ठंड बढ़ने लगी है सुबह कड़ाके की ठण्ड और दिन में तेज धूप। आजकल अपनी पहले की लिखी कविताओं को फिर से देख रहा हूँ। पांडुलिपियां बहुत समय से फाइलों और डायरियों में बंद थी। देख रहा हूँ कि आज कितनी प्रासांगिक हैं बरसों पहले लिखी कविताएं। अब जो कविताएं रहेंगी उन्हें सम्पादित करने की आवश्यकता नहीं होगी। उनमें प्रेम , प्रकृति और समाज झलकता है ,
कविता अंतरतम के अनंत की और एक यात्रा है किन्तु अध्यामिक नहीं।
कविता लिखते जाना और एक लम्बे समय के लिए जमा करते जाना तथा एक अवधि के बाद देखना साहित्य साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है
तात्कालिकता या शब्द संयोजन ज्यादा दूर तक नहीं जा पाते।
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