

बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

 नवरात्रि  की हार्दिक शुभकामनाएं। जगत जननी महमाया माँ भगवती जगदम्बा अपने सभी रूपों सहित  आपका मंगल करें।  

पूरा विश्व युद्ध की आग में धधक रहा है।  मानवता के सारे शुभचिंतक मौन हैं. किसी भी राष्ट्र के बुद्धिजीवी  युद्धों के विरोध में आगे  आने की हिम्मत नहीं कर पा  रहे हैं युद्धों के विरोध में यह मौन चिंताजनक है। किसके कहाँ कौन से स्वार्थ छिपे हैं. कह नहीं सकते।  

सत्ताएं बदलने के लिए हिंसा विश्व में एक नए और  भयानक रूप में सामने आ रही है।  इस नए ढंग ने सत्ता के विरोध के सारे  मानवीय सिद्धांत ध्वस्त कर दिए हैं. सरकारें बेबस दिखा रही हैं।  Gen  Z  के हिंसक प्रयोग एक भयानक प्रयोग के रूप में सामने आ रहे हैं. 

जीवन के सारे मानवीय सिद्धांत, अध्यात्म, ईश्वर की परिकल्पना , शांति , सुख, सब भीषण बमबारी ने रौंद  दिए हैं, युद्धों की विभीषिका झील रहे लोग सुखों के बारे में तो सोचना भी भूल गए है, अब तो उनके लिए दुःख भी कोई मायने नहीं रखते।  वे संभवतः ईश्वर के अस्तित्व को भी भूल चुके हैं. क्योँकि यहाँ कोई ईश्वर, खुदा, मसीह उनकी सुनने  नहीं आया , वे अपने सामने अपनों को मरते हुए देख रहे हैं।  ये भीषण संहार सदियोँ तक नहीं भुलाया जा सकेगा।  

रविवार, 14 सितंबर 2025

 समूचे विश्व में युद्धों में मारे गए निर्दोष नागरिकों, सैनिकों, बच्चों , पशुओं, वृक्षों कीट पतंगों , व प्रकृति की हर संरचना के विध्वंश पर उन्हें श्रद्धांजलि।  

        क्रूर, अत्याचारी , सत्ता लोलुप तानाशाहों को धिक्कार। 






  आज स्वर्गीय पिताजी का श्राद्ध है।  तीन  साल हो गए हैं. आज भी लगता है कि  पिताजी यहीं कहीं आस - पास हैं, उनकी ममता एवं छत्र छाया में व्यतीत जीवन मेरे भविष्य की सुदृढ़ नींव है । आप जहाँ भी हैं आपको दण्डवत नमन।

रविवार, 27 जुलाई 2025

 विश्व में युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहे।  रूस - यूक्रेन/नाटो  , हमास -  इज़राइल , हिज़्बुल्ला - इज़राईल, ईरान -इज़राईल  के सर्वनाशी युद्धों के  साथ -साथ एक छोटी - सी झलक भारत और पाकिस्तान की भी देखने को मिली इसके साथ ही कम्बोडिया थाईलैंड   और भी कई देश युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं. हर ओर  भयंकर विनाश का तांडव देखने को मिल रहा है।  शांति के लिए बोलने वालों की आवाज हवा में घुल कर  लुप्त हो जा रही है. विनाशक हथियारों , परमाणु  अस्त्रों के दम्भ में कोई देश किसी की सुनाने को तैयार नहीं है. राष्ट्रों को युद्धों की आग में झोंकने वाले तानाशाह, आतंकवाद के पोषक राष्ट्रों के क्रूर और निर्मम शासक अज्ञात जगहों पर  अपने बंकरों में छुपे मौज कर सिर्फ बमबारी के आदेश दे रहे हैं. मरने वालों का कोई आंकड़ा नहीं है।  भूख ,विस्थापन ,भय यह सब आम नागरिकों के लिए दैनिक जीवन का एक हिस्सा बन चुका है. निर्दोष जनता और निर्दोष सैनिकों  को विनाशक हथियारों की आग में झोंका जा रहा है.  और यह सब तानाशाहों के सत्ता की हवस के सिवाय कुछ नहीं है.     

विश्व के सभी जागरूक नागरिक प्रकृति, समस्त प्राणी ,पर्यावरण एवं  मानवता के पक्ष में युद्धों के विरुद्ध अपनी आवाज तेज करें।  युद्धों का विरोध करें। 

सोमवार, 24 मार्च 2025

समूचा विश्व युद्धों के चक्रव्यूह से निकल नहीं पा  रहा है।  दुनियां के शांतिप्रिय नेताओं के सारे प्रयास निष्फल होते दिख रहे हैं. अंधाधुंध बमबारी झेलना लोगों की दिनचर्या बन गई है।  कब कौन कहाँ बम का शिकार हो जाय कोई नहीं जानता।  सब एक दूसरे से विदा लिए हुए हैं, जीवन के प्रति संवेदनाएं, भावनाएं लुप्त हो गई हैं.. यह  त्रासदी हृदय विदारक है।  लोग हैं जो अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहें। कब कौन कहाँ अचानक धमाके के साथ ही चीथड़ों में बदल जाय कुछ कहा नहीं जा सकता। 
तानाशाहों को अपनी सेनाओं और संहारक अस्त्र शस्त्रों , मिसाइलों  बमवर्षकों पर भरोसा है। कि सेनाएं सब कुछ समाप्त कर सकती हैं।  युद्ध एक विनाशकारी धुन है. 

युद्ध  और आतंकवाद से दुनियां के आम नागरिक भयातुर हैं, 

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2025





अद्भुद रंग लेकर आया है बसन्त। खेतों ने सरसों के बसंती रंग दे दिये हैं  और जंगलों ने कई प्रकार के फूलों के रंग।  महल के पेड़ धवल सुमनों से लदे  हुए हैं.  छोटी छोटी  बनस्पतियाँ अपने सम्मोहक रंग बिरंगे /सुनहरे  के परिधान पहनकर आकर्षित करते  हैं। आजकल सायंकालीन और प्रातः भ्रमण का  अनूठा आनंद है. मन को सुखद अनुभूति होती है।  कुछ पल के लिए आदमी सारे दुःख , तनाव भूल जाता है।  लगता है  कि इस दुनियां में प्रकृति और इसके सौंदर्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं  है. लौटते हुए एक सुखद ताजगी की अनुभूति होती है. 
कुछ पलों के लिए हम प्रकृति का हिस्सा होते हैं. प्रकृति का एक - एक पौंधा चाहता है कि  हम उनसे बातें करें. उनके रंगों की प्रशंसा  करें. 
दुनियां के तानाशाह प्रकृति से बेखबर युद्धों में व्यस्त हैं. सृजन के विपरीत युद्ध और विनाश उनकी प्राथमिकताएं हैं. और विनाशकारी युद्धों का यह दौर थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। आम आदमी के जीवन का मूल्य तानाशाहों की दृष्टि में  कोई अर्थ नहीं रखता है।  आम आदमी शांति चाहता है।   









 

शनिवार, 2 नवंबर 2024

 दीपावली की आप सभी पाठक मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं






 

इस पावन पर्व पर आप सुख, समृद्धि, धन धान्य, वैभव, यश से परिपूर्ण हों। विश्व का कल्याण हो, विश्व में शान्ति हो । 

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

 ऋतु  एक सुहावनी करवट ले रही है।  बरसात के बाद आसमान बिल्कुल प्रदुषण रहित ,साफ़- स्वच्छ होने के  कारण सूर्य की किरणें गर्म लोहे की छड़ की तरह तेज और बदन को जला देने वाली पड़  रही हैं. दिन छोटे होने लगे हैं. 

उत्तराखंड के पहाड़ों के गावों में  खेती का काम आरम्भ हो गया है। यानि आश्विन मास लग गया है।    ग्रामीण आजकल  इतने व्यस्त हैं. कि  बुखार और छोटी- मोटी बीमारियों की चिकित्सा आदि के लिए चिकित्सक के पास जाने का भी समय नहीं, वो तो खेत से घर और घर से खेत आने जाने में  ही ठीक हो जाता है। खाने के लिए घर आने का भी समय नहीं होता है घर का एक सदस्य खाना बनाकर उनके लिए खेतों में ले  जाता है।  या सुबह  घर से खाना  बनाकर अपने साथ ले जाते हैं। किसान होना कोई आसान काम नहीं है. हमें मात्र तैयार उपज  दिखती है।  

कुछ ही समय पश्चात् बाजार में नई फसल की  गहत, उड़द , मडुवा , झंगोरा, बाजरा, तिल, चौलाई, धान आदि आने लगेगा ।  फसल के साथ -साथ पूरे वर्ष भर के लिए पशुओं के लिए घास भी जमा करनी होती है।  और अगली बुआई के लिए खेत भी तैयार करने होते हैं।  

रोजगार के अभाव  में पहाड़ों से पलायन के कारण कृषि और पशु पालन भी प्रभावित हुआ है। बच्चे न होने के कारण कई गावों में स्कूल बंद होने की स्थिति में हैं. कई गावों में पहाड़ी शैली में बने आलीशान नक्काशीदार  घर खंडहर हो चुके हैं।  आधे से अधिक खेत बंजर हो चुके हैं। 

जो एक बार यहाँ से रोजगार के लिए पलायन कर गया वह फिर लौट कर गावं देखना भी नहीं चाहता ,या  रोजगार की आपाधापी में उसे गावं के बारे में सोचने का भी समय नहीं मिल पता हो।  


शनिवार, 4 मई 2024

 प्रणाम मित्रो ,

हमारे उत्तराखंड ( भारत ) में जंगलों में लगने वाली आग से वातावरण धुआं - धुआं हो रहा है।  बाहर प्रचंड गर्मी है।  यदि वनाग्नि नहीं लगी होती तो इतनी गर्मी नहीं पड़ती।  हर वर्ष लगाने वाली इस आग ने  न मालूम कितनी महत्वपूर्ण जड़ी बूटियों का  वंश समाप्त हो जाता है।  धरती हर वर्ष पेड़/ वनस्पतियां  उगाकर धरती को हरा भरा बनाने की कोशिश करती है। 

हर बरसात में वृक्षारोपण होता है और हर मई - जून में  सब स्वाहा हो जाता है।  

इस्राईल - हमास- ईरान , यूक्रेन - रूस , पिछले एक साल से भी अधिक समय से चल रहे हैं. धरती फाड़ी जा रही है. निर्दोष प्राणी मरे जा रहे हैं. हिंसा और विनाश का यह खेल बंद होने का नाम नहीं ले रहा है. सारे घातक और विनाशक  हथियारों का प्रयोग /प्रदर्शन हो रहा है, 

युद्धों की इस सनक / पागलपन में जीवन का कोई मूल्य नहीं, 

यूनाइटेड नेशंस की भूमिका अभी स्पष्ट नहीं दिख रही है कि युद्ध बनाये रखना चाहता है या रोकना।  युद्ध  लड़ाने  वालों की और है या पीड़ितों की और।  

नाटो देश अपने हथियार खपाने में लगे हैं।  

यह मानवीय हितों के प्रति  विश्व समुदाय का  स्तब्ध कर देने वाला व्यवहार  है।  

गुरुवार, 18 जनवरी 2024

 अँधेरे को भी अस्त होना होता है।  बिलकुल दिन की मानिंद। उसकी अवधि और महत्त्व दोनों हैं।  महाभारत कालीन युद्धों में भी  रात को  युद्ध विराम होता था।  आज तो भयंकर विनाशकारी युद्ध , बमबारी रात  को ही हो रही हैं, 

रात एक विराम  का नाम भी है जो आपके दुखों, तनावों, द्वंद्वों को अपनी ममता की छाँव देती है।  सबकुछ भूलकर सो जाने को कहती  है। आपकी पीड़ाएँ रात बाँट लेती है. एक सुखद सुबह के आगमन का आश्वासन देती है। 

इसलिए दिनभर की थकान , ऊब निराशा, को ऊर्जावान दूसरे दिन में बदलने ,  जीवन में एक नए प्रकाश आगमन के लिए  रात का स्वागत करें. 

शांति के लिए रात  का भी एक उत्सव की तरह स्वागत करें। 

आपका जीवन सुखमय और लम्बा होगा। 

दिन को भूल  जाएँ क्योँकि वह लौटकर आनेवाला नहीं है।  हाँ दिन की भूलें जरूर याद रखें।  रात के अँधेरे को उन भूलों को भी मिटाने का अवसर दें। दिनभर के सारे द्वन्द्व रात को सौंप दें। 

भोर एक नए समाधान के साथ जरूर आएगी।  

स्वप्न देखें  . अचेतन भी संकेत देता है. 

 संध्या के कितने रुप ?