शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

 भयंकर  और  विनाशकारी युद्ध  अब एक सामान्य समाचार है। युद्ध लड़ने वाले भी नित्य की भांति रोटी खा रहे हैं और युद्ध के शिकार भी रोटी खाकर सो रहे हैं।  दोनों पक्ष एक दूसरे पर घात प्रतिघात कर रहे हैं।  सारे  उन्नत, आधुनिक , तकनीकी हथियार  युद्धों  को रोमांचक बना रहे हैं।  

समूचे विश्व में मानवाधिकार संगठनों के सारे विरोध प्रदर्शन अब मौन हैं. युद्ध के पक्ष में हैं या भयभीत हैं कह नहीं सकता इन्होंने अब निर्दोष हताहतों के प्रति संवेदना में मोमबत्ती जलाना भी लगभग बंद कर दिया है।  लगता है कि हर युद्ध एक नया रोमांचक मनोरंजन है।  

संवेदनाओं के सारे द्वार अब बंद हैं।  सिर्फ ऑंखें और मस्तिष्क हैं. जैसे कि रोबोट की होती हैं।  

रविवार, 14 दिसंबर 2025

हम प्रतिदिन  जितने लोगों या जीव जंतुओं से मिलते हैं सबके भीतर सैकड़ों कहानियां होती हैं सुख और दुःख की।  हर पल जीवन में एक नया शब्द जोड़ जाता है। लेकिन विषय वस्तु सभी की लगभग समान  होती है। सुख या दुःख।  तीसरा रूप कहीं दिखता नहीं।  जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त हर व्यक्ति के जीवन में  कहानियों का  जाल ,ताना बाना  सुख दुःख के  शब्दों  से बुने  होते हैं ।  

हर व्यक्ति अपनी कहानी सुनाना  चाहता है।  वह चाहता है कि मेरी कथा - व्यथा सुनी जाय । मेरा सुख और मेरा दुःख दूसरों की तुलना में कितना बड़ा है। कितने  लोग हैं जिनकी कथा व्यथा  समान है।  


हम हर रोज जो भी नया ढूंढते हैं वह सुख या दुःख होता है।  शब्द अलग हो सकते हैं। 

गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

dincharya

ठंड बढ़ने लगी है सुबह कड़ाके की ठण्ड और दिन में तेज धूप। आजकल अपनी पहले की लिखी कविताओं को फिर से देख रहा हूँ।  पांडुलिपियां बहुत समय से फाइलों और डायरियों  में बंद थी।  देख रहा हूँ कि  आज कितनी प्रासांगिक हैं बरसों पहले लिखी कविताएं।  अब जो कविताएं रहेंगी उन्हें सम्पादित करने की आवश्यकता नहीं  होगी। उनमें प्रेम , प्रकृति और समाज झलकता  है , 

कविता अंतरतम  के अनंत की और एक यात्रा है  किन्तु अध्यामिक नहीं। 

कविता लिखते जाना और एक लम्बे समय के लिए जमा करते जाना तथा एक अवधि के बाद देखना साहित्य साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है 

तात्कालिकता या शब्द संयोजन ज्यादा दूर तक नहीं जा पाते।  

बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

 नवरात्रि  की हार्दिक शुभकामनाएं। जगत जननी महमाया माँ भगवती जगदम्बा अपने सभी रूपों सहित  आपका मंगल करें।  

पूरा विश्व युद्ध की आग में धधक रहा है।  मानवता के सारे शुभचिंतक मौन हैं. किसी भी राष्ट्र के बुद्धिजीवी  युद्धों के विरोध में आगे  आने की हिम्मत नहीं कर पा  रहे हैं युद्धों के विरोध में यह मौन चिंताजनक है। किसके कहाँ कौन से स्वार्थ छिपे हैं. कह नहीं सकते।  

सत्ताएं बदलने के लिए हिंसा विश्व में एक नए और  भयानक रूप में सामने आ रही है।  इस नए ढंग ने सत्ता के विरोध के सारे  मानवीय सिद्धांत ध्वस्त कर दिए हैं. सरकारें बेबस दिखा रही हैं।  Gen  Z  के हिंसक प्रयोग एक भयानक प्रयोग के रूप में सामने आ रहे हैं. 

जीवन के सारे मानवीय सिद्धांत, अध्यात्म, ईश्वर की परिकल्पना , शांति , सुख, सब भीषण बमबारी ने रौंद  दिए हैं, युद्धों की विभीषिका झील रहे लोग सुखों के बारे में तो सोचना भी भूल गए है, अब तो उनके लिए दुःख भी कोई मायने नहीं रखते।  वे संभवतः ईश्वर के अस्तित्व को भी भूल चुके हैं. क्योँकि यहाँ कोई ईश्वर, खुदा, मसीह उनकी सुनने  नहीं आया , वे अपने सामने अपनों को मरते हुए देख रहे हैं।  ये भीषण संहार सदियोँ तक नहीं भुलाया जा सकेगा।  

रविवार, 14 सितंबर 2025

 समूचे विश्व में युद्धों में मारे गए निर्दोष नागरिकों, सैनिकों, बच्चों , पशुओं, वृक्षों कीट पतंगों , व प्रकृति की हर संरचना के विध्वंश पर उन्हें श्रद्धांजलि।  

        क्रूर, अत्याचारी , सत्ता लोलुप तानाशाहों को धिक्कार। 






  आज स्वर्गीय पिताजी का श्राद्ध है।  तीन  साल हो गए हैं. आज भी लगता है कि  पिताजी यहीं कहीं आस - पास हैं, उनकी ममता एवं छत्र छाया में व्यतीत जीवन मेरे भविष्य की सुदृढ़ नींव है । आप जहाँ भी हैं आपको दण्डवत नमन।

रविवार, 27 जुलाई 2025

 विश्व में युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहे।  रूस - यूक्रेन/नाटो  , हमास -  इज़राइल , हिज़्बुल्ला - इज़राईल, ईरान -इज़राईल  के सर्वनाशी युद्धों के  साथ -साथ एक छोटी - सी झलक भारत और पाकिस्तान की भी देखने को मिली इसके साथ ही कम्बोडिया थाईलैंड   और भी कई देश युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं. हर ओर  भयंकर विनाश का तांडव देखने को मिल रहा है।  शांति के लिए बोलने वालों की आवाज हवा में घुल कर  लुप्त हो जा रही है. विनाशक हथियारों , परमाणु  अस्त्रों के दम्भ में कोई देश किसी की सुनाने को तैयार नहीं है. राष्ट्रों को युद्धों की आग में झोंकने वाले तानाशाह, आतंकवाद के पोषक राष्ट्रों के क्रूर और निर्मम शासक अज्ञात जगहों पर  अपने बंकरों में छुपे मौज कर सिर्फ बमबारी के आदेश दे रहे हैं. मरने वालों का कोई आंकड़ा नहीं है।  भूख ,विस्थापन ,भय यह सब आम नागरिकों के लिए दैनिक जीवन का एक हिस्सा बन चुका है. निर्दोष जनता और निर्दोष सैनिकों  को विनाशक हथियारों की आग में झोंका जा रहा है.  और यह सब तानाशाहों के सत्ता की हवस के सिवाय कुछ नहीं है.     

विश्व के सभी जागरूक नागरिक प्रकृति, समस्त प्राणी ,पर्यावरण एवं  मानवता के पक्ष में युद्धों के विरुद्ध अपनी आवाज तेज करें।  युद्धों का विरोध करें। 

सोमवार, 24 मार्च 2025

मूचा विश्व युद्धों के चक्रव्यूह से निकल नहीं पा  रहा है।  दुनियां के शांतिप्रिय नेताओं के सारे प्रयास निष्फल होते दिख रहे हैं. अंधाधुंध बमबारी झेलना लोगों की दिनचर्या बन गई है।  कब कौन कहाँ बम का शिकार हो जाय कोई नहीं जानता।  सब एक दूसरे से विदा लिए हुए हैं, जीवन के प्रति संवेदनाएं, भावनाएं लुप्त हो गई हैं.. यह  त्रासदी हृदय विदारक है।  लोग हैं जो अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहें। कब कौन कहाँ अचानक धमाके के साथ ही चीथड़ों में बदल जाय कुछ कहा नहीं जा सकता। 
तानाशाहों को अपनी सेनाओं और संहारक अस्त्र शस्त्रों , मिसाइलों  बमवर्षकों पर भरोसा है। कि सेनाएं सब कुछ समाप्त कर सकती हैं।  युद्ध एक विनाशकारी धुन है. 

युद्ध  और आतंकवाद से दुनियां के आम नागरिक भयातुर हैं, 

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2025





अद्भुद रंग लेकर आया है बसन्त। खेतों ने सरसों के बसंती रंग दे दिये हैं  और जंगलों ने कई प्रकार के फूलों के रंग।  महल के पेड़ धवल सुमनों से लदे  हुए हैं.  छोटी छोटी  बनस्पतियाँ अपने सम्मोहक रंग बिरंगे /सुनहरे  के परिधान पहनकर आकर्षित करते  हैं। आजकल सायंकालीन और प्रातः भ्रमण का  अनूठा आनंद है. मन को सुखद अनुभूति होती है।  कुछ पल के लिए आदमी सारे दुःख , तनाव भूल जाता है।  लगता है  कि इस दुनियां में प्रकृति और इसके सौंदर्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं  है. लौटते हुए एक सुखद ताजगी की अनुभूति होती है. 
कुछ पलों के लिए हम प्रकृति का हिस्सा होते हैं. प्रकृति का एक - एक पौंधा चाहता है कि  हम उनसे बातें करें. उनके रंगों की प्रशंसा  करें. 
दुनियां के तानाशाह प्रकृति से बेखबर युद्धों में व्यस्त हैं. सृजन के विपरीत युद्ध और विनाश उनकी प्राथमिकताएं हैं. और विनाशकारी युद्धों का यह दौर थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। आम आदमी के जीवन का मूल्य तानाशाहों की दृष्टि में  कोई अर्थ नहीं रखता है।  आम आदमी शांति चाहता है।   









 

कल रातभर वर्षा होती रही।   इस वर्षा ने प्राकृतिक सौंदर्य में नए  प्राण डाल दिए हैं. बसंत पंचमी के आगमन के साथ ही वातावरण में एक नयापन आ गया ...